सुमन पूरे साल भर बाद राखी पर मायके आई थी सभी उसके आने से बहुत खुश थे। सुमन की मम्मी सुनीता की आँखों से तो ख़ुशी के आँसू छलक पड़े थे।, दोनों भाई विजय और अजय ने भी सुमन के आने पर कहा था अब हमारी राखी भी अच्छे से मनेगी बड़ी बहन जो आ गई है सुमन को पापा सोहन लिवाकर लाए थे वो ही कह रहे थे कि त्यौहार पर बिटिया घर न हो तो बुरा लगता है। सुमन की बिटिया रवीना तथा बेटे विकास की तो ख़ुशी का ठिकाना नहीं था।
आज सब भले ही एक दूसरे से घुले मिले लग रहे थे लेकिन पच्चीस वर्ष पहले ऐसा नहीं था। ये तब की बात है जब सुनीता के पति रात को मोटर सायकिल से घर आ रहे थे। रात का गहरा अंधेरा था अचानक गाड़ी का संतुलन बिगड़ा और वे तीस फीट गहरे सूखे नाले में मोटर सायकिल समेत गिर गए उन्होंने उस समय हेलमेट नहीं पहना उनके सिर में जबर्दस्त चोट लगी थी वे वहीं खत्म हो गए थे तब सुमन तीन साल की थी । पति के मरने पर सुनीता के ससुराल वालों ने उससे मुँह मोड लिया था सुनीता सुमन को लेकर मायके आ गई थी मायके में सुनीता के भाई मुकेश भाभी मंजू और भतीजा रोहन था मम्मी सुलोचना थी। सुनीता के पिता शिव प्रसाद का स्वर्गवास हो गया था वे शिक्षा विभाग में बड़े बाबू थे। उनके मरने के बाद मुकेश को अनुकंपा नौकरी मिली थी। तथा सुलोचना को पेंशन कुछ दिनों तक तो सब ठीक चलता रहा फिर सुनीता की भाभी मंजू ने परेशान करना शुरू कर दिया जबसे उसे पता चला कि सुनीता हमेशा के लिए मायके आ गई है तबसे वो उसे और अधिक परेशान करने लगी थी यह सुनीता की मम्मी सुलोचना को बर्दाश्त नहीं हुआ और वो बहू बेटे से अलग होकर सुनीता और सुमन के साथ रहने लगीं तब भी मंजू का मन नहीं माना वो ताने कसने लगी एक दिन सुलोचना ने बहू और बेटे मुकेश से कहा ये घर मेरे नाम से है यहाँ ठीक से रहो अगर ऐसे रहोगे तो मैं सहन नही करूँगी तुम्हें ये घर छोडकर जाना पड़ेगा यह सुनते ही मुकेश और मंजू काँप गए। मुकेश जानता था कि इस शहर में मकान किराया बहुत ज्यादा है अगर वो किराये से घर ले लेता है तो उसकी आधी तनख्वाह तो इसी में चली जाएगी दोनों ने गिरगिट की तरह रंग बदलते हुए माँ के पैर पकड़कर माफी माँग ली थी । सुलोचना ने उन्हें माफ कर घर में तो रहने दिया लेकिन अपना चूल्हा अलग कर लिया था। उन्हें लग रहा था कि उनके मरने के बाद सुनीता का क्या होगा ये सोचकर उन्होंने सुनीता की शादी किसी अच्छे से लड़के से कराने का विचार किया इसका पहले तो सुनीता ने विरोध किया फिर माँ की बात मान ली। माँ को सोहन पसंद आया पर सोहन ने शर्त रखी कि मैं सुनीता की लड़की सुमन को नहीं अपनाऊँगा। इस पर सुनीता नाराज हो गई पर जब माँ ने कहा मेरी भी इच्छा सुमन को अपने साथ रखने की है तो सुनीता ने शादी के लिए हाँ कर दी सोहन सुनीता को लेकर चला गया सुमन नानी के पास रह गई। सुनीता को साल भर बाद बेटा हुआ जिसका नाम विजय रखा। सोहन चाहते थे कि लड़की हो पर लड़का हो गया सुनीता ने दूसरी बार भी जब बेटे अजय को जन्म दिया तो उनकी आखिरी उम्मीद भी टूट गई। सुनीता जब मायके जाती तो अपने दोनों बेटों को भी ले जाती थी वहीं पर विजय और अजय का सुमन से लगाव बढ़ा वे कहते क्या हुआ मम्मी अगर हमारे पिता अलग हैं माँ तो हमारी एक है इसलिए हम तोनों माँ जाए भाई बहन है। वहाँ से जब दोनों भाई पापा के पास आए तो हर वक्त दीदी सुमन की बात करते रहते उनकी जिद के आगे उन्हें झुकना पड़ा वो एक हफ्ते के लिए सुमन को घर ले आए। इस एक हफ्ते ने सोहन के मन और विचार धारा को पूरी तरह बदल दिया था। सुमन के मन से सौतेले पिता का डर खत्म हो गया था । उसकी जगह स्नेह और प्रेम ने ले ली थी। अब सोहन सुनीता को बेटी के रूप में स्वीकार कर रखने को तैयार हो गए थे। सुमन को वहाँ रहते हुए दो महीना हो गए था एक दिन खबर आई की नानी गंभीर रूप से बीमार हैं उनका टाईफाइड बिगड गया था बहू बेटे ने उनका समय पर इलाज नहीं कराया था। सुनीता फौरन सुमन को तथा दोनो बेटो को ले सोहन के साथ मायके आ गई सुलोचना सुनीता से बोलीं अब लगता है कि मैं बचूँगी मुझे सुमन के भविष्य की चिंता है मेरे बिन इसका क्या होगा तभी सोहन ने कहा आप चिंता मत करै। मैंने सुमन को अपनी बेटी स्वीकार कर ली है इसकी पूरी जिम्मेदारी मेरी है ये बात सुनकर सुलोचना को बडा संतोष हुआ । मानो यह बात सुनने के लिए ही उनकी साँस अटकी हुई थी। उन्हों ने अपने प्राण त्याग दिए सुमन को लेकर सुनीता मायके से अपने घर आ गई थी सोहन को अब अपना परिवार भरा पूरा लग रहा था। सुमन ने एम बी ए किया सोहन ने उसकी शादी करा दी थी ।विदाई के बाद कई दिनों तक उनकी आँखों से आँसू नहीं सूखे थे। आज जब सुमन राखी पर मायके आई तो सबसे अधिक खुश सोहन ही थे।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप
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