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कहानी: समय का फैर

आज भले सुखदयाल सर  धन संपन्न हों पर उनका डचपन घोर गरीबी में बीता था उनके पिता तथा माँ दूसरों के खेतों में मजूरी करत थे वे आज जिस हायर सेकेण्डरी स्कूल के प्रिन्सीपल हैं  कभी वो प्राथमिक विद्यालय हुआ करता था। वे उसी स्कूल में आठवीं तक पढ़े थे उनकी किस्मत से जब वो पाँचवी पास हुए थे तब उस स्कूल को मिडिल तक उन्नत कर दिया गया था जो उनके साथ पाँचवी तक पढ़ी थी  रामसखी वो उनके ही स्कूल में चपरासी थी। 
जब सुखदयाल पाँचवी में पढ़ते थे तब रामसखी उनकी सहपाठी थी उस समय रामसखी के पिता बुधराम और उनके पिता कीरतलाल साथ में मजदूरी करते थे बुधराम कहा करते थे कि वे रामसखी की शादी सुखदयाल से करेंगे सुखदयाल एक होनहार लड़का है कीरतलाल भी रामसखी को अपनी बेटे की भावी बहू के रूप में देखते थे। पाँचवी पास करने के बाद  बुधराम ने रामसखी की पढ़ाई छुड़वा दी कीरतलाल ने बहुत समझाया पर बुधराम ने उनकी एक न मानी रामसखी किशोरावस्था में प्रवेश कर रही थी इसलिए उसका स्वतंत्रता से कहीं आना जाना  रोक दिया गया था। बरखेड़ा गाँव में कीरतलाल का परिवार ही ऐसा था जो पूरी तरह शाकाहारी था।  वे शराब का सेवन भी नहीं करते थे। बाकी पूरे गाँव में उनके समाज के लोग माँसाहारी थे तथा विशेष अवसरों पर परिवार का हर सदस्य माँसाहा के साथ शराब का सेवन करता था। इसके कारण बुधराम ने कीरतलाल से दूरी बना ली थी कीरतलाल के यहाँ रिश्तेदार भी इसिलिए नहीं आते थे क्योंकि  कीरतलाल उनका स्वागत सात्विक भोजन से करते थे मदिरापान कराने का तो प्रश्न ही नहीं उठता था। इधर सुखदयाल  आठवीं पास कर  पढ़ने के लिए वीरपुर कस्बे में आ गऍए थे वहाँ के हायर सेकेण्डरी स्कूल में उन्होंने नवमी में प्रवेश,ले लिया था कुछ छात्रवृत्ति कुछ पिताजी की आर्थिक सहायता तथा खुद सुखदयाल छुट्टी में मजदूरी कर अपना खर्चा जुटाते थे। जब सुखदयाल बारहवीं में थे तब उन्हें पता चला कि रामसखी की शादी  ग्राम के पटेल के लडके सोबरन सिंह के साथ होने वाली है तब सुखदयाल ने गाँव आकर रामसखी  से किसी तरह बात की तो उसने यही जवाब दिया की वो बचपन की बातें थी तब मुझमें इतनी समझ नहीं थी। वैसे भी तुम शाकाहारी हो शराब का सेवन नहीं करते जबकि हमारे यहाँ ये सब चलता है  तुम बारहवीं पास होकर नौकरी करोगे लेकिन सोबरन सिंह तो गाँव के संपन्न कृषक हैं आठ मजलूर तो उनके  यहाँ लगातार काम करते हैं। सोबरन सिंह से शादी मैं अपनी सहमति से कर रही हूँ सुखदयाल ने यही कहा था कि सोबरन सिंह अच्छा इंसान नहीं है उसके कई महिलाओं से संबंध हैं उसे शराब की बुरी लत है वो कोई काम नहीं करता है। तुम भले ही मुझसे  शादी मत करो पर उससे शादी का विचार त्याग कर किसी अच्छे लड़के से शादी कर लो  यह बात सुनकर रामसखी सुखदयाल से झगड़ पड़ी थी साथ ही यह भी कह गई थी कि अब भविष्य में मुझसे  कभी बात करने की कोशिश मत करना। इसके बाद सुखदयाल ने भी रामसखी का ख्याल अपने मन से निकाल दिया था। और अपना मन पूरी तरह पढाई में लगा दिया था अब,वे ट्यूशन पढाकर अपनी पढ़ाई का खर्च निकाल रहे थे। एम सी सी गणित में प्रथम श्रेणी से करने के बाद उनका चयन व्याख्याता के पद पर हो गया था। उनकी प्रथम पदस्थापना जिस स्कूल में हुई उस स्कूल में सुनीता भी शिक्षिका थी जो बाल विधवा थी।  उससे सुखदयाल जी की घनिष्टता बढ़ती गई फिर उनके सभी स्टॉफ ने उनकी शादी सुनीता से करा दी। सुखदयाल जी ने एम एड कर लिया था व्याख्याता बने हुए उन्हें पाँच साल हो गए थे तभी पी एस सी से सीथी भर्ती से प्राचार्य के पद की रिक्तियाँ निकलीं सुखदयाल जी ने उसमें आवेदन कर दिया उनका चयन प्राचार्य पद पर  हो गया  उस समय बरखेड़ा का स्कूल जो हाई स्कूल से हायर सेकेण्डरी में उन्नत हुआ था वहाँ सुखदयाल जी की,पदस्थापना प्राचार्य के पद पर हुई थी वे इससे बहुत खुश थे  वे जब पदभार ग्रहण करने  स्कूल में आए तो रामसखी को वहाँ  देखकर चौंके तभी उनके स्टॉफ के तिवारी जी  ने बताया ये यहाँ पर चपरासी है।  रामसखी  सुखदयाल को देखकर यही समझी की  वे स्कूल किसी काम से आए होंगे लेकिन जब उसने  उन्हें प्राचार्य के चैंबर में प्राचार्य की कुर्सी पर बैठे देखा तो उसे बड़ी हैरत हुई वो बाहर बरामदे में बैंच पर बैठ गई थोड़ी देर बाद जब  कॉल बेल बजी तो उठकर उसे प्राचार्य कै चैंबर में जाना पड़ा उस वक्त उसके चेहरे पर बेबसी थी पर सुखदयाल जी ने सपाट लहजे  में उसे आदेश दिया और काम में डूब गए बाहर आकर रामसखी ने राहत की साँस ली। घर आकर उन्हें पता चला कि रामसखी के ससुर के मरने के बाद सोबरन सिंह ने अपनी खराब आदतों के चलते उनकी पूरी जमीन जायदाद घर मकान सब बेच दिए थे। जब कुछ नहीं बचा तो सस्ती देशी शराब के चक्कर में जहरीली शराब के सेवन करने से उसकी दुखद मौत हो गई थी।  अब रामसखी अपने दो बच्चों के साथ एक छोटे से मकान में रह रही थी। सुखदयाल जी  ने तो अपना घर पक्का और बड़ा सर्वसुविधायुक्त बनवा लिया था सुखदयाल जी के  पिता कीरतलाल ने सोबरन सिंह से बीस एकड़ जमीन खरीदी थी।  जिसमें अधिकाँश रुपये सुखदयाल जी ने दिए थे उस जमीन पर सुखदयाल का छोटा भाई रामदयाल खेती कर रहा था अब सुखदयाल का परिवार गाँव का सम्मानित परिवार था रामसखी के ससुराल की सारी प्रतिष्ठा धूल में मिल गई थी रामसखी के पिता बुधराम बहुत बूढ़े हो गए थे  और घोर गरीबी मे अपना जीवन काट रहे थे। आज रामसखी  परमानेन्ट काश आदेश पाकर बहुत खुश थी उसने भरे गले से सुखदयाल जी से इतना ही कहा कि जब आप आए तब मैंने यह समझ लिया था कि मेरी नौकरी कच्ची है और आप मुझे नौकरी से निकलवा देंगे फिर मेरा क्या होगा मगर मुझे पता चला कि आपकी पहल से मैं परमानेन्ट हुई हूँ  तबसे मैं यही सोच रही हूँ कि किन शब्दों में आपका आभार व्यक्त करूँ सुनकर सुखदयाल बोले कोई आभार व्यक्त करने की जरूरत नहीं है मैंने अपने कर्तव्य का पालन किया है अब जाओ बाहर जाकर अपना काम देखो। रामसखी ने इतना ही कहा जी सर और बाहर आ  गई ।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप 


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