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कहानी: वेटनरी डाॅक्टर

वेटनरी डॉक्टर रवि वर्मा शहर के माने हुए पशुचिकित्सक थे। शहर में उनका काफी नाम था। वे लोकप्रिय भी थे। ज्यादातर पशुपालक अपने बीमार पशुओं का उनसे इलाज कराना पसंद करते थे। वे शहर के सरकारी पशु चिकित्सालय में पदस्थ थे। अस्पताल के इंचार्ज भी वे ही थे। आज भी जैसे ही वे अस्पताल बंद कर घर आए तो वहाँ पर उन्होंने पशुपालकों की भीड़ देखी। जैसे तैसे भोजन कर वे फिर पशुओं के उपचार में जुट गए, उन्हें मूक पशुओं का इलाज कर बहुत संतोष मिलता था। 
रवि वर्मा ने अपनी नौकरी की शुरूआत चपरासी के पद से की थी। जो उन्हें पिताजी सुखराम के निधन के बाद अनुकंपा में मिली थी। उस वक्त वे हायर सेकेण्डरी पास नहीं थे इसलिए उन्हें चपरासी बनाया गया था। रवि वर्मा की उम्र तब अठारह वर्ष की हुई ही थी। कि पिताजी का निधन हो गया। उस समय रवि वर्मा कक्षा गयारह में पढ़ते थे। बारहवीं पास नहीं होने के कारण उन्हें चपरासी की नौकरी मिली थी। इसके एक साल बाद ही वर्मा जी ने हायर सेकेण्डरी परीक्षा अच्छे अंकों से पास कर ली थी। पर फिर भी उन्हें फोर्थ क्लास से उन्नत नहीं किया गया था। पशुचिकित्सा सहायक के पद पर रवि जी ने आवेदन दिया था लेकिन उसे उनके अधिकारी शिवकाँत  ने बीच में ही दबा लिया था। क्योंकि वो अपने लड़के प्रशाँत को नौकरी दिलवाना चाहते थे। पर किसी का बुरा कर के किसी भला हो ऐसे उदाहरण बहुत कम हैं।  शिवकाँत के सारे किए कराए पर पानी फिर गया जब उनके लड़के से अधिक अंक लाने वाले उम्मीदवार का आवेदन  देखा।  शिवकाँत ने बहुत कोशिश की वो आवेदन गायब करने की लेकिन सफल नहीं हो सके, फिर उस आवेदन को रिजेक्ट कराने की कोशिश करने लगे।  तभी कलेक्टर का फोन आया नियुक्ति ईमानदारी से होना चाहिए मैं पूरा रिकार्ड चेक करूँगा। इसकी वजह से उनके लड़के को भी  नौकरी नहीं मिली थी। रवि वर्मा जी ने बी एस सी की पढ़ाई करना शुरू कर दी थी। बड़े साहब की परमीशन से  कॉलेज में एडमीशन ले लिया था। वे साहब  तीन साल तक रहे तब उन्होंने बी एस सी पास कर ली थी।इसके बाद भी कुछ अधिकारियों द्वारा अड़ंगे लगाने के कारण रवि वर्मा बी वी एस सी में एडमीशन नहीं ले पाए। इसी दौरान रवि वर्मा जी की भी शादी हो गई थी। उनकी पत्नी रंजीता के मायके वाले काफी धनवान थे। रवि वर्मा ने इंट्रेन्स पास कर लिया फिर भी उन्हें कोर्स करने नहीं भेजा गया। तब रंजना ने कहा  कि योग्य के हाथ से अवसर चला जाए  ऐसा नहीं  होना चाहिए। रंजना ने अपने पिता जो किसान थे उनका नाम ठाकुर दास था को सारी बात बताई। ठाकुर दास जी ने  रवि वर्मा जी की पढ़ाई का जिम्मा ले लिए था। रवि वर्मा ने मेरिट में प्रथम आकर बी वी एस सी अंतिम वर्ष  की परीक्षा पास कर डिग्री हासिल की थी। रवि वर्मा ने पी एस सी की परीक्षा दी। वो क्वालीफाई कर गए। नियुक्ति मिलने के बाद वे पशुचिचित्सक बना दिए गए थे। जहाँ उनकी पोस्टिंग हुई  वहाँ शिवकाँत उनके सहायक थे और उनका लड़का प्रशाँत चपरासी था। वह उसी रिक्त जगह पर नियुक्त हुआ था जो रवि वर्मा के नौकरी छोड़ देने से रिक्त हुई थी। शिवकाँत रवि वर्मा को देखकर झेंप गया था, यही हाल प्रशाँत का भी था। लेकिन डॉ रवि वर्मा ने इसे लेकर कोई ग्रंथी नहीं पाली थी।
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रचनाकार।
प्रदीप  कश्यप 


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