रायनगर के बड़े बाज़ार में शर्मा जी सत्तर साल पुरानी कचौरी की दुकान थी। उनकी दुकान की कचौरी से रायनगर की पहचान बनी थी। दिन के दस बजे से रात के ग्यारह बजे तक उनकी दुकान से हजारों कचौरियाँ बिक जाती थीं। दुकान के संस्थापक रामकिशोर शर्मा जी का निधन हुए सात साल हो गए थे। इसके बाद पाँच साल तक वो दुकान दो भागों में बँट गई थी जो दो साल पहले फिर एक हो गई थी। आखिर दोनों भाईयों ने अलग होते समय जो दीवार खड़ी की थी वो गिरा दी थी। दुकान के एक होते ही दुकान से कचौरी की बिक्री चार गुना बढ़ गई थी। आज रामकिशोर जी के दोनों बेटे हरि ओम तथा शिव ओम उस दुकान को चला रहे थे। उससे होने वाली आय को दोनों बराबर हिस्से में बाँट लेते थे।
शर्मा जी की कचौरी की दुकान पन्द्रह फीट चौड़ी थी तथा नब्बे फीट लंबी। जिसमें पन्द्रह बाई साठ फीट में दुकान और होटल थी तथा ऊपर शर्मा जी अपने परिवार के साथ रहते थे। रामकिशोर शर्मा जी ने यह दुकान सत्तर साल पहले शुरू की थी। इसके पहले रामकिशोर जी की अपने पिताजी कमलकिशोर जी से कुछ कहा सुनी हो गई थी और वे घर छोड़कर चले गए थे। तब उनकी उम्र मात्र सोलह साल की थी। रायनगर से वे श्याम नगर में बस से उतर गए थे जो रायनगर से तीन सौ किलोमीटर दूर था। वहाँ गुप्ता जी की होटल थी उसमें वे काम करने लगे। गुप्ता जी की होटल में एक कुक थे जिनका नाम बाबूलाल था पर सब उन्हें बब्बन हलवाई के नाम से जानते थे। रामकिशोर जी ने उनके साथ किचिन में काम करना शुरू कर दिया था। बब्बन जी कमाल के हलवाई थे उनके हाथों में स्वाद था। वे जो भी पकवान बनाते वो अनोखे स्वाद वाला होता था। बब्बन जी के साथ काम करते हुए उन्हें तीन साल हो गए थे। इन तीन सालों में उन्होंने लगभग सारा काम सीख लिया था। एक दिन बब्बन जी ने उनसे कहा कि पास के गाँव शोभाखेड़ी में एक शादी है वहाँ रात भर का काम है सुबह आ जाएँगे और अपनी दुकान सम्भाल लेंगे। वहाँ बब्बन जी ने जो मिठाई और पकवान बनाए उनका स्वाद तो और भी गजब का था। जब शर्मा जी ने इसकी वजह पूछी तो उन्होंने बताया कि यहाँ सब अच्छी क्वालिटी की सामग्री का उपयोग किया गया जबकि दुकान पर गुप्ता जी घटिया सामग्री लाकर देते हैं जिससे सामान की गुणवत्ता पर असर पड़ता है। शर्मा जी उनके साथ काम करते हुए पूरी तरह निपुण हो गए थे। गुप्ता जी का स्वास्थ्य खराब होने से वे एक महीने तक दुकान पर नहीं आए। इस बीच उनके बेटे से शर्मा जी की बहस हो गई और बेटे ने उन्हें काम से निकाल दिया। जिस दिन उन्हें काम से निकाला था उसी दिन पिताजी उनकी खोज करते हुए दुकान पर आए तो पता चला कि आज ही उनके बेटे को नौकरी से निकाल दिया है। तब बब्बन हलवाई ने शर्मा जी के पिताजी से कहा आप चिंतित मत होइए वो हमारे मोहल्ले ही में रहते हैं। बब्बन ने उन्हें रामकिशोर जी से मिलवाया। दोनों बाप बेटों के गिले शिकवे दूर हुए और पिताजी उन्हें रायनगर ले आए। पिताजी ने ही उन्हें दुकान के लिए ये जमीन आठ सौ रुपये में खरीदी थी। उसी दुकान में शर्माजी ने शर्मा कचौरी की दुकान खोली थी। राम किशोर जी बब्बन जी के शिष्य थे। फिर वे सामग्री भी अच्छी गुणवत्ता की लेकर आए थे। उससे उन्होंने समोसे कचौरी जलेबी पोहा और बूँदी बनाना शुरू किया। रायनगर वालों ने इतना स्वदिष्ट किसी होटल में नहीं खाया था। उनकी कचौरियों ने पहले दिन से प्रसिद्धि हासिल कर ली थी। कुछ ही दिनों में शर्मा कचौरी के स्वाद की चर्चा दूर दूर तक फैल गई थी। इस दुकान से रायनगर की पहचान बन गई थी। यह दुकान तिरेसठ साल तक ठीक चली पर जैसे ही उनका निधन हुआ तो दोनों भाइयों ने बँटवारा कर लिया था। दुकान भी दो हिस्सों में बँट गई थी। दोनों के पास साढ़े सात फीट चौड़ी जगह बच गई थी। हरिओम ने तो पिताजी की गुणवत्ता बनाए रखी पर शिव ओम लालच में आ गया। ज्यादा कमाने के फेर में उसने सामग्री की गुणवत्ता गिरा दी। इसका नतीजा ये हुआ कि लोगों ने शिव ओम से सामान खरीदना कम कर दिए। एक दिन पुलिस उन्हें पकड़कर ले गई। घटिया खाद्य सामग्री के इस्तेमाल से तैयार सामग्री को मजदूरों ने खाया और वे बीमार पड़ गए। इसी से पुलिस उन्हें गिरफ्तार कर ले गई थी। शिवोम को तीन साल की सजा हो गई थी। इस अवधि में हरिओम ने ही अपने छोटे भाई के परिवार का पूरी तरह ख्याल रखा और उन्हें कोई परेशानी नहीं आने दी। तीन साल बाद जब शिवओम जेल से छूटकर आए तब उन्हें ये बात पता चली तो शिव ओम ने हरिओम जी के पाँव छूकर कहा - भाई आप देवता स्वरूप हैं। आप जो भी निर्णय लेंगे वो हमें स्वीकार है। मेरी तो बदनामी हो गई है तथा मुझ पर कोर्ट ने भी होटल खोलने पर प्रतिबंध लगा दिया था। तब भाई हरिओम जी ने यह दीवार तुड़वा कर फिर दुकान एक कर दी थी। पिछले दो साल से दोनों भाई साथ ही दुकान चला रहे थे।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप
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