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कहानी: लाड़लों की करतूत

साहब सिंह और उनकी पत्नी कुसुम जबसे अपने बड़े बेटे संतोष के यहाँ आए थे तबसे ही सुखपूर्वक रह रहे थे। इसके पूर्व वे अपने छोटे लाड़ले बेटे  के साथ रह रहे थे वहाँ वे नारकीय जीवन जी रहे थे उनका छोटा बेटा पूरा जोरू का गुलाम था और उसकी पत्नी बेरहम महिला थी। वो सास ससुर पर हर तरह के जुल्म ढाती थी और वो लड़का कुछ भी नहीं कहता था। वे फिर भी जुल्म सहकर रह रहे थे। पर हद तो तब हो गई जब उनके छोटे बेटे की पत्नी ने उन्हें घर से ही निकाल दिया। 
वे दोनों सामने के एक टीन शेड में बैठे रहे, ये सोच कर की शायद बहू का दिल पसीज जाए और वो उन्हें वापस घर ले आए। इसी उम्मीद से दिन के चार बज गए थे, अब उनकी आशा निराशा में बदलती जा रही थी। उन्हें लगा कि अगर इन्होंने घर में नहीं बुलाया तो रात कैसे काटेंगे। दिन भर से उन्होंने कुछ भी नहीं खाया था, एक गिलास पानी भी उन्हें नसीब नहीं हुआ था।
तभी अचानक देवदूत की तरह उनका बड़ा बेटा संतोष  अपनी पत्नी शाँति के साथ वहाँ आ गया। पहले तो उसने और उसकी पत्नी ने उनके चरण स्पर्श किए। फिर संतोष ने कहा, बाबूजी आपने मुझ तक यह खबर क्यों नहीं पहुँचाई मैं आपका लाड़ला नहीं हूँ ? भले ही आपकी बड़ी बहू आपकी चहेती नहीं है, पर हम बच्चे तो आपके ही हैं। सुनकर साहब सिंह बोले, बेटे मैं किस मुँह से कहकर तुझ तक खबर पहुँचाता। मैंने तुझे जब घर से निकाला था तब कुछ भी तो नहीं दिया था तुझे, फिर किस अधिकार से तेरे पास रहने आता। हमने तो तय कर लिया था कि अगर ये दिन ढले तक हम को घर में नहीं ले जाएँगे तो हम दोनों ये शहर छोड़कर ही चले जाएँगे। संतोष बोला पिताजी ऐसा आपने सोचा ही क्यों, आपका बड़ा बेटा अभी जिंदा है। चलो अपने घर वो घर मेरा नहीं आपका है। आप हमारे साथ नहीं हम आपके साथ रहेंगे। ऐसा कहकर संतोष और उसकी पत्नी शाँति उन्हें आदरपूर्वक अपने घर ले आए थे। जब वे उन्हें ले जा रहे थे तब छोटी बहू ने बड़े कड़वे लहजे में कहा था - आप इन्हें ले जा तो रहे हैं पर चार दिन से ज्यादा नहीं रख पाएँगे। यह कोई अच्छे इंसान नहीं हैं। संतोष को छोटी बहू की बात सुनकर गुस्सा तो बहुत आया पर चुप रहा। और बिना कोई बखेड़ा किए उन्हें अपने घर ले आया। तबसे पाँच वर्ष हो गए थे मगर फिर भी संतोष और उसकी पत्नी ने कभी उनकी सेवा में कोई कमी नहीं छोड़ी थी। साहब सिंह संतोष की भलमनसाहत के कायल हो गए थे। संतोष उनका बड़ा बेटा था और उससे छोटी बहन थी, जिसका नाम अनुसुइया था। संतोष ने चौदह वर्ष की उम्र से ही घर की जिम्मेदारी सम्भाल ली थी। उसके पिता साहब सिंह लापरवाह किस्म के इंसान थे। किराए के घर में रहते थे। मजदूरी करते थे और घर में थोड़ा सा रुपया देकर बाकी सब पैसा उड़ा देते थे। बच्चों की बेरहमी से पिटाई करते थे। संतोष को तो इतना मारते कि वो लहूलुहान हो जाता था। संतोष चौदह वर्ष का हुआ तब उसने आठवीं पास कर ली थी। उसने घर की परिस्थिति देखते हुए एक जनरल स्टोर पर नौकरी कर ली थी। जहाँ वो शाम को पाँच बजे पहुँचता था और रात के ग्यारह बजे घर आता था। सुबह पढ़ने के लिए स्कूल चला जाता और शाम को दुकान पर काम करने पर जो पैसे मिलते सब माँ को दे देता। पढ़ाई उसने जारी रखी थी। फिर कुछ दिन बाद उसने चाट फुल्की का ठेला लगा लिया था। पाँच बजे से दस बजे तक का उसका धंधा था। सारे पैसे कमाकर वो माँ के हाथ में दे देता था। उसने मकान माँ के नाम बनवाया, खेती माँ के नाम खरीदी, दुकान भी माँ के नाम से, बैंक में खाता भी माँ के नाम से खुलवाया था। फिर भी वे उसे लाड़ प्यार नहीं करतीं थीं। उनका सारा लाड़ प्यार अपनी बेटी और छोटे बेटे के लिए था। संतोष की शादी हो गई और जो बहू आई वो भी संतोष की तरह ही सीधी सादी थी। उसपर नंद, देवर, सास जुल्म ढाते पर फिर भी वो सबकी सेवा करती थी। उन सब के ठाठ बाट  संतोष की कमाई पर कायम थे। पर फिर भी उनकी कोई इज्जत नहीं थी। छोटे भाई की शादी के बाद हाल और खराब हो गए थे।  छोटी बहू भी उनकी लाड़ली निकली। संतोष को पता ही नहीं चला और उसके माँ बाप ने मकान, जमीन-जायदाद अपने छोटे बेटे के नाम कर दी थी। और छोटे बेटे ने वो अपनी पत्नी के नाम कर दी। इसके बाद साजिश से संतोष और शाँति को घर से निकाल दिया था। कुछ भी उनको नहीं दिया। बेचारे अपनी किस्मत के सहारे वहाँ से चल दिए थे। संतोष ने मजदूरी कर के अपना पालन पोषण किया फिर छोटी सी दुकान खोल ली। उसकी दुकान कुछ ही दिनों में चल निकली। धीरे-धीरे  संतोष भी संपन्न हो गए थे। आज सँतोष के पास सब कुछ था और माँ बाप का साथ पाकर तो वो खुद को भाग्य शाली मानता था।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप 


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