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कहानी: झूठे शपथ पत्र से मिली अनुकंपा नौकरी।

परितोष  को अड़तीस वर्ष की आयु में दो साल पहले  अनुकंपा नौकरी मिली थी । आज चालीस वर्ष की उम्र में उसकी शादी संपन्न हुई थी।परितोष वैसे तो इंजीनियर  की डिग्री धारी था पर नौकरी उसे चपरासी की मिली थी क्योंकि उसकी माँ कुसुम  भी चपरासी थीं। रिटायर,मेंट में उनके चौदह  वर्ष बाकी थे। पर  स्वास्थ्य ने साथ नहीं दिया   और उनकी मौत हो गई। परितोष वैसे ही बेरोजगार था इसी कारण उसकी शादी नहीं हो रही थी।
अनुकंपा नौकरी मिलने के बाद  उसकी सरकारी नौकरी देख शादी के रिश्ते आने लगे थे  अंततः आज उसका घर बस गया था। माता पिता  दोनों जीवित नहीं थे  इसलिए शादी के सारे कार्यक्रम उसके जीजा और दीदी ने  संपन्न कराए थे। परितोष की माँ कुसुम को भी अनुकंपा नौकरी मिली थी उनके पति  छगन लाल  सरकारी दफ्त में बाबू थे। वे किसी काभ से भोपाल गए थे। जहाँ   बस से उतरकर पैदल जा रहे थे तभी  एक टैंकर ने उन्हें अपनी चपेट में ले लिया था  जिससे उनकी वहीं दुखद मौत हो गई थी कुसुम ये सदमा सहन नहीं कर पाई और अचेत हो गई  तीन महीने अस्पताल में भर्ती रहीं तब उनके स्वास्थ्य में सुधार हुआ उनकी दो बेटियाँ सोनम और मोनिका थी सोनम की उम्र पंद्रह साल मोनिका की उम्र बारह साल थी  तथा परितोष की उम्र दस साल थी।  कुसुम  बिल्कुल पढ़ी लिखी नहीं थी जब उनके पति का निधन हुआ तब उनकी उम्र चालीस वर्ष की थी। उनका भाई सत्ताथारी पार्टी का नेता था उसका नाम लखनलाल था सब उसे लखन भैया कसते थे उसी ने  कुसुम का झूठा शपथ पत्र बनवाया था  जिसमें कुसौम की उम्र अठारह वर्ष  लिखी गई थी  पोस्टिंग जानबूझकर दूसरे शहर में कराई थी वहाँ पाँच साल नौकरी करने के बाद लखनलाल ने अपने शहर में कुसुम का तबादला करा दिया था।  जब कुसुम की भौत हुई तब उनकी उम्र सत्तर साल थी लेकिन सरकारी दस्तावेजों में उनकी उम्र अभी मात्र अड़तालीस वर्ष ही थी जबकि उनकी बड़ी  बेटी   सोनम की उम्र ही पैंतालीस साल की थी। इस हिसाब से  उनके रिटायर मेन्ट में अभी चौदह साल बाकी थे  अगर वे  जिन्दा रहतीं तो रिटायर मेन्ट के समय  उनकी उम्र चौरासी वर्ष होती लेकिन उनके कमजोर स्वास्थ्य के कारण   उनका इतने समय तक जिंदा रहना कठिन प्रतीत होता था कुसुम को नौकरी के वेतन  के अलावा  पैंशन भी मिलती थी । उनकी मृत्यु से किसी को भी अधिक दुख नहीं हुआ था परितोष तो मन ही मन खुश,था।  वैसे भी वो उनकी  बीमारी से परेशान था। बहुत पैसे बीमारी में खर्च होते  थे उससे छुटकारा मिल गया था कुसुम के  फंड बीमा  ग्रेच्युटी के तीस,लाख रुपये मिले थे  जिससे परितोष ने  अपने कच्चे घर को तुड़वाकर पक्का घर बना लिया था। अब तो उसकी शादी भी हो गई थी मनपसंद पत्नी  पाकर वो बहुत खुश था। वैसे भी  वो संवेदना विहीन था उसने एक पैसा भी कमाकर अपनी माँ को नहीं दिया था दोनों ए टी एम कार्ड अपने पास रखता था  माँ को सिर्फ दो हजार रुपये महीने के देता था बाकी तनख्वाह और पैंशन को मनमाने तरीके से खर्च करता था माँ का उसे जरा भी डर नहीं था।  उसकी माँ ने जीवन भर कठिन संघर्ष किया था बहू का सुख उसकी किस्मत में नहीं लिखा था तभी तो बहू के आने से दो साल पहले ही उसने दुनिया छोड़ दी थी।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप 


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