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कहानी: सेल्फी

एस डी ओ पी रवीन्द्र वर्मा पुलिस विभाग के ईमानदार और तेज तर्रार अधिकारी थे कई अनसुलझे केस उन्होंने सुलझाए थे यही कारण था कि अभी उनकी सात वर्ष की नौकरी हुई थी और वे सब इंस्पेक्टर से तरक्की करते हुए एस डी ओ पी बन गए थे। विभाग के वरिष्ठ अधिकारी  भी  उनके सुझावों का सम्मान करते थे।
नौ वर्ष पूर्व एक घटी एक घटना ने उनकी जिंदगी बदल दी थी उस समय रवीन्द्र के पिता रमेश ठैकेदार के यहाँ मिस्त्री का काम करते थे। ज्यादा आमदनी थी नहीं ऐसी  स्थिति में भी उन्होंने रवीन्द्र को बी ए तक पढ़ा दिया था।  बी ए पास करने के बाद रवीन्द्र बेरोजगारों की भीड में शामिल होकर नौकरी की तलाश कर रहे थे  उनकी पुलिस विभाग में जाने की इच्छा थी इसकी वे तैयारी भी कर रहे थे। हाल ही में पुलिस कांस्टेबल भर्ती परीक्षा का रिजल्ट आया था उसमें उनका नाम नहीं था इससे वे बहुत दुखी थे दूसरी  ओर उनका सहपाठी दिनेश  जो उनसे हर मामले में कम था  उसका चयन हो गया था दिनेश के पिता  ओमप्रकाश  रवीन्द्र के पिता  रमेश के मित्र थे। वे बड़े खुश थे उन्होंने रमेश को उदास देखकर कहा कि बिना जुगाड़ के नौकरी नहीं लगती मैंने पूरे बीस लाख रुपये दिए हैं  तब कहीं दिनेश  का नाम लिस्ट में आया है। अभी वेटिंग लिस्ट और है उसमें रवीन्द्र का नाम है अगर तुम इतने पैसे की व्यवस्था कर सको तो मैं उस व्यक्ति से बात करूँ जिसने दिनेश का चयन कराया।  रमेश जी ने कहा कि दो दिन का वक्त दो मैं सोचकर बताऊँगा। यह बात जब रमेश जी ने घर आकर रवीन्द्र तथा उसकी मम्मी कमला से कही तो  कमला तो सहमत हो गई लेकिन रवीन्द्र ने इसका प्रबल विरोध किया कहा मैं इस तरह नौकरी हासिल नहीं करूँगा  मुझे अपनी योग्यता पर पूरा भरोसा है।  लेकिन जब वेटिंग लिस्ट से भी वो चयन से वंचित रह गए तो थोड़े असहज हो गए मगर अपने विश्वास को डगमगाने नहीं दिया सुब्ह सुब्ह वो रनिंग वाक पर जाते थे। आज भी वे रनिंग वाक पर गए थे  लौटते समय जब वो तालाब के ऊपर बने पुल से गुजर रहे थे तो अचानक उनकी नजर पुल की रेलिंग पर पड़ी  जिस पर एक प्रेमी जोड़ा बैठकर सेल्फी ले रहा था। वो फौरन समझ गए कि  अनहोनी होने वाली है वे उन्हें ऐसा करने से रोकने के लिए तेजी से उनकी ओर बढ़े लेकिन तब तक देर हो चुकी थी लड़का जो सेल्फी ले रहा था उसका संतुलन गड़बड़ा गया और वो तालाब में गिर गया उसे बचाने के फेर में लड़की भी तालाब में गिरने लगी लेकिन उसके कपड़े  पुल  के पोल से निकले एक सरिया में फँस गए और वो अधर में लटक गई रवीन्द्र ने एक पल भी गँवाए बिना तालाब में छलाँग लगा दी वे अच्छी  तरह तैरना जानते थे उन्होंने उस युवक को डूबने से बचा लिया था  पुल के ऊपर लोगों की भारी भीड़ जमा हो गई थी उनमें से कई ऐसे थे जो तैरना जानते थे पर सब तमाशा देख रहे थे कुछ लोग वीडियो बना रहे थे रविन्द्र युवक को किनारे छोड़ तेजी से लड़की को बचाने के लिए आए  उन्हें पता चला गया था कि लड़की ज्यादा देर तक  लटकी नहीं रहेगी वे तालाब में तैरते हुए उसके ठीक नीचे पहुँच गए थे।  पुल के ऊपर से किसी ने लड़की को बचाने के लिए रस्सी फैंकी  लड़की ने रस्सी पकड़ने के लिए जोर लगाया रस्सी तो हाथ नहीं आई लेकिन इससे सरिए में फ॔सा कपड़ा पूरी तरह फट गया और लड़की सीधी तालाब में गिरी  जैसे ही लड़की गिरी वैसे ही रवीन्द्र ने उसे डूबने से पहले थाम लिया और उसे बचाकर किनारे पर ले आए इसह पूरी घटना का वीडियो लोगों ने बना लिया था जो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया था  वो दोनों डूबने से बच गए थे । एम्बुलैन्स आ गई थी पुलिस भी आ गई थी  कैमरे में वहाँ ड्यूटी पर उपस्थित पुलिस जवान भी तमाशबीनों के बीच खड़ा नजर आ रहा था जबकि वो भी तैरना जानता था लेकिन वरिष्ठ अधिकारियों के आते ही,वो फौरन उनके सामने आकर सक्रियता दिखाने लगा  उसके इस बर्ताव से लोग नाराज हो गए वीडियो वायरल होने के बाद  एस पी ने उस कान्स्टेबल को निलंबित कर दिया था रवीन्द्र  पूरे देश का रियल हीरो बन गया था  महामहिम देश के राष्ट्रपति महोदय ने उन्हें छब्बीस जनवरी पर पुरूस्कृत किया था जब वे पुरूस्कार लेकर लौटे तो प्रदेश के मुख्यमंत्री जी ने उन्हें बुलाकार उनसे भेंट की तथा  क्वालीफाई करने पर उन्हे पुलिस विभाग में सब इंस्पेक्टर की  नौकरी ऑफर की  रवीन्द्र जी की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। क्वालीफाई तो वे थे ही अगली केबिनेट की बैठक में उनकी नौकरी का प्रस्ताव भी पारित हो गया रवीन्द्र को पुलिस आफिसर की नौकरी मिल गई थी उनके पिता रमेश जी की खुशी का ठिकाना नहीं था ट्रेनिग के बाद जैसे ही रवीन्द्र को पदस्थापना मिली वैसे ही उन्होंने अपनी कार्यशैली से सब पर गहरी छाप छोड़ना शुरू कर दिया उनके थाना क्षेत्र की एक फेक्ट्री में रात को दो बजे उन्होंने    जान की बाजी लगाकर जहरीली गैस के रिसाव को रोक दिया जिससे चार सौ श्रमिकों की जान बची इस उपलब्धि ने उन्हें सब इंस्पेक्टर से इंस्पेक्टर बना दिया अब वे एस एच ओ बन गए थे दिनेश उनके अधीनस्थ था वो अभी भी कांस्टेबल ही था।  एस एच ओ की ड्यूटी के दौरान ही उन्होंने बड़े आतंकवादी हमले  होने से पहले आतंकवादियों को दबोचकर  हजारों लोगों की जान बचाई इससे उन्हें शौर्य पदक मिला तथा बारी से पहले पदोन्नति देकर उन्हें एस डी ओ पी बनाकर मुख्यमंत्री के सुरक्षा स्टॉफ में शामिल कर दिया गया था।  दिनेश आठ साल की नौकरी के बाद भी कांस्टेबल ही था उसके जल्दी प्रमोशन की उम्मीद भी नहीं थी।जबकि रवीन्द्र की संभावनाओं के द्वार खुले हुए थे।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप 


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