ममता चार सुंदर बेटियों की माँ थी। पच्चीस साल पहले उसके पति नरेश ने इसी वजह से उससे तलाक लेकर रजनी से दूसरी शादी कर ली थी। ममता ने इसके बाद कभी दूसरी शादी नहीं की। अपनी बेटियों को ही पढ़ा लिखाकर योग्य बना दिया। आज उसकी चारों बेटियाँ सरकारी नौकरी कर रही थीं। जबकि नरेश के रजनी से चार बेटे हुए थे। चारों ही आवारा थे, अपराधी प्रवृत्ति के थे। नरेश की कई बार पिटाई करने के बाद उन्होंने उसे घर से निकाल दिया था। आज नरेश को ममता ने किसी घर में भीख माँगते देखा तो उसे बडी हैरत हुई। वो अन्य भिखारियों के साथ पुल के नीचे रह रहा था। उसने ममता से तलाक के बाद सारे रिश्ते तोड़ लिए थे। फिर भी ममता उससे मिलने के लिए पुल के नीचे गई थी। वहाँ से पता चला कि वो हमेशा के लिए ये शहर छोड़ के चला गया है। कहाँ गया है किसी को पता नहीं था।
ममता से जब नरेश की शादी हुई थी तब वो सिंचाई विभाग में छोटा बाबू था। ममता भी कम पढ़ी लिखी नहीं थी वो भी एम एस सी बी एड थी। फिर भी नरेश ने ममता को नौकरी नहीं करने दी थी। शुरू में उनके बीच में सब कुछ सही चल रहा था। जब ममता के पहली बेटी निकिता हुई तो उसका नरेश ने स्वागत किया। दूसरी नमिता के जन्म पर उसने थोड़ी नाराजी जाहिर की। तीसरी बेटी नलिनी के जन्म के बाद तो उसके धैर्य का बाँध टूट गया। प्रसव के बाद उसने ममता को खूब बुरी बुरी बातें कहीं। इधर नरेश की माँ केतकी भी नरेश को ममता के खिलाफ भड़काती रहती थी। जब चौथी बेटी नेहा ममता के गर्भ में आई तो नरेश ने चेतावनी देते हुए कहा कि अगर चौथी संतान भी बेटी हुई न तो उससे बुरा कोई नहों होगा। और अंत में वही हुआ जिसका डर था। ममता को चौथी बार भी बेटी ही हुई। इससे खिन्न होकर नरेश ने न तो ममता की खबर ली न ही अपनी नवजात बेटी की सूरत देखी। बेटी का जन्म सरकारी अस्पताल में हुआ था। उसके जन्म के बाद नरेश अपनी माँ को लेकर अस्पताल से गायब हो गया। ममता भूखी प्यासी थी रो रोकर उसका बुरा हाल हो रहा था। तब सिस्टर निर्मला ने फोन कर ममता के पिता उमेश जी तथा मम्मी मीना को सारी बात बता दी। उमेश जी पत्नी को लेकर फौरन ममता के पास आए उसे दिलासा दी। मीना ने उसके खाने पीने का इंतजाम किया। जब नरेश को पता चला तो वो उसकी तीनों बेटियों को तथा एक सूटकेस में उनका सामान रखकर अस्पताल में छोड़कर चला गया। बड़ी बेटी निकिता ने बताया कि पापा ने उन्हें हमेशा के लिए छोड़ दिया है। ममता को यह बात पहले से ही पता थी इसलिए उसने अपने आपको इसके लिए तैयार कर लिया था। दूसरे दिन जब ममता कि अस्पताल से छुट्टी हुई तो वे ममता तथा उसकी बेटियों को किराये की टेक्सी में बिठाकर घर ले आए। यहाँ भी ममता का रहना आसान नहीं था। ममता की भाभी सुषमा ने उसे देखकर बुरा सा मुँह बना लिया था। उसके चेहरे पर ममता को देखकर कोई खुशी नहीं हो रही थी। यहाँ ममता के छः महीने बड़ी मुश्किल से निकले। सुषमा ने उसे नौकर बनाकर रख दिया था। ममता ये जान गई थी कि वो मायके में ज्यादा दिन नहीं रह सकेगी। उसने केन्द्रीय विद्यालय में पी जी टी के लिए आवेदन किया था। उस पर उसका चयन हो गया और ग्वालियर में उसकी प्रथम नियुक्ति हुई। यहाँ उसे सरकारी मकान मिल गया था। वो अपनी चारों बेटियों को लेकर वहाँ आ गई। नरेश ने उस से पहले ही तलाक ले लिया था। अब उसका एक ही मकसद रह गया था अपनी बेटियों की ठीक से परवरिश करना। चारों बेटियाँ प्रतिभाशाली थीं। बड़ी बेटी निकिता एस डी एम बन गई थी और तीनों बेटियाँ मेडीकल कॉलेज से एम बी बी एस कर रही थीं। पढ़ाई के बाद उनकी भी सरकारी नौकरी पक्की थी। दूसरी ओर नरेश के रजनी से चार बेटे हुए थे। बड़ा बेटा अशोक बचपन से ही अपराधी प्रवृत्ति का था। उसके तीनों भाई भी उसके नक्शे कदम पर चल रहे थे। जब बड़ा लड़का अशोक उन्नीस साल का था तब उसने नरेश से तीन लाख रुपये माँगे। नरेश के मना करने पर उसने पहली बार अपने पिता की तबियत से पिटाई की और खूब अपशब्द कहे। इसके बाद तो वो जब तब पिता पर हाथ छोड़ने लगा था। वो चोरी करता तथा लूटमार करता था और चोरी का सामान घर में छिपाता था। एक दिन लूट पाट करते हुए उससे एक आदमी का मर्डर हो गया। उसने छुरा घर में छिपाकर रख दिया। आखिर वो पुलिस के हत्थे चढ़ ही गया। पुलिस ने जब घर से लूट और चोरी का सामान तथा हत्या में प्रयुक्त छुरा बरामद किया तो नरेश को भी गिरफ्तार कर लिया। इससे नरेश की सरकारी नौकरी चली गई। नरेश को भी साल भर की सजा हुई। जेल से छूटने के बाद जब नरेश घर आया तो अशोक से छोटा बेटा राकेश अपराध की दुनिया में कदम रख चुका था। उसने नरेश को इतना मारा कि उसके हाथ पाँव की हड्डी टूट गई। फिर वो उसे घायल अवस्था में पुल के नीचे छोड़कर आ गया। भिखारियों ने उसका आधा अधूरा इलाज कराया जिससे उसकी हड्डियाँ ठीक से नहीं जुड़ पाई और वो हमेशा के लिए अपाहिज हो गया और भीख माँगकर अपना गुजारा करने लगा। रजनी बेटों के ही साथ थी। उसने भी नरेश की कभी खोज खबर नहीं ली थी। ममता ने खबर लेनी भी चाही तो नरेश ने शहर ही हमेशा के लिए छोड़ दिया था।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप
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