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कहानी: निष्कासित

खरी और कड़वी बात मुँह पर कहने वाले मानवता के पक्षधर जवाहर सिंह को इमलियाँ गाँव के लोगों ने गाँव से निष्कासित कर दिया था। वो गाँव से तीन किलोमीटर दूर अपने दो एकड़ के खेत में झोपड़ी बनाकर रह रहा था। छोटे सा खेत ही उसके जीवन यापन का जरिया बना हुआ था। गाँव के सभी लोगों ने उसका साथ नहीं छोड़ा था।कुछ लोग उससे छिपकर मिलने आ ही जाते थे। जिनकी वह अपने स्तर पर मदद कर दिया करता था।
जवाहर सिंह किसी से दुश्मनी नहीं रखता था फिर भी लोग उससे नाराज थे।
बचपन में जवाहर सिंह जब स्कूल गया तो शिक्षक के द्वारा छात्रों से किए जा रहे पक्षपात का उसने विरोध किया। दलित बच्चों से भेदभाव करना उसे ठीक नहीं लगा। इसका विरोध करने में शिक्षक उससे नाराज हो गए। उन्होंने उसकी शिकायत उसके पिताजी राजमल से कर दी कहा कि ऊँची जाति का होने के बाद भी ये दलित बच्चों के साथ रहता है तथा उनका पक्ष लेता है। इस बात पर राजमल ने जवाहर सिंह को बहुत डाँटा कहा ऐसा कर के तू हमारे गाँव की व्यवस्था बिगाड़ना चाहता है। स्कूल में वो चौथी से आगे नहीं बढ़ सका। शिक्षकों ने उसे स्कूल से निकालकर ही दम लिया। स्कूल से निकलने के बाद वो पिताजी की दुकान पर बैठने लगा। वहाँ वो गरीबों को मुफ्त में ही सामान दे देता था। इससे उसके पिताजी उससे नाराज हो गए और उन्होंने उसे दुकान पर आने से मना कर दिया। उसे पिताजी ने पालतू पशुओं की देखभाल का काम सौंप दिया। वो काम उसने ठीक से तो किया पर ज्यादातर दूध वो बछड़ों को पिला देता और कम दूध निकालकर लाता। पिताजी को यह बर्दाश्त नहीं हुआ। बाइस साल का होने के बाद भी पिताजी का नजर में वो बिगड़ा हुआ इंसान था। उन्होंने उसकी शादी यह सोचकर कर दी कि शादी के बाद ये सुधर जाएगा पर जवाहर सिंह में कोई परिवर्तन नहीं आया। उसकी पत्नी कुछ दिन तो साथ रही फिर उसे छोड़कर मायके चली गई। वो गाँव में फैली कुरीतियों और अंधविश्वास का विरोध करने लगा। कुछ लोग विवाह के नाम पर अपनी बेटी को बेच देते थे। जब उसने इसका विरोध किया तो वे उसके खिलाफ हो गए। सवर्ण जाति की एक महिला जो युवास्था में विधवा हो गई थी। उसके पुन्रविवाह की बात जब उसने उसके माता पिता से कही तो वे नाराज हो गए। गाँव के पटेल ने अपने बूढ़े बाप को घर से निकाल दिया था। इसका विरोध भी जवाहर सिंह ने किया तो वो उससे ही लड़ने लगा। मृत्यु भोज का विरोध करना लोगों को बुरा लगा। शादी में फिजूल खर्ची का विरोध भी लोगों को बुरा लगा। पिताजी ने उससे खेती का काम भी छीन लिया था। उन्हें मजदूरों का पक्ष लेना अखर गया था। उसकी बातें किसी को समझ में ही नहीं आतीं थीं। राजमल जी के पास रोज उसकी शिकायतें पहुँचती थीं। एक दिन गाँव वालों ने बैठक कर उसे गाँव से निकाल दिया। राजमल जी ने ही उसे ये दो एकड़ जमीन दी थी जिसमें रहकर वो अकेला ही जीवन यापन कर रहा था। उससे मिलने जुलने तथा बात व्यवहार रखने वालों पर भी प्रतिबंध लगा दिया गया था। फिर भी लोग छुपकर उससे मिलने आ ही जाते थे। जवाहर सिंह गाँव में मानवता लाना चाहता था लेकिन गाँव वाले ऊँच-नीच जाति भेद को ऊपर रखते थे। जवाहर सिंह की मानवता भरी बातें उन्हैं समझ में नहीं आतीं थीं।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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