डाकघर के सहायक पोस्टमास्टर अनोखीलाल
दिनभर काम में व्यस्त रहने के बाद शाम को घर आए थे। साथ में उनकी पत्नी अनीता भी थी। अनीता वहाँ डाक सहायक के पद पर कार्य करती थी। उनकी बेटी मोनिका तथा बेटा मोहित उनसे एक घण्टे पहले स्कूल से आ गए थे। वहीं अनोखीलाल को उनके गाँव का रामभरोसे उनकी प्रतीक्षा करते मिला, बोला तुम्हारी माँ की तबियत बहुत ज्यादा खराब है। एक बार उनसे मिल आओ तुम्हें वो याद कर रही है। अनोखीलाल बोले अभी तो गाँव तक जाने की कोई बस नहीं मिलेगी सुबह जल्दी निकल चलेंगे तीन घण्टे का तो रस्ता है।
अनीता किचन में व्यस्त हो गई थी और अनोखीलाल तथा रामभरोसे बचपन के दिनों की याद कर रहे थे। रामभरोसे कह रहा था भैया तुमने बहुत बुरे दिन देखे सौतेले पिता ने तुम्हें बहुत परेशान किया माँ तो सगी थी पर उस माँ ने भी तुम्हारा साथ नहीं दिया था। अब उसका आखिरी समय है इसलिए तुम्हें याद कर रही है। कहती है मैंने उसके साथ अच्छा नहीं किया मैं उससे माफी माँग कर मरना चाहती हूँ, नहीं तो मेरी आत्मा को मरकर भी शाँति नहीं मिलेगी। रामभरोसे की बात सुनकर अनोखीलाल को अपने बचपन की कड़वी यादें आ गईं।
बचपन में जब उन्होंने होश सँभाला तब माँ बाप को लड़ते देखा। बाप निठल्ला था माँ मजदूरी करती थी और बाप का सारा गुस्सा बेटा अनोखीलाल पर उतारती थी। उनका बाप कभी उनसे लाड़ प्यार नहीं करता था और माँ बेरहमी से पीटती थी। एक दिन उसका पिता घर से चला गया तो फिर कभी नहीं आया, कहाँ गया इसका पता कोई नहीं लगा पाया। तब उसके नाना शिवलाल आए और उसकी माँ बिंदा बाई तथा उसे अपने घर ले आए। घर पर नाना का व्यवहार तो ठीक था लेकिन नानी और उसकी माँ बिन्दा उसे बहुत मारतीं तथा प्रताड़ित करतीं। यह भी बाप की तरह ही निठल्ला और नकारा रहेगा आखिर खून तो उसी का है। अनोखीलाल उस समय साढ़े पाँच साल के
थे । वे दुखी होकर रोते रहते पर उनके आँसू पौंछने वाला कोई नहीं था। फिर उन्हें पता चला कि उसके नाना ने उसकी मम्मी की शादी तय कर दी है। वो कुछ समझ पाते इसके पहले ही चट मँगनी पट ब्याह करते हुए नाना ने उसकी माँ को अपने सौतेले पिता के साथ भेज दिया वो नानी के यहाँ ही रह गया। नानी के यहाँ रहना उसे भारी पड़ा, वो उसे हर समय प्रताड़ित करती रहती और फिर उसने नाना के साथ अनोखीलाल को सौतेले पिता और माँ के पास भेज दिया। यहाँ उसका नाम सरकारी स्कूल में पहली कक्षा में लिखा दिया गया। उसके सौतेले पिता ने कभी उसे अपना बेटा नहीं माना सौतेले पिता से उसकी माँ को दो संताने प्राप्त हुईं इसके बाद तो सगी माँ भी सौतेली माँ से बुरी हो गई थी। उसने सारी ममता अपने दोनों बच्चों पर लुटा दी। अनोखीलाल का उस घर में अपना कोई नहीं था। अनोखीलाल आठवीं क्लास में आ गए थे तथा परीक्षा दे रहे थे। सौतेले पिता ने कह दिया था आठवीं के बाद तुम्हारी पढ़ाई बंद अब रोज बकरी चराने जाना पड़ेगा। अनोखीलाल आगे पढना चाहते थे पर मजबूर थे गाँव का स्कूल मिडिल तक का था । हायर सेकेण्डरी स्कूल गाँव से पच्चीस किलोमीटर दूर शहर में था। आज गाँव में मँगलवार की हाट थी। वहाँ एक किराने की दुकान पर अनोखीलाल हफ्ते में एक दिन काम करते थे। जिसके डेढ़ सौ रुपये सेठ रघुराज उसे देते थे। इस बार आनोखीलाल को उदास देख उसका कारण पूछा तो उनकी आँखों में आँसू आ गए, रघुराज बोले मेरे साथ चलो मैं तुम्हें पढ़ाऊँगा लिखाऊँगा। जब वे इसकी इजाजत लेने अनोखीलाल के माँ बाप के पास आए तो वे बड़े खुश हुए क्योंकि वे वैसे भी उन्हें घर से निकालना चाहते थे। उन्होंने फौरन अनुमति दे दी थी। रघुराज उससे दुकान तथा घर का थोड़ा बहुत काम कराते पर उसका खयाल बहुत रखते थे। उनके पास रहकर अनोखीलाल ने बारहवीं प्रथम श्रेणी में पास कर ली थी। थोड़े समय बाद ही अनोखीलाल की पोस्ट ऑफिस में नौकरी लग गई थी। नौकरी करते हुए ही अनोखीलाल की अनीता से निकटता बढ़ी जो शादी में बदल गई। अनोखीलाल जी तो शहर में अच्छी ज़िंदगी जी रहे थे मगर उनकी माँ और सौतेले पिता की हालत खराब थी, पिता को लकवा मार गया था। माँ की तबियत अक्सर खराब रहने लगी थी अनोखीलाल का सौतेला भाई अवारा हो गया था। बहन की शादी कर दी थी। अनोखीलाल जी ने गाँव जाने का मन तो बना लिया था पर पुराने दिन उसे सिहरा रहे थे।
****
रचनाकार
प्रदीप कश्यप
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें