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कहानी: टिफिन सेंटर का खाना

विनोद और नरेश एक ही शहर के रहने वाले थे नौकरी भी एक ही ऑफिस में कर रहे थे अंतर ये था कि विनोद ट्रेजरी ऑफिसर के पद पर कार्यरत थे और नरेश कार्यालय सहायक के पद पर। जबकि नरेश  सेवानिवृत लेखाधिकारी राम मोहन का लडका था और विनोद  के पिता माखनलाल मजदूरी करते थे। वैसे तो दोनों बचपन के दोस्त थे मगर ऑफिस में मर्यादा का पालन करते थे। आज बहुत दिनों बाद  नरेश के पिता राम मोहन से विनोद की भेंट हुई थी उनका कोई बिल पेंडिग था जिसका मुगतान होना था। उनका काम तो हो गया। वे विनोद के प्रति आभार प्रगट करने आए बोले बेटा तुम्हें देखकर टिफिन सेंटर के खाने की याद आ जाती है ।तुम्हारा वो अहसान में कभी भूल नहीं पाऊँगा जिसके कारण नरेश मौत के मुँह में जाने से बचा था। राममोहन की बात सुनकर विनोद को भी वो पुरानी बातें याद आ गईं थीं विनोद घर पर बैठे उन्हीं  यादों में खोए हुए थे।
यह बात उन दिनों की है जब  विनोद बी कॉम प्रथम वर्ष में पढ़ते थे  वहीं नरेश और उसके तीन दोस्त अजीत, राकेश तथा रोशन भी पढते थे। वे चारों फ्लेट में किराये से रहते थे जिसका किराया पन्द्रह  हजार रुपये महीना था।  जबकि विनोद   जिस  कमरे में रहते थे  वो साधारण था उसमें सीमेंट  के चादरों की छत थी जिसका नरेश सात सौ रुपये प्रतिमाह किराया देता था  वहीं विनोद कोयले की सिगड़ी पर अपना भोजन तैयार करते थे।  नरेश और उसके तीनों दोस्त  फ्लेट   में रहकर टिफिन सेंटर से खाना मँगवाते थे।  नतीजा यह हुआ कि टिफिन सेंटर का खाना खाने से  नरेश की   तबियत खराब हो गई थी। इसके पहले  उन्होंने कभी टिफिन  सेंटर का खाना नही खाया था। नरेश को टायफाईड हो गया था  उसके तीनों साथियों की भी तबीयत खराब हो रही थी।  जबकि विनोद पूरी तरह स्व्स्थ थे।  नरेश पूरे दो माह  बीमार पड़ा रहा था जब ठीक हुआ तो  फ्लेट में रहने आ गया उसके पिता राम मोहन भी साथ थे वे   टिफिन सेंटर से भोजन   कराना नहीं चाहते थे कुछ समझ नहीं पा रहे थे  कि क्या करें तभी विनोट आता दिखाई दिया राम मोहन जी  की विनोद से बातें होने लगीं  राम मोहन जी ने पूछा खाना किस होटल में खाते हो इस पर विनोद ने  कहा मेरी  इतनी हैसियत कहाँ कमरे पर हाथ बे खाना बनाकर खा लेता हूँ इस पर राम भोहन जी ने कहा तुम तो जानते ही हो नरेश टिफिन सेंटर का खाना खाकर गंभीर रूप से बीमार हो गया था।  अगर तुम मेरी बात मान जाओ तो इस समस्या का समाधान हो सकेगा  अगर तुम इन चारों के ,लिए दो वक्त का भोजन बनाकर दे सको तो हम प्रतिमाह बीस हजार रुपये  देंगे  सामग्री तुम्हारी ही रहेगी । विनोद के  परिवार  की हालत खराब थी  इस बार पिताजी ने एक रुपया भी नहीं दिया था बल्कि ये  कहा था बहुत हो गई पढ़ाई  अब घर आ जाओ और हमारी तरह खेतों में मजदूरी  करो तुम्हारे बस की पढ़ाई नहीं है।  विनोद ने राममोहन जी की  बात  मान ली थी   राम मोहन भी खुश थे। उन्होंने पूरे  बीस हजार महीने भर  के एडवाँस के रूप  में  दे दिए थे।
विनोदने  पूरे तीन साल  तक उनको खाना खिलाया था जिससे वे फिर कभी  बीमार  नहीं पड़े । विनोद को इससे पूरे दस हजार रुपये  की  बचत होती जो वो पिता के  पास भिजवा देता था उसकी माँ  की तबीयत खराब थी ये पैसे उनके इलाज भें खर्च हो जाते थे।  नरेश ने बताया कि परसों मैं अपने मित्र सोहन के घर गया था उसका घर साप्ताहिक बाजार से लगा हुआ था वे टहलते हुए रात  के साढ़े दस बजे उस बाजार में आ गए अब बाजार बंद हो रहा था। तभी नरेश ने देखा कि वो टिफिन सेंटर वाला सडी गली बची सब्जी खरीद रहा था। उसने बाजार से उसे घटिया गेहूँ चावल लाते हुए भी देखा था  उसे अपनी बीमारी का कारण समझ में आ गया था बी कॉम करने के बाद सभी उसी शहर में रहकर पीएस सी की तैयारी कर  रहे थे  विनोद भी उनके साथ वहीं रुक गया था उसे एक मंदिर में सुब्ह शाम झाडू लगाने का  काम मिल  गया था।  डेढ वर्ष बाद  विनोद ट्रेजरी ऑफिसर के पद  पर चयनित हो गए थे  बाकी वे चारों भी  सरकारी दफ्तर में क्लर्क हो गए थे। उनमें सबसे अच्छी नौकरी विनोद को मिली थी उसकी तो किस्मत ही सँवर गई थी। 
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप 


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