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कहानी: ठेकेदार

राधेमोहन शहर के सबसे बड़े ठेकेदार थे। उनके पास काम की कोई कमी नहीं थी। बहुत बड़ा ऑफिस था जिसमें अस्सी लोग काम कर रहे थे। चालीस इंजीनियर थे तथा मिस्त्री, लेबर, पलम्बर, इलेक्ट्रीशियन की गिनती निश्चित नहीं थी। वैसे हमेशा उनकी साइट पर काम चलता रहता था। दूसरी ओर उनके छोटे भाई रास बिहारी ने सिविल इंजीनियर की डिग्री में गोल्ड मेडल प्राप्त किया था। फिर दस साल तक पी डब्ल्यू डी में नौकरी और भ्रष्टाचार में लिप्त होने के कारण इन दिनों जेल में था।
बचपन से ही राधे मोहन जी का पढ़ाई में ध्यान कम था। वो अक्सर थर्ड डिवीडन से ही पास होते थे। जबकि रासबिहारी हमेशा कक्षा में प्रथम आता था। राधेमोहन के पिताजी पी डब्ल्यू डी के ऑफिस में क्लर्क थे। उन्हें अच्छी तरह मालूम था कि इंजीनियर की रिश्वत से कमाई वेतन से कई गुना ज्यादा होती थी। इसलिए वे अपने दोनों बेटों को पढ़ा लिखाकर इंजीनियर बनाना चाहते थे। रासबिहारी से वे खुश रहते थे क्योंकि वो पढ़ने में तेज था। जबकि राधेमोहन को देखते ही उन्हें गुस्सा आ जाता था। राधे मोहन को घूमने-फिरना, लोगों से मिलने जुलने का शौक था। जबकि रास बिहारी हमेशा ही पढ़ाई में डूबा रहता था।इंजीनियर बनने के बाद रासबिहारी की सरकारी नौकरी लग गई तो उसकी शादी भी अच्छी पढ़ी लिखी लड़की रमा से हुई। वो खूब सारा दहेज भी लेकर आई। राधे मोहन से तो उनके पिताजी इतने नाराज थे कि उन्होंने उन्हें घर से निकाल दिया था। राधेमोहन जी को अच्छे दोस्तों की कमी न थी। वे उनके साथ रहने लगे थे। दोस्तों ने ही उन्हें काम दिलवाए शुरू में वे छोटे-मोटे काम कराते थे पर बाद में उन्हें बड़े काम मिलने लगे थे। वे एक ईमानदार ठेकेदार थे। उनकी सबसे बड़ी यही विशेषता थी इसी के कारण वे सबके भरोसेमंद थे। राधेमोहन जी अब बहुत संपन्न हो गए थे। उधर छोटे भाई से पिताजी की ये अपेक्षाएँ थी की वो खूब रुपया कमाए वो भी दो नंबर से और रास बिहारी ने ऐसा किया भी। कुछ सालों में ही उसने खूब सारे रुपये कमा लिए थे। बेईमानी के कारण वो काम घटिया कराता था और मोटा कमीशन वसूलता था। एक सरकारी अस्पताल के भवन के निर्माण में रास बिहारी ने कुछ ज्यादा ही रिश्वत खा ली थी जिसके कारण वो भवन पहली बरसात भी नहीं झेल पाया और ध्वस्त हो गया। बहुत सारे मरीज और डॉक्टर मारे गए थे। मुद्दा तूल पकड़ रहा था पुलिस ने रास बिहारी को गिरफ्तार कर लिया था। अदालत से दोषी पाए जाने पर रास बिहारी को आठ वर्ष की सजा मिली थी। पिताजी को यह समझ में नहीं आ रहा था कि वे किस बेटे की तारीफ करें और किसे बुरा ठहराएँ। आखिर अदालत से सजा मिलने के बाद वे पूरी तरह समझ गए थे कि रासबिहारी योग्य तो था पर भ्रष्ट और बेईमान भी था। जिसके कारण वो जेल की हवा खा रहा था।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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