सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

कहानी: हायरी किस्मत

कभी संपन्न दुकानदार एवं वर्कशॉप के मालिक रहे रतनलाल जी का घोर दरिद्रता में रहते हुए दुखद निधन हो गया था। उनकी अंत्येष्टि लोगों ने चंदा एकत्र कर की थी। किस्मत ने उनके साथ वो खेल खेला था जिसमें वो कहीं के नहीं रहे थे। उनका अंतिम समय बड़ा दुखदायी और कष्टदायी बीता था।
रतनलाल  इस कस्बे के रहने वाले नहीं थे वे अमृत नगर से दस वर्ष पूर्व अपने जमे जमाए कारोबार को छोड़कर आए थे। यहाँ आकर वे अपना कारोबार जमा पाने में असफल हुए जमापूँजी गँवाने के बाद निजी मकान और दुकान बेचकर उन्हें मजदूरी करना पड़ी। छोटे से किराये के मकान में रहना पड़ा था।
रतनलाल जब अमृत नगर में रहते थे  तब उनकी स्टील व लोहे के फर्नीचर की दुकान थी। उससे लगी वर्कशॉप भी थी। उनके दो लड़के थे। बड़े लड़के का नाम महेश और  छोटे के नाम उमेश था। अमृतनगर में उनका कारोबार अच्छा चल रहा था, लेकिन एक घटना ने उन्हें शर्मसार कर दिया। वे कहीं मुँह दिखाने के काबिल नहीं रहे। अपना कारोबार समेट कर उन्हें यहाँ आना पड़ा। घटना कुछ इस प्रकार घटी- उनका बडा लड़का महेश जिसकी उम्र बत्तीस साल की थी वो गुजरात  में एक फेक्ट्री में काम करता था। वहाँ उसको अच्छी तनख्वाह मिलती थी। अमृत नगर की दुकान और वर्कशॉप उसका छोटा भाई उमेश और रतनलाल चलाते थे। उस कस्बे में उनकी ये इकलौती दुकान थी जो खूब चलती थी। घर में किसी चीज की कमी नहीं थी। सारा हिसाब किताब महेश की पत्नी कीर्ति देखती थी। वो उनमें ज्यादा पढ़ी लिखी थी। उसकी दो लड़कियाँ शिवानी और सपना थीं। तथा दो लड़के दिनेश और नरेश थे। दिनेश तीन साल का था और नरेश एक साल का, शिवानी दस साल की थी और सपना आठ साल की। और सब तो कारोबार में व्यस्त रहते थे। घर में बड़ी कीर्ति और छोटी बहू अनिता रहतीं थीं। अनीता ज्यादातर किचन में रहती थी और कीर्ति बाहर के काम देखती थी। कीर्ति के पति महेश घर से बाहर थे। कीर्ति की घनिष्टता उसके बगल में रहने वाले युवक राकेश से बढ़ने लगी थी। धीरे-धीरे वे एक दूसरे के करीब होते चले गए। उनके बीच प्रेम पनप गया था। युवक राकेश कुँवारा था और कीर्ति से चार साल छोटा भी, पर प्यार तो अंधा होता है। राकेश ने यह भी नहीं सोचा कि यह चार छोटे बच्चों की माँ है। कीर्ति  की ममता ने भी उसके बहके कदम नहीं रोके और उसने युवक राकेश से शादी कर ली। अपने बसे बसाए घर परिवार को छोड़कर राकेश के साथ रहने लगी। इसकी खबर चारों तरफ फैल गई। उसके बच्चों का रो रोकर बुरा हाल हो रहा था। जिसकी आवाज उस तक जाती थी, फिर भी उसका कलेजा नहीं पसीजता था। खबर सुनकर महेश आया, लाख प्रयासों के बाद भी कीर्ति के मन को कोई बदल नहीं पाया। महेश ने हारकार कीर्ति से कारोबार एवं नगदी का हिसाब माँगा तो उसने दो टंक लहजे में कहा मेरे पास तुम्हारा एक रुपया भी नहीं है। महेश ने अपने बच्चों का वास्ता दिया तो कीर्ति ने कहा बच्चे तुम्हारे हैं। तुम सम्भालो, मैं कोई मायके से इन्हे अपने साथ नहीं लाई थी। महेश के बच्चे दादी सम्भाल रही थी। एक दिन बात ही बात में राकेश और महेश के बीच तीखी तकरार हो गई जो मारपीट में बदल गई। राकेश पहले से ही इसके लिए तैयार था। उसने लड़के बुलवा लिए, वो महेश पर भारी पड़ गया था। मामला पुलिस तक पहुँच गया। इस बीच दो महीने तक उनकी दुकान बंद रही। रुपये पैसे का गोलमाल कीर्ति पहले ही कर चुकी थी। दो माह से महेश भी काम पर नहीं गया था। वे कर्ज के दलदल में फँस गए थे। रतनलाल जी सबसे ज्यादा दुखी थे। दो महीने बाद रतनलाल जी ने किसी से तीन लाख रुपये लेकर दुकान फिर से खोली, मगर तब तक ग्राहकी खत्म हो चुकी थी। उनकी दुकान के सामने एक और वैसी ही दुकान खुल गई थी। इस दुकान के सारे ग्राहक उस दुकान पर चले गए थे। रतनलाल जी का अब अमृत नगर में बिल्कुल मन नहीं लग रहा था। उन्होंने पन्द्रह लाख में मकान-दुकान बेच दी थी और इस कस्बे प्रेमपुर में आ गए थे। यहाँ उन्होंने घर व दुकान खरीद तो ली थी पर अजनबियों बीच अपनी दुकान नहीं जमा पाए, तो हताश होकर शराब पीने लगे। पैसठ साल की उम्र में वे कोई और काम कर भी नहीं सकते थे। छोटा बेटा उमेश भी अत्यधिक मात्रा में शराब पीने लगा था। वो पैंतीस साल की उम्र में ही संसार छोड़कर चल बसा। पत्नी अनीता एक होटल पर दिन भर बर्तन माँझती थी। तब उसे साढ़े सात हजार रुपये महीना तनख्वाह मिलती थी। बड़ा लड़का यशदीप तेरह वर्ष की उम्र में एक दुकान पर काम करता, जहाँ उसे तीन हजार रुपये तनख्वाह मिलती। वे एक हजार रुपये महीना किराया देकर झोपड़ीनुमा मकान में रहने लगे थे। प्रेमनगर में कारोबार नहीं चला तो रतनलाल भी शराब पीने लगे। यहाँ उनका भी मकान दुकान बिक गई थी। जो पैसे आए उससे महेश की दोनों लड़कियों की शादी कर दी। महेश गुजरात से ही एक निस्संतान महिला पूजा को पत्नी बनाकर ले आया था। वो भी किराये के मकान में रह रहा था। रतनलाल जी तो देह छोड़कर दर्द-दुख से मुक्त हो गए थे। पर उनका परिवार अभी भी नारकीय जीवन जी रहा था।
*****
रचनाकार
प्रदीप कश्यप 


टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

व्यंग्य : जीते जी रोटी को तरसाया मरने के बाद श्राद्ध

आज कल सोलह श्राद्ध का समय चल रहा है कई जगह पर श्राद्ध के आयोजन हो रहे हैं बहुत सारे लोगों को भोजन कराया जा रहा है अपने पितरों के श्राद्ध में लोग हज़ारों रुपये भी खर्च कर रहे हैं उनमें कुछ तो ऐसे हैं जिन्होंने जीते जी अपने बूढ़े माँ बाप की खबर तक नहीं ली और अब उनके मरने पर उनके श्राद्ध पर बड़ा आयोजन कर रहे हैं उनकी तस्वोर पर माला चढ़ा रहे हैं। ऐसे लोगों में शहर के रविकांत जी भी हैं उन्होंने अपने स्वर्गीय माता पिता की तिथि पर भव्य आयोजन किया था खूब पकवान खिलाए गए थे खूब दान किया गया था पर उन्होंने अपने माता पिता को जीते जी बहुत दुख दिए थे। उनके पिताजी सत्तासी वर्ष के थे माँ पिच्यासी वर्ष की दोनों अपने पुराने घर में रहते थे उनका बेटा रविकांत उनकी कभी खोज खबर नहीं लेता था बेटी विदेश में दामाद के साथ रह रही थी। वे दोनों ही एक दूसरे का ख्याल रख रहे थे एक दिन रविकांत जी के पिताजी का दुखद निधन हो गया तब रविकाँत घर?आया पिताजी की उत्तर क्रिया करने के बाद चला गया रविकाँत की माँ अकेली रह गई थीं वे सीधी सरल थी जबकि बेटा बहू चपल चालाक बेटे बहू ने बातों में लेकर उनकी सारे सोने चाँदी के जे...

व्यंग्य: चापलूसी से मिली उपलब्धियाँ।

चापलूसी से मिली उपल्बिधियों का जब लोग बड़े गर्व से बखान कर के फूले नहीं समाते । तब खुद्दार टाइप के लोग उन पर अधिक ध्यान नहीं देते पर कुछ चापलूस टाइप के लोग उन्हें बड़ी हसरत से देखते हैं वे उनके जैसा बनकर वे सब उलब्धियाँ हासिल करने के ख्वाब देखने लगते हैं। ऐसे ही एक सेवानिवृत कर्मी अपनी उपलब्धियों का बखान कर रहे थे कुछ गौर से सुन रहे थे कुछ ऊब रहे थे वहीं सुरेश जी उनकी बात सुनकर मन ही मन मुस्का रहे थे क्योंकि उन्हें उनकी असलियत पता थी। किसी ने उन से पूछ लिया आप भी सतीश जी के विभाग में कार्यरत थे आपकी और इनकी नौकरी की शुरूआत एक ही पद से हुई थी फिर ये इतनी तरक्की क्यों कर गए जरा इस विषय में कुछ बताएँगे वे बोले अगर हम बताएँगे तो ये नाराज हो जाएँगे लोगों ने कहा कुछ भी हो आप तो बताइए वे बोले तो सुनो। नौकरी से पहले हम मित्र थे तब हमें मालूम नहीं था कि ये खुदगर्ज टाइप के चापलूस इंसान हैं। हम दोनों की पोस्टिंग फील्ड में हुई थी। हम किसी की चापलूसी नहीं करते थे और अपने काम से मतलब रखते थे। जबकि इन्होंने मुख्य कार्यालय में अपनी चापलूसी से घुसफैठ कर ली थी कहीं जातिवाद कहीं क्षेत्रवाद कही भाषाव...

व्यंग्य: समझदारी या मूर्खता

सामान्य ध्यमवर्गीय परिवार में नौकरी को प्राथमिकता दी जाती है । उस परिवार में अगर कोई युवक पढ़ लिखकर सरकारी नौकरी हासिल करने में सफल हो जाए तो उसे उसकी बहुत बड़ी उपलब्धि माना जाता है उसके पिता का सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है । विवाह योग्य कन्याओं के पिताओं का आना उनके यहाँ शुरू हो जाता है लाखों रुपये दहेज के ऑफर मिलते हैं। धूमधाम से शादी होती है लडके के हर नाज नखरे ससुराल वालों द्वारा उठाए जाते हैं ऐसे में अगर लड़के को रिश्वत की कमाई हो रही हो तो उसे अच्छा मान लिया जाता है उसका रुतबा ऐसे लोगों के बीच बढ़ जाता है। इस तरह के परिवारों में अगर कोई लड़का मेधावी हो अच्छे अंकों से उच्च शिक्षित हो और वो नौकरी नहीं करना चाहे तो उसके परिजनों को यह नागवार लगता है।  रोहित ने हमेशा कक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त किया था। उसने बि ई में यूनिवर्सिटी में टॉप किया था। नौकरी करने की उसकी इच्छा नहीं थी इससे उसके पिता दुखी रहा करते थे। एक बार एक सरकारी विभाग में क्लर्क की नौकरी निकली तो उसके पिता ने जोर देकर उसका आवेदन जमा करा दिया चयन मैरिट बेस पर होना था। उसका स्कोर अच्छा था । इसलिए उसका चयन ह...