वीरभान की देखते ही देखते कायापलट हो गई थी कभी दूसरों के खेत में काम करने वाला अब चालीस एकड़ जमीन का मालिक होकर संपन्न कृषक बन गया था झोपड़ी पक्के आलीशन मकान में बदल गई थी और ये सब दो साल के भीतर हुआ था। सोशल मीडिया पर गाया उसका स्वलिखित शिव भजन खूब वायरल हो गया था। भजन वायरल होने के साथ ही उसे प्रसिद्ध भजनगायक रामानुज ने अपना स्वर देकर लाँच कर दिया था। इसने देखते ही देखते उसकी सारी गरीबी दूर कर दी थी। काम करते हुए वो जो गीत भजन गाता था उसकी शब्द रचना भी वो खुद करता था।
उसके रचित कई भजन और गीत आसपास के गाँवों मे खूब लोकप्रिय थे और गाए जाते थे फाग गायन कार्यक्रम उसके बिना अधूरा माना जाता था उसकी भजन मंडली उसके रचित भजन गाकर प्रतियोगिता में प्रथम पुरुस्कार लेकर आती थी।
दो वर्ष पूर्व वीरभान के अंचल के अनेक लोग जो शहर की एक बस्ती में रहते थे उन्होंने वीरभान की भजन मंडली को गायन के लिए बुलाया था आसपास की और भजन मंडलियाँ भी वहाँ आईं थीं। वहाँ वीरभान की मंडली छा गई थी ढोलक मंझीरा और हारमोनियम पर वीरभान ने स्वचरित भजन गाए थे जो गहरी छाप छोड गए थे। उस समय सोशल मीडिया से जुडे कैलाश ने भजन पोस्ट कर दिए थे जो देखते ही देखते वायरल हो गए जिससे वीरभान की प्रसिद्धि बढ़ गई थी।फिर तो उसके पास चारों तरफ से पैसों की बरसात होने लगी थी। वीरभान गाँव का रहने वाला सीधा साधा खेतिहर मजदूर था। गाँव के स्कूल में वो आठवीं तक पढ़ा था उसे हिन्दी पढाने वाले गुरूजी रमानाथ त्रिपाठी छंद शास्त्र के अच्छे ज्ञाता थे। उनसे वीरभान ने छंद में काव्य रचना करना सीख ली थी उसका कंठ मधुर था और लेखन शैली भी कमाल की अति गरीब होने के कारण वो इन्हें मंच से नहीं पढ़ सका था लेकिन गाँव में आयोजित भजन कार्यक्रम भें जरूर अपनी उपस्थिति देता था। उसे इनसे एक पैसा भी नहीं मिवता था। उसे तो खेत में हाड़तोड़ मेहनत करने पर जो मजूरी मिलती थी उसी से उसके घर का खर्च चलता था। वीरभान ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि वो रातों रात इतना प्रसिद्ध हो जाएगा ।लोगों के जुबान पर उसके गीत और भजन चढ़ गए थे। अब उसकी पहचान खूब बढ़ गई थी इसके साथ ही उसका सम्मान भी बढ़ गया था। आज वीरभान किसी परिचय का मोहताज नहीं रहा था।गाँव में भव्य मंदिर का निर्माण होना था ग्रामीणों ने बैठक आयोजित कर निर्णय लिया था कि जो मंदिर निर्माण में सबसे अधिक चंदा देगा वही गाँव का निर्विरोध सरपंच चुना जाएगा। वीरभान ने बीस लाख रुपये मंदिर के निर्माण हेतु दान में दिए थे। ग्राम का सबसे संपन्न किसान हरिसिं भी साथ लाख से ज्यादा नही दे सके थे ।ऐसी स्थिति में ग्रामीणों ने वीरभान को सरपंच व हरिसिंह को उपसरपंच चुन लिया पंच वे चुने गए थे।जिन्होंने पाँच लाख रुपया दान में दिया था। गाँव के एक बुजुर्ग राधेलाल कहते थे वीरभान खाई में पड़ी वो धूल है जो सोशल मीडिया की आँधी से उड़कर शिखर पर पहुँची है।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप
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