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कहानी: बागी

पिछली बार पार्टी से बगावत कर विधायक का चुनाव जीतकर पूरे पाँच साल मंत्री रहे जगजीत सिंह इस बार पार्टी के प्रत्याशी बनकर फिर चुनाव जीत गए थे इस बार भी उनके मंत्री बनने की प्रबल संभावना थी।
जगजीत सिंह छात्र जीवन से तिकड़मबाज दबंग  थे क्षेत्र में उनकी जाति के मतदाताओं की संख्या उल्लेखनीय थी। पिछली बार के विधान सभा चुनाव में उन्होंने पार्टी से टिकट माँगा था लेकिन पार्टी ने वर्तमान विधायक प्रकाश  चंद को जिताऊ समझकर टिकट दे दिया था प्रकाश चंद् भी जगजीत सिंह की ही जाति के थे। जगजीत ने  इसके विरोध में निर्दलीय  प्रत्याशी के रूप में अपना नामाँकन  प्रस्तुत कर दिया था इससे नाराज होकर पार्टी ने उन्हें सदस्यता से वंचित कर दिया था। चुनाव में जगजीत  का जोर देख कर तथा प्रकाश चंद्र के दवाब में आकर जगजीत सिंह को पुराने आरोप में बंद कर जेल में डाल दिया था  जेल में जगजीत सिंह की मुलाकात अनेक मुजरिमों से हुई  उनमें कई ऐसे थे जिनका बाहर बड़ा प्रभाव था  वे सब जगजीत सिंह के समर्थक बन गए थे प्रकाश के रूखे व्यवहार और भ्रषाटाचार से जनता वैसे ही त्रस्त थी। इसलिए जनता ने जगजीत सिंह को जिता दिया चुनाव में विरोधी पार्टी की जीत की अफवाह फैल रही थी पर चुनाव परिणाम आए तो दोनों पार्टियों को बराबर सीट मिलीं अब सरकार बनाने में निर्दलीय जगजीत सिंह की भूमिका महत्वपूर्ण हो गई थी। जो पहले सत्ता में थी उस पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने जगजीत सिंह से सम्पर्क किया। जगजीत सिंह को केबिनेट मंत्री बनाने का वादा कर के पार्टी फिर सत्ता में आ गई पूरे पाँच सात तक जगजीतसिंह ने सत्ता की मलाई का स्वाद चखा उनके सारे समर्थक भी  धनवान बन गए इसके साथ ही जगजीतसिंह ने कई जन हितैषी कार्य भी कराए जनता के बीच अपनी पकड़ बनाए रखी  पाँच साल बाद जब फिर चुनाव आए तो जगजीत सिंह को पार्टी से टिकट मिल गया था जिससे प्रकाश चन्द्र ने नाराज होकर पार्टी  छोड़ दी तथा विरोधी पार्टी के प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ा  इस बार विरोधो पार्टी की छवि बहुत खराब थी  जिसके परिणामस्वरूप प्रकाश चन्द्र फिर चुनाव हार गए थे।  इस हार ने उन्हें पूरी तरह मिटा दिया था वे अर्श से फर्श पर आ गए थे उन्हें अपना भविष्य अंधकार में दिखाई दे रहा था एक ओर जगजीत सिंह का विशाल विजय जुलूस निकल रहा था दूसरी और प्रकाश चँद्र अपने घर पर बैठे हार का शोक मना रहे थे उस समय उनके पास गिने चुने समर्थक ही थे जो उन्हें झूठी दिलासाएँ दे रहे थे।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप 


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