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कहानी: अवाँछित

ब्रजभूषणदास शहर के जाने माने संगीतज्ञ थे, इसके साथ ही उत्कृष्ट गायक भी। जन्म से ही दृष्टिहीन ब्रजभूषणदास जी का बचपन बड़ा कष्टदायी गुजरा था। आज तो उनके शिष्य बड़े बड़े पदों पर हैं। वे स्वयं भी धन संपन्न हैं।  बेटा दीपक भी अच्छे स्कूल भें पढ़ रहा है   भरापूरा परिवार है। मान प्रतिष्ठा है। सुखमय जीवन जी रहे हैं, इंसान को और क्या चाहिए।
ब्रजभूषण दास जी का जिस परिवार में जन्म हुआ था वो परिवार अत्यंत गरीब था। उनके पिता गणेशराम मजदूरी करते थे।  उनका बड़ा भाई  सोहन दास पाँच वर्ष का था।  सोहन दास के बाद उनके पिता चाहते थे कि उनके घर बच्ची जन्म ले लेकिन दृष्टिहीन बेटे के जन्म ने उनकी खुशियों पर पानी फेर दिया था। उनके साथ माता पिता शुरू से ही भेदभाव करने लगे थे। सोहनदास को वे बुढ़ापे का सहारा मानते  थे और ब्रजभूषण दास को भार समझते थे। सोहनदास को उन्होंने बड़े लाड़ प्यार से पाला था । जबकि ब्रजभूषण दास  हमेशा उनसे प्रताड़ित होता रहता था।  ब्रजभूषणदास जब छः वर्ष के हुए तब पास के संगीत महाविद्यालय के प्रोफेसर शिवदयाल शास्त्री से उनका मिलना हुआ। वे भी दृष्टिहीन थे  और अकेले रहते थे। उन्होंने ब्रजभूषण को अपना पुत्र बनाकार रख लिया था। गणेशराम को खुशी थी कि  तनाव का कारण चला गया है। अब उन्होंने सोहनदास पर पूरा ध्यान देना शुरू किया। खूब पढ़ाया लिखाया लेकिन अठ्ठाइस वर्ष की उम्र होने के बाद भी वो सरकारी  नौकरी हासिल नहीं कर पाया था।  इसी से उसकी शादी भी नहीं हो रही थी। उधर ब्रजभूषण दास म्यूजिक में एम ए करने कर  आकाशवाणी तथा दूरदर्शन के नियमित कलाकारों में शामिल हो गए थे। संगीत और गायन के कार्यक्रमों से भी उनकी अच्छी कमाई हो जाती थी । शिवदयाल शास्त्री रिटायर हो गए थे। उन्हें किसी काम से गाँव जाना पड़ा। उन्होंने  गणेशराम के पास कुछ दिनों के लिए ब्रजभूषण जी को भेज दिया। ब्रजभूषण जी ने महसूस किया कि गणेशराम की आर्थिक स्थिति पहले से ज्यादा खराब है सोहनदास अठ्ठाइस साल का होकर भी  बेरोजगार था। एक रुपया भी नहीं कमा रहा था। गणेशराम ठेला चलाते थे। जिससे बहुत कम रुपया कमा पाते थे। जैसे तैसे घर का खर्च चल रहा था। ब्रजभूषण दास जी को एक संगीत के कार्यक्रम में जाना था। सोहन दास भी उस कार्यक्रम में गया, वहाँ वो अपने भाई का सम्मान देखकर चकित हो गया। तीन घंटे का शानदार कार्यक्रम उसके भाई ने प्रस्तुत किया था। आयोजकों ने जब बारह हजार रुपये का लिफाफा ब्रजभूषण को दिया तो सोहनदास को विश्वास ही नहीं  हुआ। वो तो यही समझता था कि एक दृष्टिहीन भीख भाँगने के सिवा और कर ही क्या सकता है।  दोनों भाई जब घर आए तो  सोहनदास ने लिफाफे की बात पिता को बताई। गणेशराम कोई अच्छा इंसान नहीं था। उसे ब्रजभूषणदास से कोई सहानुभूति नहीं थी। रुपये देखकर उसके मन में लालच आ गया था। उसकी वो पूरी दो महीने की कमाई थी जो ब्रजभूषण दास ने तीन घंटे के कार्यक्रम  में सम्मान के साथ अर्जित की थी। वो रुपये ब्रजभूषणदास से गणेशराम और सोहनदास  ने छीन लिए। यह बात उन्हें बुरी लगी, बारह हजार रुपये उनके लिए कोई बड़ी रकम नहीं थी। वो तो वैसे ही वे पैसे उन्हें देने वाले थे। पर जिस तरह से वे पैसे उनसे छीने गए ये उन्हें मंजूर नहीं था। अब सोहनदास साये की तरह ब्रजभूषणदास के साथ रहता, जो कार्यक्रमों से पैसा मिलता वो हड़प लेता। ब्रजभूषणदास के पैसों पर पूरा घर मजे करने लगा था। जब सोहनदास को पता चला कि ब्रजभूषण दास की पिचहत्तर लाख रुपये की बैंक में एफ डी है और तीस लाख सेविंग एकाउण्ट में जमा हैं तो  उनका लालच सारी सीमाएँ पार कर गया। पहले तो उन्होंने ब्रजभूषणदास को खूब बहलाया फुसलाया खूब आव भगत की जब बात नहीं बनी तो उसे प्रताड़ित करना शुरू कर दिया। उन्होंने ब्रजभूषणदास को कैद कर लिया था और यातना दे रहे थे। फिर वो ब्रजभूषणदास को लेकर बैंक में आए यह धमकी देकर की अगर कुछ भी हमारे खिलाफ बोला तो घर लाकर तुम्हारे हाथ पैर तोड़ दिए जाएँगे। बैंक में ब्रजभूषणदास चुपचाप बैठे हुए थे। सोहनदास और गणेशराम के चेहरे पर कुटिलता भरी मुस्कुराहट थी। बैंक के मैनेजर विवेक रस्तोगी को कुछ शक हुआ, उन्होंने ब्रजभूषणदास के चेहरे को गौर से देखा। सारी बात वे भाँप गए। उन्होंने पूरा पेमेन्ट रोकने का निर्णय लिया, इस पर वे बैंक मैनेजर से बहस करने लगे। इस बीच शिवदयाल शास्त्री जी को किसी ने फोन कर सारी बातें बता दी थीं। उनके एक पड़ोसी ने चुपके से ब्रजभूषण दास जी की प्रताड़ना का वीडियो बना लिया था। जो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा था। ब्रजभूषणदास कोई मामूली इंसान तो थे नहीं।  वो काफी लोकप्रिय थे। इस वायरल वीडियो ने  लोगों को क्रोध से भर दिया था।  शिवदयाल शास्त्री इसी बात को लेकर थाने गए थे। तथा पुलिस इंस्पेक्टर को सारी बातें बता रहे थे। तभी बैंक मैनेजर रस्तोगी जी का फोन इंस्पेक्टर के मोबाइल पर आया। इंस्पेक्टर ने शास्त्री जी से कहा काम हो गया, आज ही तीनों आरोपियों को अरेस्ट कर लिया जाएगा। पुलिस तुरंत बैंक पहुँची, सोहनदास और गणेशराम को अहसास हो गया अपने फँसने का तो उन्होंने फरार होने की कोशिश की मगर रस्तोगी जी ने सिक्योरिटी की मदद लेकर उन्हें रोक लिया। पुलिस आई  उधर आग की तरह ये खबर पूरे शहर में फैल गई। हजारों की संख्या में लोग बैंक के पास आ गए। पुलिस से कहने लगे इन्हें हमारे हवाले करो हम इन्हें सबक सिखाएँगे।  बड़ी मुश्किल से पुलिस उन्हें थाने लाई, जनता थाने पर भी आ गई। बड़ी मुश्किल से एस पी और डी एम साहब ने जनता को समझाया बुझाया केस अदालत में चला जहाँ सोहनदास  एवं गणेशराम को बीस वर्ष की सजा हुई तथा  ब्रजभूषणदास की माँ को पन्द्रह वर्ष की सजा हुई क्योंकि वीडियो में वो भी प्रताड़ित करती हुई दिखाई दे रहीं थीं।  ब्रजभूषणदास जी की शास्त्री ने अपनी शिष्या विमला से शादी करा दी थी। ब्रजभूषणदास जी ने अपनी जमापूँजी से शहर में दिव्याँगों के कल्याण के लिए बडे संस्थान की स्थापना की थी। उनकी नेकियों के फल उन्हें मिलने लगे थे। जिसके कारण उनका जीवन बेहतर हो गया था। आज वो खुशहाल थे।

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रचनाकार
प्रदीप कश्यप 


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