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कहानी: गन्ने की चरखी

हाथ से चलने वाली गन्ने की  चरखी से रस निकाल कर अपने धंधे की शुरुआत करने वाला राम किशन आज फल फूल और सब्जी का माना हुआ व्यापारी था। शहर की पाश कॉलोनी में उसका आलीशान घर था गणमान्य नागरिकों में उसकी गिनती होती थी ।आज वो  शहर के उस स्थान पर गया था जहाँ पन्द्रह वर्ष पूर्व  वो  सब्जी का ठैला लगाता था।   वहाँ उसे हरलाल तथा रामलाल अब भी ठेले पर सब्जी बेचते हुए मिल गए।  वे राम किशन को देख कर बड़े खुश हुए दोनों ने उससे उस  गलती की माफी माँगी जिसके कारण रामकिशन को सब्जी का धंधा बंद कर गन्ने का रस बेचना पड़ा था। 
रामकिशन ने उनसे कहा तुम्हारी उस गलती ने ही तो मुझे इस  मुकाम पर पहौँचाया वरना मैं आज तुम्हारी तरह यहाँ ठेले पर सब्जी बेच रहा होता । रामकिशन जबसे वहाँ से लौटकर आया तबसे ही उसके मन में पुरानी यादें ताजा होकर उसे  व्यथित कर रही थीं।
जब वो ठेले पर सब्जी बेचता था तब रामलाल और हर लाल से उसका ग्राहकों को लेकर विवाद हो गया था। हरलाल और रामलाल ने मिलकर रामकिशन का धंधा चौपट करने की साजिश रची।  वो उससे सस्ती सब्जी बेचने लगे। दिन भर वो खाली बैठा रहता उसकी सब्जी बिकती नहीं थी ।सब्जी दूसरे दिन खराब हो जाती। तो उसे फैंकर कर ताजा सब्जी लाता उसका भी यही हाल होता। रामकिशन ये घाटा कब तक बर्दाश्त करता किराये के मकान में वो अपने चार बच्चों के साथ रहता था। हारकर उसने धंधा बदलने का विचार किया  उस समय गर्मी का मौसम प्रारंभ ही हो रहा था। उसने गन्ने का रस बेचने की योजना बनाई अपनी एफ डी तुडवा के बारह हजार रुपये निकाले जिसमें से नौ हजार रुपये में  उसने किसी से पुरानी  हाथ से चलने वाली गन्ने के रस की चरखी खरीदी  तीन हजार रुपये का अन्य आवश्यक सामान खरीदा  और उसी जगह अपना ठैला लगा दिया। रामलाल और हरलाल को रामकिशन के इस धंधें से कोई  ऐतराज नहीं था।  वे तो और खुश हुए दिन में चार बार उन्होंने उससे रस से  खरीद कर पिया। चरखी हाथ से चलती थी रामकिशन को कड़ी मेहनत करना पड़ती तब कहीं रस चरखी से निकल पाता था धीरे धीरे उसे इसका अभ्यास हो गया था ।  पूरे गर्मी भर उसने गन्ने का रस बेचा इससे उसे अच्छी आमदानी होने लगी  थी। गर्मी का मौसम खत्म होने वाला था  उसकै सामने चिंता थी कि  वो आगे क्या करेगा तभी एक दिन  एक भद्र महिला कुसुम जो उसके यहाँ से अक्सर रस ले जाती थी उसने कहा कि  उसके पड़ोस  में रहने वाले गुप्ता जी की शहर के एक बड़े निजी अस्पताल  के सामने फलों के रस की दुकान है वो पिछले तीन माह से कैंसर से पीड़ित होकर  इलाज करा रहे  हैं उनकी दुकान बंद पड़ी है  वो दुकान सामान सहित तुम अगर किराये से लेकर चलाओ तो उनको भी कुछ पैसे मिलने  लगेंगे  राम किशन इसके लिए सहर्ष तैयार हो गया गन्ने के रस  बेचने से जो उसे लाभ हुआ था उससे उसने दुकान में माल भरा वो दुकान चल निकली  गुप्ता जी को वो ईमानदारी से रोज किराया देने लगा  कुछ दिनों बाद गुप्ता जी का दुखद निधन हो गया  गुप्ता जी की पत्नी ने उस दुकान को सामान सहित बेचकर अपने  गाँव वाले घर जाकर खेती बाड़ी करने का विचार किया तब तक रामकिशन की  आमदानी बहुत अच्छी होने लगी थी  बैंक के मैनेजर आर के खरे जो उसके नियमित ग्राहक थे वे उसे लोन देने को तैयार हो गए रामकिशन ने अठारह लाख रुपये में वो दुकान गुप्ता जी की पत्नी से खरीद ली  रामकिशन ने अपना काम पूरी ईमानदारी से किया जिससे  उनकी दुकान अच्छा लाभ देने लगी तीन साल में उन्होंने दुकान का सारा कर्ज चुकता कर दिया था। जब  रामकिशन की पूँजी बड़ी तो उसने अस्पताल  के रसोईघर को सब्जी सप्लाई करने का ठैका ले लिया।  इससे उसे और भी कई कैंटीनों पर सब्जी सप्लाई करने के ठेके मिल गए सब्जी के साथ फलों की सप्लाई भी वो करने लगा था। फलों के लिए वो बागों  की फसल खरीद लेता उससे एक दम ताजे फल सप्लाई करता था।  उसके घर पे इससे धन की वर्षा होने लगी थी उसकी परिवार की आर्थिक स्थिति पूरी तरह से सुधर गई थी पाश कॉलोनी में बड़ा मकान ले लिया था मँहगी कार खरीद ली थी  इन पन्द्ह वर्षों ने उसकी काया पलट दी थी।  इसमें उसे अवसरों का लाभ तो मिला पर उसकी मेहनत ईमानदारी  सच्ची लगन का योगदान  भी कम नहीं था।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप 


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