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कहानी: खोया अवसर

प्रकाश  पन्द्रह वर्ष बाद अपने गृहनगर शाहपुर आया था  जहाँ उसके भतीजे  नवीन की शादी थी। आज वह जब टेलर की दुकान पर गया तो उसे अपना सहपाठी प्रताप मिल गया वो टेलर की दुकान पर कपड़े सिलने का कार्य कर रहा था। प्रताप उसे देखकर बहुत खुश हुआ अभी दुकान  पर उसके पास कोई काम नहीं था इसलिए दोनों बातें करने लगे  प्रताप ने बताया अड़तीस साल से इस दुकान पर काम कर रहा हूँ। नो सौ रुपये महीने से काम शुरू किया था और अब नौ हजार रुपये महीने के मिल रहे हैं। आज के मँहगाई के दौर में बड़ी मुश्किल से गुजारा हो रहा है। छप्पन साल की उम्र हो गई अब और कोई काम कर नहीं सकता ।
फिर उसने प्रकाश से कहा तू बता तेरे कैसे हाल हैं  इस पर प्रकाश बोला बहुत बढ़िया हैं कुल मिलाकर एक लाख दस हजार रुपये महीन तनख्वाह मिल रही है। घर मकान दुकान जमीन जायदाद सब कुछ है बच्चे भी अच्छा कमा रहे हैं  बेटी दामाद भी संपन्न हैं। घर में कोई कमी नहीं है। प्रकाश की बात सुनकर प्रताप उदास हो गया कहने लगा नौ हजार में और एक लाख दस हजार में जमीन आसमान का अंतर है  काश अड़तीस साल पहले मैंने तेरी बात मान ली होती तो आज मैं भी तेरी तरह खुशहाल होता। प्रकाश ने कहा अभी तो रिटायरमेन्ट में छः साल का समय बाकी है। उस समय जब रिटायर होऊँगा तो पिचहत्तर हजार रुपये महीने पेंशन मिलेगी। आराम से कटेगा बुढ़ापा प्रताप बोला  मुझे तो  बुढ़ापे की चिंता सता रही है अभी तो मैं कमा रहा हूँ जब कमा नहीं पाऊँगा तब क्या हाल होगा ये सोचकर ही परेशान हो जाता हूँ। प्रताप की बात सुनकर प्रकाश भी दुखी हो गया था। प्रकाश जब से प्रताप  से मिलकर आया था तबसे उसी के विषय में सोच रहा था। प्रकाश अड़तीस वर्ष पूर्व  प्रताप के साथ कॉलेज में फर्स्ट इयर में पढ़ता था  तब प्रकाश के घर की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी अकेले पिताजी कमाने वाले थे जो हम्माली करते थे। उन पैसों में पाँच बहन भाइयों का गुजारा मुश्किल से होता था जबकि प्रताप पढ़ाई के अलावा टेलरींग का काम भी करता था जिससे उसे तीस रुपये रोज मिल जाते आज से अडैतीस वर्ष पूर्व तीस रुपय की बड़ी कीमत थी  उसके पिताजी भी हाट में कपडों की दुकान लगाकर अच्छा रुपया कमा लेते थे। उस वक्त शिक्षक के पद पर दोनों ने आवेदन किया था  चयन परीक्षा के बाद लिस्ट में दोनों का नाम आ गया था दोनों की पोस्टिंग पास पास के गाँव में हुई थी। प्रकाश ने तो नौकरी ज्वाइप कर ली  लेकिन प्रताप ने नहीं की कहा कि घर से चालीस किलोमीटर दूर गाँव में नौकरी लगी है जिसकी तनख्वाह तीन सौ रुपया महीना है जबकि नौ सो रुपया महीना  तो मैं रोज चार घंटे टेलर का काम करके कमा लेता हूँ प्रताप के पिताजी ने भी गाँव की नौकरी करने  से मना कर दिया था। प्रकाश ने नौकरी ज्वाइन कर ली थी उसके लिए तीन सौ रुपये महीना भी बहुत थे वो दो सौ रुपये घर देता तथा सौ रुपये में महीने भर अपना खर्च आराम  से चला लेता था। वो  जब शाहपुर आता तो प्रताप सहित उसके कई सहपाठी उसकी हँसी उड़ाते सब कहते गाँव के स्कूल की नौकरी कर प्रकाश ने अपने जीवन की  सबसे बड़ी भूल की है पर समय ने इस भूल को वरदान में बदल दिया था। जबकि प्रताप की उस वक्त की  समझदारी आज उसकी सबसे बड़ी मूर्खता नजर आ रही थी।जितनी तेजी से प्रकाश की तनख्वाह बढ़ी थी  उतनी तेजी से प्रताप  की नहीं बढ़ पाई थी जिससे वो कम आय  में मुश्किल से अपनी गुजर बसर कर रहा था।जबकि प्रकाश खुशहाल  और संपन्न था।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप 


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