सरोज और उसका पति छोटेलाल मिस्री दो दिन पहले गाँव से कीरत!नगर!आए थे यहाँ उन्होंने एक बिल्डिंग में दो कमरे किराये से लिए थे सुब्ह छोटेलाल काम पर निकल गया था सरोज अपनी पड़ोसन जानकी से बात कर रसी थी तभी लगभग चालीस साल का एक अर्ध विक्षिप् व्यक्ति आया और उनसे कुछ खाने को माँगने लगा सरोज ने दो रोटी और सब्जी लाकर उसे दी और वो उसे थोड़ी दूर जाकर खाने लगा। यह देख जानकी ने सरोज से कहा तुम जानती हो ये कौन है वो बोली भिखारी है। जानकी बोली इसके अलावा ये कीरत नगर के नगर सेठ नारायण दास का बेटा राजेश है।पिता के मरने के बाद इसने सारी संपत्ति बर्बाद कर दी इसकी माँ ने भी इसका साथ दिया अब वो नगर सेठानी भी भीख माँगकर अपना गुजारा कर रही है।
जानकी की बात सुनकर सरोज की उतूसुकता बढ़ी तो उसने उनके भिखारी होने का कारण पूछा तब जानकी ने बताया कि इसके पिता नारायण दास बचपन में बहुत गरीब थे । लेकिन उनमें गरीबी को दूर करने की प्रबल इच्छा थी इसके लिए उन्होंने अनथक परिश्रम किया पहले गल्ला मंडी में हम्माली की फिर उसी मंडी में गल्ला व्यापारी बन गए। फिर उन्होंने दाल मिल खोली आटा बेसन मिल खोली चालीस एकड़ कृषि भूमि खरीदी वेयर हाऊस बनवाया बड़े बाजार में बीस दुकाने बनवाई। खूब पैसा कमाया लेकिन उनकी पत्नी रूपा से उनकी कभी पटरी नहीं बैठी वे जब उसे नोटों की गढ्ढी देते तो कहती दूर रखो इस कचरे से मुझे। तुम्हीं सम्हालो इसे मुझे नफरत है इस पैसे से । वो पैसे को बेरहमी से बर्बाद करती थी कहती इतनी हाय हाय क्यों करते हो क्या करोगे इतने पैसे का नारायणदास जी ने घोर गरीबी देखी थी वे पैसे की कद्र करना जानते थे मगर रूपा उन्हें हद दर्जे का कंजूस कहती थी। वो कोई नई संपत्ति खरीदने की बात करते तो लड़ने लगती कहती सब कबाड़ा है । बेचो इसे ओर आराम से रहो जो पैसा आए उसे खूब खर्च करो ज़िंदगी है कितने दिनों की रूपा ने अपने लड़के राजेश को भी अपने पिता का दुश्मन बना दिया था दोनों माँ बेटे मिलकर उनकी खूब खिल्ली उड़ाते थे राजेश चौथी से आगे पढ़ नहीं पाया कमाई करने से उसे चिढ थी उसके बहुत सारे आवारा दोस्त थे जो उसके फैसे पर ऐश करते थे वे कहते तेरे पिताजी के पास इतना पैसा है कि तेरी सात पीढियाँ भी बैठकर खाएँ तो भी समाप्त न हो तुझे कमाने की जरूरत ही क्या है माँ भी कहती अपने बाप के जैसा मत बन उनकी तो सारी जिंदगी हो गई हाय हाय पैसा करते हुए। नारायण दास जी राजेश के भविष्य को लेकर चिंतित रहा करते थे एक दिन जब वे अपनी दुकान पर बैठे थे तब उनकी छाती में दर्द हुआ और वे बेहोश होकर गिर पड़े उन्हें अस्पताल ले जाया गया जहाँ डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया सेठानी को नारायण दास जी से इतनी नफरत थी की उसे उनके मरने का ज्यादा दुख नहीं हुआ बल्कि मुक्ति का अहसास हुआ। इसके बाद माँ बेटे दोनों मिलकर उनकी संपत्ति बेचकर अनाप शनाप रुपया खर्च कर जीवन बिताने लगे। फिजूल खर्ची से तो कुबेर का खजाना भी खाली हो जाता है उनकी पूरी संपत्ति वे गुजरे आठ सालों में मिटा चुके थे जिस मकान में वे रह रहे थे वो भी बिक गया था जिसका पैसा उधारी चुकता करने में चला गया अब उनकी गरीबी के दिन शुरू हो गए थे अपनी ऐसी हालत को दोनों माँ बेटे सह नहीं सके और उनका भानसिक संतुलन बिगड़ गया उनके कर्मों की सजा उन्हें इसी जन्म में मिल रही थी पिछले दो वर्षों से दोनों माँ बेटे भीख माँगकर अपना पेट भर रहे हैं तथा अन्य भिखारियों के साथ पुल के नीचे अपने रात का समय बिताते हैं। जानकी की बात सुनकर सरोज दुखी हो गई जानकी बोली हम यहाँ किराये से रह रहे हैं ये मकान भी नायणदास जी का ही था जो उनके मरने के बाद इन माँ बेटों ने बेच दिया था। सरोज सोच रही थी उसका पति भी मेहनती और जुझारू है अगर वो अमीर बनेगा तो वो नगर सेठ की पत्नी की तरह उसकी विरोधी नहीं होगी बल्कि उसके साथ कदम से कदम मिलाकर चलेगी ।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप
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