सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

कहानी: फार्म मैनेजर

शुगर फेक्टरी के कभी फार्म मैनेजर रहे दिनेश वर्मा को फुटपाथ पर दुकान लगाकर चप्पल बेचते हुए देखकर उनके सहपाठी रहे शिवलाल जी को बड़ी हैरत हुई उन्होंने कहा आप इतने बड़े पद रहे और अब फुटपाथ पर दुकान लगाकर चप्पल बेच रहे हैं कहीं ओर अच्छी नौकरी नहीं मिली क्या? तो वे बोले कि अब इस उम् में मुझे कौन नौकरी देगा। चप्पलें बेचने से ठीक ठाक कमाई हो जाती है जिससे परिवार का गुजारा चल जाता है वो अच्छे दिन तो अब आने से रहे जब घर में तीन तीन नौकर काम करते थे फेक्टरी ने रहने के लिए बड़ा बंग्ला दे रखा था। अब तो दो कमरे के एक छोटे से मकान में रहकर अपना समय गुजार रहे हैं।
शिवलाल और दिनेश पहली कक्षा से हायर सेकेण्डरी तक एक ही स्कूल में साथ साथ पड़े थे शिवलाल के पिताजी मजदूरी करते थे दिनेश के पिताजी की किराने की दुकान थी पुराना दौर था । शिवलाल ने शिक्षक चयन परीक्षा दी थी उसमें उनका चयन हो गया था और वे शहर से चालीस किलोमीटर दूर सिंहपुर गाँव के प्राइभरी स्कूल के टीचर बना दिए गए थे सौ रुपये महीना वेतन था सस्ता जमाना था सवा रुपया बस का किराया था तो उन रुपयों में उनका खर्च चल रहा था एक साल बाद उनका वेतन बढने वाला था यह सोचकर वे थोड़े वेतन से ही संतोष कर नौकरी कर रहे थे। दिनेश वर्मा जी का एडमीशन कृषि कॉलेज में हो गया जहाँ से कृषि विज्ञान में बी एस सी कर रहे थे। जब शिवलाल गाँव से शहर आते तब दिनेश उनसे कहते इतने कम वेतन में नौकरी कर क्यों जिंदगी खराब कर रहा है इस पद पर मेरी भी नौकरी लगी थी । पर मैंने की नहीं। बी एस सी एजी से करने के बाद दिनेश की शुगर फेक्ट्री में फार्म मैनेजर की नौकरी लग गई थी तब दिनेश ने बड़े गर्व से कहा था। पंद्रह सौ वेतन मिल रहा है जीप और ड्राइवर मिला है रहने को बंग्ला दिया गया है बहुत सारे लोग मेरे अंडर में काम कर रहे हैं। शिवलाल ने बताया कि मुझे तो ढाई सौ रुपये महीने की तनख्वाह मिल रही है। दिनेश ने कहा यही तो फर्क है अच्छी पढ़ाई कर नौकरी करने में।नौकरी करते हुए दिनेश को बीस साल हो गए थे। वेतन बढ़कर बारह हजार!रुपया महीना हो गया था तब शिवलाल जी को तीन हजार रुपये वेतन मिल!रहा था शिवलाल की पत्नी नीता भी शिक्षक थी उसका वेतन ढाई हजार रुपये महीना था दोनों का वेतन मिलाने के बाद भी उनका वेतन दिनेश के वेतन के आधे से भी कम था। लेकिन समय बदला फेक्ट्री बंद हो गई फार्म पर दबंगों ने कब्जा कर लिया । दिनेश जी की नौकरी चली गई उनकी उम्र पैंतालीस वर्ष की हो गई थी कोई उन्हें नौकरी देने को तैयार नहीं था कुछ साल उन्होंने अपनी बचत के सहारे गुजारे पर वो पैसा भी खत्म हो गया तो उन्होंने फुटपाथ पर!ये चप्पल बेचने की दुकान लगा ली थी यह दुकान लगाए उन्हें पूरे आठ साल हो गए थे। इधर शिवलाल जी तथा नीता जी के वेतन में कई गुना बढ़ोतरी हो गई थी दोनो का वेतन मिलाने पर उन्हें डेढ लाख रुपये महीने की आय हो रही थी जबकि दिनेश को सात सौ रुपये रोज से ज्यादा मुनाफा कभी नहीं हुआ था। । अब दिनेश को लगा रहा था किउसने सरकारी नौकरी छोड़कर बहुत बढ़ी गलती की है जिसकी भरपाई कभी नहीं हो सकती पत्नी को भी उन्होंने नौकरी नहीं करने दी थी वै भी अब पछतावा कर रही थी। अब तो उनके पास अतीत की सुनहरी यादें थीं और गुरबत का समय ।

******
रचनाकार
प्रदोप कश्यप

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

व्यंग्य : जीते जी रोटी को तरसाया मरने के बाद श्राद्ध

आज कल सोलह श्राद्ध का समय चल रहा है कई जगह पर श्राद्ध के आयोजन हो रहे हैं बहुत सारे लोगों को भोजन कराया जा रहा है अपने पितरों के श्राद्ध में लोग हज़ारों रुपये भी खर्च कर रहे हैं उनमें कुछ तो ऐसे हैं जिन्होंने जीते जी अपने बूढ़े माँ बाप की खबर तक नहीं ली और अब उनके मरने पर उनके श्राद्ध पर बड़ा आयोजन कर रहे हैं उनकी तस्वोर पर माला चढ़ा रहे हैं। ऐसे लोगों में शहर के रविकांत जी भी हैं उन्होंने अपने स्वर्गीय माता पिता की तिथि पर भव्य आयोजन किया था खूब पकवान खिलाए गए थे खूब दान किया गया था पर उन्होंने अपने माता पिता को जीते जी बहुत दुख दिए थे। उनके पिताजी सत्तासी वर्ष के थे माँ पिच्यासी वर्ष की दोनों अपने पुराने घर में रहते थे उनका बेटा रविकांत उनकी कभी खोज खबर नहीं लेता था बेटी विदेश में दामाद के साथ रह रही थी। वे दोनों ही एक दूसरे का ख्याल रख रहे थे एक दिन रविकांत जी के पिताजी का दुखद निधन हो गया तब रविकाँत घर?आया पिताजी की उत्तर क्रिया करने के बाद चला गया रविकाँत की माँ अकेली रह गई थीं वे सीधी सरल थी जबकि बेटा बहू चपल चालाक बेटे बहू ने बातों में लेकर उनकी सारे सोने चाँदी के जे...

दुर्भावना रखकर निंदा करने वाले लोग (व्यंग्य)

कबीर जी ने निंदक को इसलिए हितकारी कहा है क्योंकि वो हमारी बुराइयों को उजागर करते हैं और हम उन्हें दूर करते चले जाते हैं। इस तरह हमारा स्वभाव निर्मल हो जाता है। लेकिन आज के दौर में दुर्भावना रखकर निंदा करने वालों की संख्या ज्यादा हो गई है। ऐसे लोग हमारी बुराईयों को उजागर नहीं करते बल्कि हमारी खूबियों को छिपाकर मन में दुर्भावना रखते हुए हमारी निंदा करते हैं। इन लोगों से दूर रहने में ही भलाई है। अगर इनको साथ रखा तो ये हमारा मनोबल तोड़कर रख देंगे। हमें नकारा साबित करने की कोशिश करेंगे हमारे आत्मविश्वास को डगमगा देंगे। ये दुर्भावना रखकर निंदा करने वाले लोग अपने विरोधियों को निपटाने में कोई कसर नहीं छोड़ते। उसके सारे अवसर या तो खत्म कर देते हैं या छीन लेते हैं। ये लोग हद दर्जे के मतलबी इंसान होते हैं। जिस से मतलब निकालना हो उसकी झूठी तारीफों के पुल बाँधते हैं। उसकी खूब चापलूसी करते हैं उसे महान सिद्ध कर देते हैं और समाज में एक भ्रम की स्थिति पैदा कर देते हैं। ये ग्रुप बनाने में माहिर होते हैं। जो इनके गुट में शामिल हो जाता है ये उसके हर ऐब ढँक लेते हैं। उसे स्थापित करने के हर स...

कहानी: शादी के लिए नौकरी

रवीन्द्रसिंह को एक प्राईवेट दवा कंपनी में नौकरी किए अभी एक महीना भी नहीं हुआ था कि वह नौकरी छोड़ने का इरादा करने लगा था  लेकिन उसकी  माँ कंचन  का कहना था  जब तक  तेरी शादी न हो जाए  तब तक नौकरी करता रह जब शादी हो जाए तब नौकरी छोड़ना जबकि रवीन्द्र सिंह सोच रहा था कि एक महीना गुजारना मुश्किल हो रहा है कब तो उसकी शादी होगी और कब वो ऐसी नौकरी से पीछा छुड़ाएगा रवीन्द्र सिंह की  उम्र पैंतीस वर्ष की होने जा रही थी  और वो अभी तक कुँवारा  था कंचन जी का वह इकलौता लड़का था  उनकी दो लड़कियाँ थीं दोनों रवीन्द्द से बड़ीं थीं दोनों की शादी हो गईं थी दोनों के बच्चे   कोई छठी में तो कोई सातवीं में तो कोई आठवीं में पढ़ रहा था।  कंचन जी कस्बे के  एक सरकारी दफ्तर में चपरासी की नौकरी कर रही थीं  उनके पति सुरेन्द्रसिंह  सरकारी दफ्तर में बाबू थे  सरकारी काम से जब वे कहीं जा रहे थे तब  एक ट्रक ने उन्हें टक्कर मार दी थी जिससे उनका वहीं दुखद निधन हो गया था।  जब रवीन्द्र एक साल का था तब उसके पिता का निधन हुआ था उसकी दोन...