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कहानी: उमराव दादा

अमर पुरा गाँव के उमराव दादा एक सौ दो वर्ष की आयु में भी पूर्णतः स्वस्थ थे। गाँव में उनकी उम्र का कोई  जीवित नहीं बचा था आज से दो वर्ष पूर्व उनकी भी साँस रुक गई थी धड़कन बंद हो गई थी उनके अंतिम संस्कार की तैयारी शुरू हो गई थी स्कूल में  दो मिनट का मौन धारण कराकर छुट्टी कर दी गई थी रिश्तेदार और जाति बिरादरी वाले इकठ्ठे हो गए थे। तभी उमराव दादा के शरीर में हलचल हुई  और वे आँखें खोलते हुए उठ बैठे। उन्हें जीवित देख सबको सुखद आश्चर्य हुआ था।
वे दिन में लाठी टेकते हुए गाँव के नीम वाले चौक पर आ जाते थे और अपने जीवन के अनुभव सबको सुनाया करते थे।
आज उमराव दादा के पास दस एकड़ सिंचित जमीन है दो पक्के मकान हैं ट्रेक्टर है। सुख सुविधा के सारे साधन हैं।
लेकिन उनके बचपन में उनके पास कुछ नहीं था उनके माता पिता बहुत गरीब थे। वे जब बडे हुए तो पटेल के यहाँ हाली लग गए थे। वे कहते थे हमें भरपेट भोजन नसीब नहीं होता था। कभी कभी शाम को पूरा परिवार भूखा ही सो जाता था। वे संत स्वभाव के सरल इंसान थे  गाँव में जब शिवरात्रि और श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के त्यौहार आते तो वे घोषणा कर देते जो भी व्रत रखेगा उसे फलाहार मेरी तरफ से कराऊँगा और वे अपना वचन निभाते। साबूदाने की खीर और खिचडी बनवाते और बड़े प्रेम भाव से व्रतधारियों को खिलाते थे एक बार शिवरात्रि का त्यौहार आने वाला था  सबको मालूम था उमराव दादा  फलाहार की व्यवस्था करेंगे इधर उमराव दादा परेशान थे घर में एक पैसा नहीं था फलाहार कैसे लाते  शिवरात्रि में एक दिन बचे थे आखिर वे हिम्मत कर साहूकार के पास इस हेतु रुपये उधार लेने गए  कान की सोने की मुरकी गिरवी रखकर साहूकार झनक से रुपये उधार माँगे। झनक ने मुरकी उन्हें लौटाते हुए रूपये दे दिए और कहा इसका ब्याज में आपसे नहीं लूँगा ना ही कभी तकाजा करूँगा जब आपके पास पैसे  आ जाएँ तो दे देना मुझे मालूम है आप ये पैसे व्रतधारियों के फलाहार के लिए ले जा रहे हैं। तो आपसे इनका ब्याज लेकर पाप का भागी क्यों बनूँ।  उमराव दादा के पास समय कम था चार कोस  दूर शहर से सामान लाना था रास्ते में जंगल पड़ता था बीच में कोई गाँव नहीं पड़ता था। वहाँ डाकू  वीरसिंह का आतंक था। वे डरते हुए चले जा रहे थे कि रास्ते में उन्हें एक आदमी भिला  उसने कहा अकेले कहाँ जा रहे हो तुम्हें मालूम नहीं ये डाकू वीरसिंह का इलाका है उमराव दादा उससे बड़े अपनेपन से बोले भगवान का कार्य करने जा रहा हूँ इसमें डर कैसा उमराव दादा की बात सुनकर वो आदमी बड़ा प्रभावित हुआ और उन्हें शहर तक छोड़ने गया  फिर बोला  कि मैं यहीं रुककर इंतजार कर रहा हूँ आप सामान लेकर आएँ। उमराव दादा ने दुकानों से फलाहार का सामान खरीदा  और शीघ्र ही आ गए तब भी साँझ घिर आई थी वो आदमी उनका इंतजार करता हुआ मिला  पूरा साढ़े तीन घंटे का पैदल सफर था उमराव दादा के सिर पर भारी बोझ था उस आदमी  ने उनका आधा बोझ अपने सर ले लिया था। दोनो बात करते हुए जा रहे थे अंधेरा हो गया था रास्ता दिखाई नहीं दे रहा था  पर वो आदमी  उन्हें सही मार्ग से  ले जा रहा था उमराव दादा कह रहे थे अच्छा हुआ  भाई तुम मिल गए तो सफर कट रहा है और वीरसिंह डाकू का डर भी नहीं सता रहा है वो आदमी मुस्कुराकर बोला वीरसिंह से मत डरो वो तो मेरा दोस्त है। उमराव दादा बोले व्रत तो तुम भी रखोगे  वो बोला हाँ तो दादा ने कहा कल फलाहार हमारे साथ करना  उसने हाँ में सिर हिला दिया वो आदमी उन्हें गाँव के पास छोड़कर जंगल में विलीन हो गया था। दूसरे दिन उमराव दादा ने बड़े कड़ाव में फलाहार तैयार करवाया  जब वे इसे वितरित करा रहे थे तब वो आदमी आया सबके साथ उसने भी फलाहार किया। और तृप्त तथा खुश होकर वहाँ से गया उसके जाते ही रज्जं पटेल बोले जानते हो उमराव दादा ये चौन था उमराव दादा बोले मेरे लिए तो ये किसी देवदूत से कम नहीं है इसके सहयोग से ही आज मैं सबको फलाहार करा सका हूँ अन्यथा कल वीरसिंह डाकू से मैं लुटपिटकर घर खाली हाथ लौटकर आता। रज्जू पटेल बोले उमराव दादा ये ही तो वीर सिंह डाकू है जिसका आसपास के पच्चीस गाँवों में आतंक है यह सुनकर उमराव दादा को विश्वास  ही नहीं हुआ वे कह रहे थे मुझे तो वो नेक इंसान लग रहा था। 
वीरसिंह कभी कभी उनसे मिलने आता था वीरसिंह ने ही उनकी नदी किनारे ऊसर पड़ी जमीन को आबाद कराया था झाड़ झखाड़ साफ करवाए और कुआ खुदवाया था जिसमें खूब पानी निकला था वीरसिंह ने यही कहा था उमराव दादा आज के बाद में फिर कभी मैलने नहीं आऊँगा अब कहीं हाली लगने की जरूरत नहीं  है अपनी जमीन पर खेती करो और खुश रहो। इसके बाद ही उनके दिन बदले थे अब तो उमराव दादा कोई काम नहीं करते थे सारा काम उनका बेटा हरिसिंह और पोता राजकुमार करते थे। उमराव दादा का मन करता तो वे कभी कभार खेत पर हो आते थे। 
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप  


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