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कहानी: आखिर नौकरी ही करना पड़ी

निखिल आज देर शाम को अपना काम ख़त्म कर के घर आया था वो शहर के एक बड़े होटल व्यवसायी सवाईमल जी के यहाँ एकाउण्टेन्ट के पद पर कार्यरत था जहाँ से उसे बत्तीस हज़ार रुपये  वेतन मिलता था।  उसके काम के मुकाबले वेतन कम था पर उसके पास और कोई विकल्प भी तो नहीं था। 
निखिल के पापा रूपनारायण सेवानिवृत कर्मचारी थे।  उन्होंने जब निखिल को घर आते देखा तो राहत की साँस ली निखिल उनका इकलौता लड़का था देखा जाए तो उनकी बर्बादी का वही कारण था। निखिल आज नौकरी मजबूरी में कर रहा था जबकि एक साल पहले वो खुद शहर के तृप्ति रेस्टोरेन्ट का मालिक था जिसमें उसे जब्रदस्त घाटा हुआ था । और वो रेस्टोरेन्टउसे बेचना पड़ा था निखिल के  पिता रूपनारायण जी शासकीय नौकरी से तीन साल पहले रिटायर हुए थे आजकल पेंशन भोगी थे। उनको तीन साल पहले रिटायर मेन्ट के समय पचास लाख रुपये ग्रेच्युटी जी पी एफ एवं कम्युटेशन से मिले थे। दो एकड़ जमीन उन्होंने तीस लाख रुपये में बेची थी। उन दिनों निखिल  बी कॉम कर बेरोजगार था। उसे व्यापार करने की धुन सवार थी। जबकि उसे बिजनिस का कोई अनुभव नहीं था सिर्फ किताबी ज्ञान था। उसे मित्रों ने सलाह दी कि वो शहर में रेस्टोरेण्ट खोल ले। उसमें लाभ ही लाभ है। उसे वो बात जम गई रूपनारायण जी भी फुर्सत में थे उनके मन में विचार आया कि वे भी बिजनिस में  निखिल  को सहयोग करेंगे। तीस हजार रुपये महीने किराये पर दुकान ली गई उसमें फर्नीचर डेकोरेशन सामान की खरीदारी और व्यवस्था में पूरे सत्तर लाख रुपये खर्च हो गए थे दस लाख रुपये रेस्टोरेन्ट के संचालन में खर्च हो चुके थे । रूपनारायण और निखिल दोनों ही अनुभव हीन थे। काम तो खूब करते थे पर सही दिशा भें प्रयास नहीं कर पाते थे। रोज ही बहुत सारा तैयार सामान खराब हो जाता था बिक्री बिल्कुल संतोषजनक नहीं थी कर्मचारियों का वेतन निकालना मुश्किल हो गया था छः महीने का दुकान का किराया चढ़ गया था। बाजार में तीस लाख की उधारी चढ गई थी इसके अलावा और भी छोटी बडी कई उधारियाँ थीं निखिल का सारा जोश ठंडा पड़ गया था। दुकान मालिक दुकान खाली करने की बात कर रहा था। रूपनारायढ जी हताश हो गए थे आखिर उन्होंने औने पौने दाम में सारा सामान बेचकर रेस्टोरेण्ट बंद कर दिया था उधारी चुकता करने के बाद उनके पास कुछ नहीं बचा था। वो रेस्टोरेण्ट सवाईमल जी ने खरीदा था। उनके शहर में कई होटल और रेस्टोरेण्ट थे। उनके अनुभव के कारण वो रेस्टोरेन्ट भी अच्छा चल रहा था। जिसमें निखिल को कोई लाभ नहीं हुआ था उसमें सवाई मल जी लाखों रुपया कमा रहे थे। निखिल को तीन माह  पूर्व पता चला था कि सवाईमल जी को एकाउण्टेन्ट की जरूरत है  तो उसने उस पद पर एप्लाई किया था। सवाईमल जी ने उसे एकाउण्टेन्ट के पद पर नियुक्त कर दिया था। सवाईमल जी ज्यादा पढ़े लिखे नहीं थे पर उनका करोड़ों का बिजनेश था  चालीस वर्ष पूर्व वे जिस होटल में वेटर का काम करते थे अब वहाँ पर मेडिकल स्टोर खुल गया था। वो जब होटल में काम करते थे। तब अपनी बहन की शादी में शामिल होने पन्द्रह दिन की छुट्टी मालिक से लेकर गए थे। लेकिन बीस दिन बाद काम पर लौटे तो  देखा कि मालिक ने किसी ऑर को काम पर रख लिया है वे उदास होकर घर आ गए जब पत्नी शीला ने कारण पूछा तो पता चला कि नौकरी छूट गई है। वह भी उदास हो गई पर धोड़ी देर में ही सम्हल गई। अपने कान के सोने के टॉप्स उतारकर दिए और कहा कि  इन्हें बेचकर अपनी दुकान खोलो मुझे आप पर पूरा भरोसा है। सवाईमल जी ने टॉपस बेचकर हाथ ठेला खरीदा  उसमें चाय बनाने के बर्तन स्टोव  खरीदे पोहे जलेबी समोसा बनाने के  लिए कढ़ाई खरीदी ठेले पर उनका सेटअप जमाया और जिस दुकान पर काम करते थे उसके सामने अपनी दुकान लगा ली। सवाईमल कमाल के हलवाई थे उनके हाथ की बनी चाय मशहूर थी वही क्वालिटी की चाय वे अपने ठेले की छोटी दुकान पर बना रहे थे। पहले दिन ही अच्छी बिक्री हुई थी उनका सब सामान बिक गया था कुछ ही दिन में चाय के सारे ग्राहक उनसे जुड़ गए थे पोहा समोसा जलेबी की भी खूब बिक्री होती थी। जिसने उन्हें नौकरी से निकाला था उसकी होटल ठप्प सी पड़ गई थी अब उसे गलती का अहसास हो गया था कि सवाईमल को नौकरी से निकाल कर उन्होंने जीवन की सबसे बड़ी भूल की थी। कुछ दिनों में सवाईमल जी ने उस होटल के सामने अपनी बड़ी होटल खोल ली थी। तबसे सवाईमल जी लगातार उन्नति की सीढ्रियाँ चढ़ते चले गए थे। आज उनकी शहर में होटलों की ऋंखला थी। और करोडों रुपयों की संपत्ति थी। निखिल जैसे अनेक लोगों को उन्होंने रोजगार दे रखा था।
*****?
रचनाकार
प्रदीप कश्यप 


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