सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

कहानी: सुखद परिवर्तन

शहर के सबसे बड़े रईस रामरतन  के इकलौते बेटे विवेक ने कारोबार को विगत दो वर्षों में जिस ऊँचाई पर पहुँचाया था उससे वे बहुत खुश थे जो नवाचार उसने किए थे उनके भी अच्छे परिणाम निकले थे।
चार वर्ष पूर्व विवेक  ऐसा नहीं था उस वक्त वो निहायत ही गैर जिम्मेदार तथा लापरवाह किस्म का इंसान था वो अनने पिता का सबसे बड़ा निंदक था उसके सारे काम उसके पिता से विपरीत होते थे विवेक  की माँ  रजनी हमेशा विवेक का पक्ष लेती थी यह सब देखकर रामरतन बहुत चिंतित और उदास रहते थे उन्हें अपने व्यवसाय का भविष्य अंधकार में डूबा नजर आता था और याद आता था अपनी गरीबी में गुजारा बचपन रामरतन के दादाजी सूरज लाल नगर सेठ थे लेकिन उनके मरने के बाद रामरतन के पिताजी राधेलाल ने कुछ ही वर्षों में सारा कारोबार चौपट कर दिया था अंत भें उनके पास एक छोटा सा मकान बचा था। सारी जमापूँजी खत्म हो गई थी उसका एक कारण  यह था कि राधेलाल भी अपने पिता की  बातों से सहमत नहीं थे राम रतन की दादी भी अपने बेटे  राधेलाल का ही पक्ष लेती  थीं सूरजलाल ने जब देहत्यागी तब उनके पास खूब संपत्ति थी कई दुकान घर और खेती उनके पास थी नगद धनराशि भी पूर्याप्त थी। सूरजलाल के मरते ही राधेलाल ने बेरहमी से पैसा लुटाना शुरू कर दिया था रामरतन की दादी कुछ भी नहीं कहतीं बिना उद्यम के बिना  तो कुबेर का खजाना भी खत्म हो जाता है वही राधेलाल जी का भी हुआ राधेलाल की माँ तो उल्टी पट्टी पढ़ाकर दुनिया से चली गई पर राधेलाल ने घोर गरीबी में अपना समय गुजारा था। रामरतन जब कमाने,लायक हुए तब तक राधेलाल जी टी बी की बीमारी से गंभीर रूप से ग्रस्त हो गए थे। जब वे गुजरे ती घर में उनके अंतिम संस्कार करने तक के पैसे नहीं थे रामरतन खुद को गिरवी रखकर साहूकार से पैसे,लाए थे। जो उन्होंने दो वर्ष तक कड़ी मेहनत कर सूद समेत अदा किए थे। रामरतन जी ने अपनी पिता की गलती  से बहुत बड़ा सबक लिया था और अनेक वर्षों तक कडी मेहनत  के बाद अपना खोया हुआ कारोबार फिर से कायम किया था लेकिन जब उन्होंने अपने बेटे में राधेलाल  की तरह की लापरवाही देखी तो वे चिंतित हो गए थे उन्हे हमेशा यही डर सताता था।  कि कहीं उनके बाद उनका बेटा  भी राधेलाल की तरह उनका कारोबार  भी  चौपट न कर दे। यह सब सोचकर  उन्होंने कड़ा निर्णय लिया उन्होंने विवेक और उसकी मम्मी  को सुदूर ग्रामीढ अंचल में भिजवा दिया और उनके सारे संपर्क खत्म कर दिए वहाँ उन्हें रहने के लिए किराये से तँग झोपड़ी मिली  विवेक को मजदूरी कर रुपया कमाना पड़ता था वो भी इतना कम कि उससे ज्यादा तो वह भिखारियों में बाँट देता था। यह क्रम दो साल तक चलता रहा इन दो सालों भें विवेक की पूरी सोच बदल चुकी थी वो फिजूलखर्ची छोड चुका था विवेक की मम्मी को भी अपनी गलती का अहसास हो गया था। दो षाल बाद जब रामरतन ने अपने बेटे और उसकी माँ को वापस बुलाया तो  वो सीधे रामरतन के पैरों में झुक गए तथा अपने किए की माफी माँगी तथा कहा पापा आपने मुझे अच्छे से समझा दिया  कि पैसे की कीमत क्यों करना चाहिए इसके बाद रामरतन जी ने अपना कारोबार विवेक के हवाले कर दिया था जिसे उसने अपनी दो साल की मेहनत से बुलंदी पर पहुँचा दिया था।
****
रचनाकार
प्रदीप कश्यप 


टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

व्यंग्य : जीते जी रोटी को तरसाया मरने के बाद श्राद्ध

आज कल सोलह श्राद्ध का समय चल रहा है कई जगह पर श्राद्ध के आयोजन हो रहे हैं बहुत सारे लोगों को भोजन कराया जा रहा है अपने पितरों के श्राद्ध में लोग हज़ारों रुपये भी खर्च कर रहे हैं उनमें कुछ तो ऐसे हैं जिन्होंने जीते जी अपने बूढ़े माँ बाप की खबर तक नहीं ली और अब उनके मरने पर उनके श्राद्ध पर बड़ा आयोजन कर रहे हैं उनकी तस्वोर पर माला चढ़ा रहे हैं। ऐसे लोगों में शहर के रविकांत जी भी हैं उन्होंने अपने स्वर्गीय माता पिता की तिथि पर भव्य आयोजन किया था खूब पकवान खिलाए गए थे खूब दान किया गया था पर उन्होंने अपने माता पिता को जीते जी बहुत दुख दिए थे। उनके पिताजी सत्तासी वर्ष के थे माँ पिच्यासी वर्ष की दोनों अपने पुराने घर में रहते थे उनका बेटा रविकांत उनकी कभी खोज खबर नहीं लेता था बेटी विदेश में दामाद के साथ रह रही थी। वे दोनों ही एक दूसरे का ख्याल रख रहे थे एक दिन रविकांत जी के पिताजी का दुखद निधन हो गया तब रविकाँत घर?आया पिताजी की उत्तर क्रिया करने के बाद चला गया रविकाँत की माँ अकेली रह गई थीं वे सीधी सरल थी जबकि बेटा बहू चपल चालाक बेटे बहू ने बातों में लेकर उनकी सारे सोने चाँदी के जे...

व्यंग्य: चापलूसी से मिली उपलब्धियाँ।

चापलूसी से मिली उपल्बिधियों का जब लोग बड़े गर्व से बखान कर के फूले नहीं समाते । तब खुद्दार टाइप के लोग उन पर अधिक ध्यान नहीं देते पर कुछ चापलूस टाइप के लोग उन्हें बड़ी हसरत से देखते हैं वे उनके जैसा बनकर वे सब उलब्धियाँ हासिल करने के ख्वाब देखने लगते हैं। ऐसे ही एक सेवानिवृत कर्मी अपनी उपलब्धियों का बखान कर रहे थे कुछ गौर से सुन रहे थे कुछ ऊब रहे थे वहीं सुरेश जी उनकी बात सुनकर मन ही मन मुस्का रहे थे क्योंकि उन्हें उनकी असलियत पता थी। किसी ने उन से पूछ लिया आप भी सतीश जी के विभाग में कार्यरत थे आपकी और इनकी नौकरी की शुरूआत एक ही पद से हुई थी फिर ये इतनी तरक्की क्यों कर गए जरा इस विषय में कुछ बताएँगे वे बोले अगर हम बताएँगे तो ये नाराज हो जाएँगे लोगों ने कहा कुछ भी हो आप तो बताइए वे बोले तो सुनो। नौकरी से पहले हम मित्र थे तब हमें मालूम नहीं था कि ये खुदगर्ज टाइप के चापलूस इंसान हैं। हम दोनों की पोस्टिंग फील्ड में हुई थी। हम किसी की चापलूसी नहीं करते थे और अपने काम से मतलब रखते थे। जबकि इन्होंने मुख्य कार्यालय में अपनी चापलूसी से घुसफैठ कर ली थी कहीं जातिवाद कहीं क्षेत्रवाद कही भाषाव...

व्यंग्य: समझदारी या मूर्खता

सामान्य ध्यमवर्गीय परिवार में नौकरी को प्राथमिकता दी जाती है । उस परिवार में अगर कोई युवक पढ़ लिखकर सरकारी नौकरी हासिल करने में सफल हो जाए तो उसे उसकी बहुत बड़ी उपलब्धि माना जाता है उसके पिता का सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है । विवाह योग्य कन्याओं के पिताओं का आना उनके यहाँ शुरू हो जाता है लाखों रुपये दहेज के ऑफर मिलते हैं। धूमधाम से शादी होती है लडके के हर नाज नखरे ससुराल वालों द्वारा उठाए जाते हैं ऐसे में अगर लड़के को रिश्वत की कमाई हो रही हो तो उसे अच्छा मान लिया जाता है उसका रुतबा ऐसे लोगों के बीच बढ़ जाता है। इस तरह के परिवारों में अगर कोई लड़का मेधावी हो अच्छे अंकों से उच्च शिक्षित हो और वो नौकरी नहीं करना चाहे तो उसके परिजनों को यह नागवार लगता है।  रोहित ने हमेशा कक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त किया था। उसने बि ई में यूनिवर्सिटी में टॉप किया था। नौकरी करने की उसकी इच्छा नहीं थी इससे उसके पिता दुखी रहा करते थे। एक बार एक सरकारी विभाग में क्लर्क की नौकरी निकली तो उसके पिता ने जोर देकर उसका आवेदन जमा करा दिया चयन मैरिट बेस पर होना था। उसका स्कोर अच्छा था । इसलिए उसका चयन ह...