ग्राम हिरनखेड़ा के सरपंच रतन सिंह के पूर्वज दामोदर प्रसाद सिंह अठारह सौ सत्तावन की क्रांति के समय आजमगढ़ से मध्य प्रदेश में आए थे और हिरनखेड़ा ग्राम में आकर बस गए थे। उनके पास खेती तो नहीं थी मगर बैलगाड़ी और बैल थे जिन से वे जंगल से जलाऊ लकड़ी लाकर शहर में बेचते थे। तब उनकी उम्र बाईस साल की थी। उनकी पत्नी ललिता बीस वर्ष की थी। उनके नौ लड़के थे तथा एक लड़की थी। आज उनके कुटुंब से पूरा गाँव भरा हुआ था। गाँव में उनके तीन सौ घर थे। सारे संसाधनों पर उनका कब्जा था और आसपास के गाँवों में उनका दब-दबा कायम था।
दामोदार जी के विषय में लोग कहते थे कि उनका किसी से झगड़ा हो गया था। जिससे झगड़ा हुआ उसकी जाति का गाँव में बाहुल्य था। इसलिए वे दबकर रह गए थे पर उन्होंने प्रण कर लिया था कि वे गाँव में अपना प्रभुत्व बनाकर मानेंगे और उनके नौ लड़के हो गए। सबसे बड़े लड़के के नाम महावीर सिंह था। वे सब भाई मिलकर रहते थे। महावीर सिंह बहुत दबंग जुझारू इंसान था। उसने वन विभाग की डेढ़ सौ एकड़ जमीन पर कब्जा कर लिया था। गाँव में किसी की हिम्मत नहीं होती थी उनसे टकराने की। उस जमीन ने उन्हें संपन्न बना दिया था। नौ लड़कों की शादी होने के बाद उनके भी किसी के यहाँ पाँच तो किसी के यहाँ सात लड़के हुए। पाँचवी पीढ़ी में उनके कुंटुब की आबादी बढ़कर दो हजार हो गई थी। एक हजार दूसरी जाति के लोग थे जिनमें ज्यादातर खेतिहर मजदूर थे। गाँव की लगभग सारी जमीन पर दामोदर जी का कुंटुब काबिज था। गाँव की जो दबंग जाति मानी जाती उस जाती के लोग भी अपनी जमीन जायदाद रतन सिंह कुटुंब वालों को बेचकर चले गए थे। आज भी उनमें एकता थी। जिससे वे ऊचल के सबसे दबंग माने जाते थे। दामोदर जी की छत्री गाँव के पास ही तीस एकड़ जमीन में बनी थी। जहाँ पर हर साल बैशाख के महीने में मेला लगता था। उसी परिसर में शिवजी का भी मंदिर था। शिवजी के दामोदर जी बहुत बड़े भक्त थे। वो एक दर्शनीय स्थान था। जिसमें दामोदर जी की प्रतिमा भी स्थापित थी। रतन सिंह जी ने गाँव के सरकारी अस्पताल का नाम दामोदर अस्पताल साँसद जी के द्वारा घोषणा कर कराया था। मेले से पंचायत को दस लाख की आय होती थी। आज रतन सिंह जी सेक्रेटरी से उसी का हिसाब लगवा रहे थे। जिससे उक्त रकम का पता चल सका था।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप
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