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कहानी: समय का फेर

रेल्वे स्टेशन के पास भीख माँगते अस्सी साल के बुजुर्ग को देख माखन लाल चौंक गया था वो उन बुजुर्ग को पहचान गया था। वो उसके गाँव के दरियाव पटेल थे जिन्के कारण उसे तीस साल पहले अपना गाँव छोड़कर  इन्दौर आना पड़ा था। इन्दौर में वो होटल मालिक था और सुखी संपन्न जीवन जी रहा था। दरियाव पटेल उसे पहचान कर भी अनजान बन गए थे। उसे भी जल्दी थी इसलिए वो ज्यादा बात किए बिना ही आ गया था। जबसे वो उनसे मिलकर आया था तब से उनके विषय में ही विचार कर रहा था।
तीस साल पहले की बात है जब माखन लाल नौनीखेड़ा गाँव मैं रहता था। उस समय उसकी उम्र पच्चीस साल की थी। माखनलाल के पिताजी बटन लाल की गाँव में बाल काटने की दुकान थी। दरियाव सिंह उस गाँव के पटेल थे। उनका पूरे गाँव में दबदबा था। वे सबसे संपन्न थे और उनके कहे को टालने की किसी में हिम्मत नहीं थी। गाँव में जो दलित वर्ग के लोग रहते थे उनकी हजामत बटनलाल जी नहीं बना सकते थे ऐसा दरियाव पटेल जी का हुक्म था। जिसका सख्ती से पालन करना बटनलाल जी के लिए जरूरी थी। माखनलाल को पिताजी ने शहर में आधुनिक तरीके से बाल कटिंग करने का प्रशिक्षण प्राप्त करने के लिए शहर भेज दिया था। वहाँ से वो हेयर ड्रेसर बनकर गाँव में आया था। गाँव मे वो अपने पिताजी की दुकान पर हेयर कटिंग का काम कर रहा था। वो जो काम सीखकर आया था उसके लिए बड़े सेलून की जरूरत थी। इतने पैसे उनके पास थे नहीं कि वे सैलून खोल सकें। एक बार माखन की दुकान पर कोई अनजान व्यक्ति आया। माखनलाल ने उसकी दाढ़ी कटिंग बना दी। वो व्यक्ति दलित वर्ग का था तथा दलित माँगीलाल के यहाँ का मेहमान था। वो तो कटिंग बनवाकर चला गया पर माखनलाल को परेशानी में डाल गया। यह ख़बर दरियाव सिंह तक पहुँच चुकी थी। उन्होंने माखनलाल को अपनी बाखल में बुलवाया बटन लाल भी उनके साथ ही दरियाव पटेल की बाखल में आ गया और माखनलाल की तरफ से माफी माँगने लगा माखनलाल चुप था। इस पर दरियाव बोले यह क्यों नहीं कुछ कह रहा है। इस पर माखनलाल ने सिर्फ इतना ही कहा अगर मैंने उसकी कटिंग बना दी तो इसमें गलत क्या है? यह कहना ही माखनलाल को भारी पड़ गया। दरियाव सिंह ने हुक्म दिया कि उसे चौबीस घंटे में ये गाँव हमेशा के लिए छोड़कर जाना होगा अन्यथा परिणाम भुगतने के लिए तैयार रहे। बटनलाल ने पटेल के खूब हाथ जोड़े विनती की पर उन पर कुछ असर नहीं हुआ और इस तरह माखनलाल को अपना गाँव हमेशा के लिए छोड़ना पड़ा। इन्दौर में उसने एक होटल पर काम किया। कुछ दिनों में सारा काम सीखकर माखनलाल ने हाइवे पर ढाबा खोल लिया था। आज वही बड़ी होटल में बदल गया था। उस होटल ने माखनलाल को सुखी और संपन्न बना दिया था। इधर दरियाव सिंह को ज्यादा शराब पीने की लत लग गई। फिर वे पास के कस्बे की एक स्त्री के झूठे प्रेम जाल फँस गए और कुछ दिनों में पूरी तरह बर्बाद हो गए। जमीन जायदाद सब बिक गए थे। उनकी हवेली लाला राम ने खरीद ली थी और वे एक छोटे से मकान में रह रहे थे। पटेली का पद उनसे छिन गया था। जब उनके दोनों बेटे बड़े हुए तब उन्हें पता चला कि उनकी इस दुर्दशा के जिम्मेदार उनके पिताजी हैं तो उन्हें पिताजी से नफ़रत हो गई। उन्होंने उनकी उपेक्षा करना शुरू कर दी। वे उन्हें खाना भी ठीक से नहीं देते थे। आखिर उनके कारण ही तो वे जमींदार से मजदूर बने थे। जब दरियाव सिंह का गाँव में रहना मुश्किल हो गया तो वे शहर में आ गए थे। आठ साल से वे इस शहर में रहकर भीख माँगकर गुजारा कर रहे थे। माखनलाल सोच रहा था कि शायद इसे ही करनी का फल कहते हैं। समय के फेर ने दरियाव पटेल को धनवान से भिखारी बना दिया था।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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