गिरधारीलाल ने अपने साढ़ू भाई सतीश के लड़के नीलेश को बचपन से अपने बेटे की तरह अपने घर में रखा था। उसे पढ़ाया लिखाकर सरकारी अफसर बनवाया था। आज उसी ने मुँह फेर लिया था। अपना काम कराने के लिए वे उसके ऑफिस के बाबू को तीस हज़ार रुपये को रिश्वत देकर आए थे। वही आज बेमुरब्बत हो गया था।
गिरधारीलाल जी की जब रूपा से शादी हुई थी तब उनके साढ़ू भाई सतीश के तीन बेटे और दो बेटियाँ थे। उनमें से नीलेश पाँच वर्ष का था। गिरधारीलाल शिक्षा विभाग में सहायक शिक्षक के पद पर पदस्थ थे। शादी के तीन साल बाद जब उन्हें कोई संतान नहीं हुई तब उनहोंने अपनी तथा पत्नी की मेडिकल जाँच कराई जिसमें पता चला कि रूपा कभी माँ नहीं बन सकती। यह सुनकर रूपा दुखी हो गई। तब गिरधारीलाल जी ने उसे खूब दिलासा दी। इसका फायदा सतीश ने तथा उसकी पत्नी कंचन ने उठाया। सतीश की आर्थिक स्थिति खराब थी। वो पाँच संतानों का पालन ठीक से नहीं कर पा रहा था। नीलेश उस समय कक्षा चार में पढ़ रहा था। एक दिन सतीश और कंचन नीलेश को लेकर गिरधारीलाल जी के घर आए। वहाँ उन्होंने अपनी बातों में लेकर कहा कि आज से नीलेश आपका बेटा अब आप इसे रखो यह आपके पास ही रहेगा। रूपा के जोर देने पर गिरधारीलाल जी ने सतीश तथा कंचन की बात मान ली। नीलेश को उन्हें अपने बेटे की तरह रखा। उसका हर तरह से ख्याल रखाया उसे खूब पढ़ाया लिखाया। ग्रेज्यूएशन करने के बाद उसे कोचिंग कराई। उसमें उनके बहुत रुपये खर्च हो गए पर उन्होंने इसकी चिंता नहीं की। जब नीलेश का चयन मुख्य नगर पालिका अधिकारी के पद पर हो गया तो उनकी खुशी का कोई ठिकाना नहीं रहा। नीलेश ने नौकरी ज्वाइन कर ली थी। उसका शहर तीन सौ किलोमीटर दूर था। उन्हें जब झटका लगा जब नीलेश छुट्टी में उनके पास न आकर सतीश के यहाँ आया। गिरधारीलाल जी ने उसे फोन किया तो उसने फोन भी नहीं उठाया। नीलेश ने नौकरी लगते ही उनसे अपने सारे संबंध तोड़ लिए थे। नीलेश की जहाँ शादी तय हुई उस लड़की के पिता से गिरधारीलाल जी का वैर था। उसने नीलेश को खूब दहेज देना मंजूर किया पर यह शर्त रखी की नीलेश की शादी में गिरधारीलाल जी को नहीं बुलाया जाएगा। उनकी इस शर्त को सतीश जी ने मंजूर कर लिया। नीलेश की शादी में गिरधारीलाल जी तथा रूपा को उन्होंने निमंत्रण पत्र तक नहीं दिए थे। फोन उठाना भी बंद कर दिया था। रुपा ने एक दिन सत्तर फोन काल कंचन को की थीं पर उसने रूपा का फोन नहीं उठाया था। नीलेश ने शादी के बाद तो पत्नी के कहने पर गिरधारीलाल जी को अपना वैरी मान लिया था। एक बार की बात है एक रिश्तेदार की लड़की की शादी में शामिल होने के लिए गिरधारीलाल और रूपा आए थे। वहाँ उन्हें नीलेश तथा उसकी पत्नी मिले। दोनों ने उन्हें देखकर मुँह फेर लिया। रूपा तो नीलेश की सगी मौसी थी पर नीलेश ने उससे भी मुँह फेर लिया था। कुछ दिन बाद नीलेश गिरधारीलाल के शहर में नगर निगम में ट्रांसफर होकर आ गया था। तब भी उसने गिरधारीलाल जी से संपर्क नहीं किया था। आज वे नगर निगम में अपने काम से आए थे। उन्हें अब भी विश्वास था कि नीलेश उनकी मदद करेगा लेकिन ऐसा हुआ नहीं। जब उन्होंने बाबू से कहा कि तुम्हारा अधिकारी नीलेश मेरा बेटा है तो बाबू ने नीलेश से यह बात कही तो नीलेश ने कहा मेरा उनसे कोई संबंध नहीं है। तुम्हें उनका काम कैसे करना है ये तुम जानो। इसके बाद उस बाबू ने उनसे उनका काम करने के पूरे तीस हजार रुपये वसूल लिए थे। वे दुखी होकर जब ऑफिस से बाहर जा रहे थे तब दलाल ने उन्हें रोककर कहा दे आए न दस हजार रूपये ज्यादा। हम बीस हजार रुपये में काम करा रहे थे तो वो आपको अच्छा नहीं लगा। गिरधारीलाल जी दलाल को क्या जवाब देते दुखी मन से घर आ गए थे। फिर यह सोचकर उन्होंने संतोष कर लिया था कि जब आज के जमाने में सगा बेटा ही साथ नहीं देता तो फिर ये तो उनके साढ़ू भाई का बेटा है।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप
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