सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

कहानी: नहीं मिली अनुकंपा नौकरी

निमेष की उम्र बत्तीस वर्ष की हो गई थी  वो फाइनेन्स में एम बी ए करने के बाद भी एक  फाइनेन्सर के यहाँ मात्र नौ हजार रुपये प्रतिमाह में सहायक की नौकरी कर रहा था जिसमें तीन हजार रुपये कमरे का किराया चला जाता था बाकी छःहजार में उसका खुद का गुजर मुश्किल से होता था। उसकी माँ निर्मला सरकारी विभाग में कार्यालय सहायक थीं उनकी मौत कैंसर से हो गई थी।  निमेष के पिता रामगोपाल खुद सरकारी नौकरी कर रहे थे इस कारण निमेष को अनुकंपा नौकरी नहीं मिली थी।
रामगोपाल तो तिरेपन साल की उम्र में दूसरी शादी कर सरिता को घर ले आए थे सरिता भी सरकारी नौकरी कर रही थी। उसकी चौदह वर्ष की बेटी थी अंजलि उसके पति का निधन दुर्घटना में हो गया था वो भी सरकारी नौकरी करते थे जिससे सरिता को अनुकंपा नौकरी मिल गई थी ।रामगोपाल ने उसकी बेटी अंजलि को तो अपना लिया था लेकिन अपने बिन माँ के बेटे निमेष को घर से निकाल दिया था। इसका कारण ये था कि जब निर्मला की मौत हुई तब सबने रामगोपाल को समझाया कि आप रिटायरमेंट ले लो जिससे निमेष को माँ की अनुकंपा नौकरी  मिल जाएगी फिर निभेष की शादी करके  बहू ले आना और सुखपूर्वक रहना इतनी पैंशन तो मिल ही जाएगी लेकिन रामगोपाल इस तरफ ध्यान ही नहीं दिया। निर्मला की मौत के बाद अपनी दूसरी शादी के लिए प्रयास करना शुरू कर दिए इसका निमेष ने प्रबल विरोध किया जिससे बाप बेटे के संबंध तनावपूर्ण हो गए  और जब  वे सरिता से शादी करने वाले थे तब निमेष की और उनकी खूब कहासुनी हुई उधर सरिता भी नहीं चाहती थी उसके पति की पहली पत्नी का बेटा उसके साथ रहे नतीजा यह हुआ कि रामगोपाल ने अपने इकलौते बेटे निमेष को घर से निकाल दिया था। तबसे निमेष अकेला ही रह रहा था। रामगोपाल सुखी और संपन्न जीवन जी रहे थे उनके पास कार थी खुद का फ्लेट था कमाऊ पत्नी थी खुद की अच्छी सरकारी नौकरी थी दूसरी और निमेष का भविष्य सँवारने वाला कोई नहीं था उसका सरपरस्त भी कोई नहीं था पिता ने उससे मुँह मोड़ ही लिया था।  निमेष को अपनी माँ की बहुत याद आती थी आज अगर   माँ जिन्दा होती  तो उसका ऐसा हाल नहीं हुआ होता। आज भी वो अपनी माँ को याद कर अपने आँसू बहा रहा था। जबकि उसके पिता अपनी नई पत्नी के प्रेम में ऐसे डूबे थे कि अपनी पहली पत्नी को पूरी तरह भूल गए थे।
*****
रचनाकार
प्रदीप कश्यप 


टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

व्यंग्य : जीते जी रोटी को तरसाया मरने के बाद श्राद्ध

आज कल सोलह श्राद्ध का समय चल रहा है कई जगह पर श्राद्ध के आयोजन हो रहे हैं बहुत सारे लोगों को भोजन कराया जा रहा है अपने पितरों के श्राद्ध में लोग हज़ारों रुपये भी खर्च कर रहे हैं उनमें कुछ तो ऐसे हैं जिन्होंने जीते जी अपने बूढ़े माँ बाप की खबर तक नहीं ली और अब उनके मरने पर उनके श्राद्ध पर बड़ा आयोजन कर रहे हैं उनकी तस्वोर पर माला चढ़ा रहे हैं। ऐसे लोगों में शहर के रविकांत जी भी हैं उन्होंने अपने स्वर्गीय माता पिता की तिथि पर भव्य आयोजन किया था खूब पकवान खिलाए गए थे खूब दान किया गया था पर उन्होंने अपने माता पिता को जीते जी बहुत दुख दिए थे। उनके पिताजी सत्तासी वर्ष के थे माँ पिच्यासी वर्ष की दोनों अपने पुराने घर में रहते थे उनका बेटा रविकांत उनकी कभी खोज खबर नहीं लेता था बेटी विदेश में दामाद के साथ रह रही थी। वे दोनों ही एक दूसरे का ख्याल रख रहे थे एक दिन रविकांत जी के पिताजी का दुखद निधन हो गया तब रविकाँत घर?आया पिताजी की उत्तर क्रिया करने के बाद चला गया रविकाँत की माँ अकेली रह गई थीं वे सीधी सरल थी जबकि बेटा बहू चपल चालाक बेटे बहू ने बातों में लेकर उनकी सारे सोने चाँदी के जे...

दुर्भावना रखकर निंदा करने वाले लोग (व्यंग्य)

कबीर जी ने निंदक को इसलिए हितकारी कहा है क्योंकि वो हमारी बुराइयों को उजागर करते हैं और हम उन्हें दूर करते चले जाते हैं। इस तरह हमारा स्वभाव निर्मल हो जाता है। लेकिन आज के दौर में दुर्भावना रखकर निंदा करने वालों की संख्या ज्यादा हो गई है। ऐसे लोग हमारी बुराईयों को उजागर नहीं करते बल्कि हमारी खूबियों को छिपाकर मन में दुर्भावना रखते हुए हमारी निंदा करते हैं। इन लोगों से दूर रहने में ही भलाई है। अगर इनको साथ रखा तो ये हमारा मनोबल तोड़कर रख देंगे। हमें नकारा साबित करने की कोशिश करेंगे हमारे आत्मविश्वास को डगमगा देंगे। ये दुर्भावना रखकर निंदा करने वाले लोग अपने विरोधियों को निपटाने में कोई कसर नहीं छोड़ते। उसके सारे अवसर या तो खत्म कर देते हैं या छीन लेते हैं। ये लोग हद दर्जे के मतलबी इंसान होते हैं। जिस से मतलब निकालना हो उसकी झूठी तारीफों के पुल बाँधते हैं। उसकी खूब चापलूसी करते हैं उसे महान सिद्ध कर देते हैं और समाज में एक भ्रम की स्थिति पैदा कर देते हैं। ये ग्रुप बनाने में माहिर होते हैं। जो इनके गुट में शामिल हो जाता है ये उसके हर ऐब ढँक लेते हैं। उसे स्थापित करने के हर स...

कहानी: शादी के लिए नौकरी

रवीन्द्रसिंह को एक प्राईवेट दवा कंपनी में नौकरी किए अभी एक महीना भी नहीं हुआ था कि वह नौकरी छोड़ने का इरादा करने लगा था  लेकिन उसकी  माँ कंचन  का कहना था  जब तक  तेरी शादी न हो जाए  तब तक नौकरी करता रह जब शादी हो जाए तब नौकरी छोड़ना जबकि रवीन्द्र सिंह सोच रहा था कि एक महीना गुजारना मुश्किल हो रहा है कब तो उसकी शादी होगी और कब वो ऐसी नौकरी से पीछा छुड़ाएगा रवीन्द्र सिंह की  उम्र पैंतीस वर्ष की होने जा रही थी  और वो अभी तक कुँवारा  था कंचन जी का वह इकलौता लड़का था  उनकी दो लड़कियाँ थीं दोनों रवीन्द्द से बड़ीं थीं दोनों की शादी हो गईं थी दोनों के बच्चे   कोई छठी में तो कोई सातवीं में तो कोई आठवीं में पढ़ रहा था।  कंचन जी कस्बे के  एक सरकारी दफ्तर में चपरासी की नौकरी कर रही थीं  उनके पति सुरेन्द्रसिंह  सरकारी दफ्तर में बाबू थे  सरकारी काम से जब वे कहीं जा रहे थे तब  एक ट्रक ने उन्हें टक्कर मार दी थी जिससे उनका वहीं दुखद निधन हो गया था।  जब रवीन्द्र एक साल का था तब उसके पिता का निधन हुआ था उसकी दोन...