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कहानी: अपने पराये

लखनलाल अस्सी वर्ष की उम्र में भी स्वस्थ जीवन जी रहा था। उसके साथ उसकी वृंदा भी  निरोगी थी। वे अपने पुत्र राहुल तथा पुत्रवधु निकिता के साथ रह रहे थे। बेटी रमा की शादी कर दी थी वो अपनी ससुराल में खुश थी। उनका पोता रितेश और पोती अंजना भी उनसे काफी घुले मिले हुए थे। उनके ऐसे सुखमय बुढ़ापे का कारण उनका वो निर्णय था। जो उन्होंने सही वक्त पर लिया था अन्यथा वो नारकीय जीवन जी रहे होते।
बात तब की है जब लखनलाल ड्राइवरी करता था। माता पिता के निधन के कारण उसकी शादी करने वाला कोई नहीं था। वह ट्रक लेकर दूर-दूर तक जाता था। जिस ट्रान्सपोर्ट से वो ट्रक लोड करता था, उसके पास ही उसने एक कमरा किराये से ले रखा था। वहीं वृन्दा भी अपने पूर्व पति शिवलाल के साथ रहती थी। शिवलाल मिस्त्री का कार्य करता था। शिवलाल का एक बेटा श्याम तथा दो बेटियाँ निशा और दिशा थीं। 
एक दिन खबर आई कि शिवलाल का काम करते समय बहुमंजिला इमारत से अचानक नीचे गिर जाने के कारण दुखद निधन हो गया। वृंदा के ऊपर ये भारी दुख टूट पड़ा था। शिवलाल के निधन के बाद वृंदा और उसके बच्चों की देखभाल करने वाला कोई नहीं था। वृंदा के सारे रिश्तेदार उसके पति की उत्तर क्रिया संपन्न कराकर चले गए थे। वृंदा कुछ दिनों तक तो पुरानी जमा पूँजी के सहारे अपना खर्च चलाती रही। लेकिन ऐसा कब तक करती। इसलिए उसने अपने लायक काम ढूँढना शुरू कर दिया था।लखनलाल उसके बगल में ही रहता था। वो वृंदा से सहानुभूति रखता था। तथा उसके कई काम कर दिया करता था। एक दिन वृंदा ने उसके सामने अपने दुखड़े बताते हुए कहा कि मेरी कम उम्र में शादी हो गई थी। अभी मेरी उम्र अठ्ठाइस वर्ष की है और तीन बच्चों की माँ हूँ। ऐसे में कौन मुझसे शादी करेगा। फिर उसने कहा, आपकी नजर में कोई ऐसा हो तो बताना जो मुझसे शादी कर मेरे बच्चों को भी अपना सके। तब लखनलाल ने हिम्मत कर कहा कि अगर आप को ऐतराज नहीं हो तो मैं आपसे शादी करने को तैयार हूँ। आपके बच्चों को भी अपना लूँगा। यह सुनकर वृंदा ने कहा आपसे अच्छा इंसान मुझे और कहाँ मिलेगा। मैं इतने सालों से आपको जानती हूँ मैंने आप में कोई बुराई नहीं देखी है। ऐसा कह वृंदा ने हाँ भर दी। इसके बाद उन्होंने कोर्ट में शादी कर ली। लखनलाल ने तो बच्चों को अपना लिया पर बच्चों ने उसे दिल से स्वीकार नहीं किया। उसने तीनों बच्चों के नाम स्कूल में फिर से लिखाए और उन को अपने बच्चों जैसा प्यार दिया। उसने सोचा ये बच्चे भी तो मेरे हैं। इनकी ही परवरिश करूँ, अपने खुद के बच्चे पैदा क्यों करूँ। शादी के चार साल हो गए थे। एक दिन उसने लड़के को जरा जोर से डाँट दिया क्योंकि वो पढ़ाई पर ध्यान नहीं दे रहा था। तो वो लड़का उससे बहस करने लगा, उसकी आवाज भी तेज थी। उस समय लखनलाल तो चुप हो गया पर भीतर उसके हलचल मच गई। उसका मन कह रहा था- ये लड़का उसके बुढ़ापे का सहारा तो कभी नहीं बनेगा, इससे उम्मीद बेकार है। यह सोचकर वो पलँग पर लेट गया और उसकी आँख लग गई, जब नींद खुली तो उसने देखा कि उसे सोया समझकर दोनों माँ बेटे बात कर रहे थे। बेटा कह रहा था मम्मी मैं इस आदमी को इसलिए बर्दाश्त कर लेता हूँ क्योंकि ये तुम्हारा पति है, ये मेरा बाप नहीं है न ये मेरे पिता की कभी जगह ले सकता है। मैं बड़ा हो जाऊँ और कमाई करने लग जाऊँ तब हम इसे छोड़ देंगे, फिर हम चारों साथ रहेंगे। यह बात सुनकर वृंदा हक्की बक्की रह गई उसने यही कहा बेटा तुझसे मुझे ये उम्मीद नहीं थी। उनसे अच्छा इंसान मैंने आज तक नहीं देखा जिनके बारे मैं तू ऐसी बात कर रहा है, मैं उनसे अलग होकर जीने की सोच भी नहीं सकती। सुनकर लड़का बोला- समय आने दो सब पता चल जाएगा। लखन को वृंदा की बात सुनकर बड़ा संतोष हुआ था। फिर उसने अपनी आँख खोल दी उसको जागता देख माँ बेटों ने अपनी बात बंद कर दी। इसके बाद जब बच्चे स्कूल गए थे तब उसने वृंदा से कहा कि मैंने शादी के बाद अपना बच्चा पैदा न करने का निर्णय लिया था। सोचा था कि इन्हीं बच्चों को अपना समझकर इनकी परवरिश करूंगा। पर अब लग रहा है कि अपना निर्णय बदल लूँ। सोचता हूँ हम दोनों का भी बच्चा होना चाहिए। उसकी बात सुनकर वृंदा खुश होकर बोली, मैं भी आपसे यही कहने वाली थी। उसके जवाब ने लखनलाल को खुशी से भर दिया था। इसके एक साल बाद उनका अपने बैटे का जन्म हुआ  जिसका नाम उन्होंने राहुल रखा राहुल के जन्म से वो तीनों बहन भाई खुश नहीं थे उन तीनों ने अपना अलग गुट बना लिया था। हद तो तब हो गई जब राखी के दिन दोनों बहनों ने राहुल की नन्ही कलाई पर राखी बाँधने से इंकार कर दिया। वृंदा तो बहुत नाराज़ हुई पर लखन चुप रहा। इसके बाद उनके घर बिटिया का जन्म हुआ जिसका नाम रमा रखा गया। लखनलाल ने मन में कोई भेद नहीं रखा था। तीनों बच्चों का वो अब भी ख्याल रख रहा था। उनकी पढ़ाई लिखाई का खर्च भी उठा रहा था। पर उन तीनों का उसके बच्चों के प्रति बर्ताव देखकर वो बहुत दुखी हो जाता था। राहुल और रमा के जन्म के बाद घर की काया पलट गई। लखनलाल ने ड्राइवरी छोड़कर लोडिंग ऑटो खरीद लिया था। उसमें उसकी अच्छी आमदनी होने लगी। फिर उसने दूसरा लोडिंग ऑटो भी खरीद लिया था। आमदनी बढ़ी तो पक्का मकान भी बन गया। लखनलाल ने गाँव की जमीन बेचकर पास में ही तीन एकड़ जमीन खरीद ली। जब उसके सामने से सड़क निकली तो दुकाने बनवा लीं। जमीन के फ्रंट में एक दर्जन दुकानें बन गईं थीं। सब किराये से चली गईं। एक दुकान लखन लाल ने खुद खोल ली जिसमें अपने खेत की सब्जी बेचना शुरू की। उधर पहले बेटे को भी उसकी पैतृक जमीन में हिस्सा मिल गया था। फिर भी उसकी नीयत लखनलाल की जायदाद पर थी। उसे राहुल राह का रोड़ा लग रहा था। कई बार उसने राहुल को जान से मारने की कोशिश की पर नाकाम रहा। अब राहुल भी अठारह वर्ष का हो गया था तथा कराटे का चैंपियन भी था। एक दिन देखा कि उसका सौतेला भाई उसके पिता से बहस कर रहा था। तथा एक करोड़ रुपये माँग रहा था और लखनलाल मना कर रहा था। जब उसे लगा कि लखनलाल उसे पैसे नहीं देगा तो वो मारपीट पर उतारू हो गया। लखनलाल की उम्र भी पचपन साल की हो गई थी और वो लड़का जवान था। उसने लखनलाल पर लठ उठा लिया और मारने लगा। लखनलाल ने लठ पकड़ लिया लेकिन उसकी पकड़ ढीली पड़ती जा रही थी। वो लखन पर हावी होता इसके पहले ही राहुल आ गया और उसने उस लड़के की ऐसी पिटाई की जिसे वो कभी चाहकर भी नहीं भूल पाएगा। इसके बाद कहा कि अब कभी इधर आया न तो तेरे हाथ पैर तोड़े बिना तुझे यहाँ से नहीं जाने दूंगा। तब उसने वृंदा को साथ ले जाने को कहा तो वृंदा बोली अपने अच्छे बेटे का साथ छोड़कर तेरे जैसे गुंडे मवाली के पास मैं क्यों रहूँगी। इसके बाद उस लड़के का फिर कभी यहाँ आने का साहस नहीं हुआ। तबसे राहुल अपने माता पिता के साथ सुखपूर्वक रह रहा था। अपने पिता के करोड़ों के कारोबार को उसने अच्छे से सम्भाल लिया था।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप


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