सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

कहानी: दगा

अपने खास दोस्त रवीन्द्र के दगा देने के कारण नौकरी गँवा चुका सुरेन्द्र घर से भी बेदखल हो गया था अब उसकी आय!का एक मात्र जरिया रिक्शा चलाना ही रह गया था जो पत्नी घर के काम करती थी उसे भी बाहर काम करना पड़ रहा था वो एक निजी अस्पताल में सफाई कर्मी का काम कर रही थी।
सुरेन्द्र आर्य धर्म शाला में चौकीदारी का काम करता था उसकी ड्यूटी रात की थी इष के लिए समिति ने रहने को घर भी दिया था दिन में सुरेन्द्र रिक्शा चलाता था इससे उसका गुज़ारा आराम से चल रहा था तीन महीने पहले की बात है अचानक सुरेन्द्र के पास ख़बर आई की माँ की तबियत बहुत खराब है तुरंत आओ। सुरेन्द्र समिति के सचिव के पास गया तथा उन से छुट्टी माँगी तो सचिव ने कहा अपनी जगह पर किसी विश्वसनीय को रखकर जाओ तो छुट्टी मिलेगी वरना छुट्टी देने में हम असमर्थ रहेंगे ऐसे में सुरेन्द्र को अपने ख़ास मित्र रवीन्द्र की याद आई उसने रवीन्द्र को अपनी परेशानी बताई तो रवीन्द्र उसकी जगह पर काम करने को तैयार हो गया। सुरेन्द्र गाँव चला गया और माँ के उपचार कराने में जुट गया बहुत इलाज कराने के बाद भी माँ को बचाया न जा सका माँ की उत्तर !क्रिया करने के बाद जब सुरेन्द्र वापस अपने काम पर आया तो वहाँ सब कुछ बदला हुआ था रवीन्द्र ने काम छोड़ने से इंकार कर दिया था । जब वो इस संबंध में समिति सचिव के पास गया तो सचिव ने कहा वो अच्छा काम कर रहा है हमें उससे कोई ऐतराज नहीं है अगर वो काम नहीं छोड़ता है तो हम उसे हटाएँगे नहीं तुम नौकरी छोड़कर जा सकते हो इसके साथ ही तुम्हें वो घर भी खाली करना पड़ेगा जो तुम्हें समिति ने रहने को दिया था। सुरेन्द्र को आखिर घर खाली करना पड़ा वो घर समिति ने रवीन्द्र को दिया था रवीन्द्र ने सुरेन्द्र के साथ दगा किया था वो विवश था कुछ कर नहीं सकता था रवीन्द्र को रात की ये नौकरी अच्छी लगी थी इस नौकरी के बाद दिन में वो समिति के उपाध्यक्ष की दुकान पर काम कर रहा था वो उसकी अलग से आय थी रवीन्द् ने खूब खुशामद कर समिति को अपने पक्ष में चर लिया था। जिसकी वजह से सुरेन्द्र को अपनी नौकरी गँवानी पड़ी थी। किराये का मकान लिया था उसका खर्च भी बढ़ गया था। सुरेन्द्र को ज्यादा काम कना पढ़ रहा था पत्नी भी काम कर रही थी फिर भी उनका गुजारा मुश्किल से चल रहा था रवीन्द्र ने उसके साथ दगाबाजी की थी और अब तो उसने सुरेन्द्र से दोस्ती नोडैकर बात करना तक बंद कर दी थी। सुरेन्द्र को इसका बहुत दुख था उसकी नौकरी चली गई थी घर चला गया था और दोस्त का साथ भी छूट गया था।और वो विवश होकर कुछ बी कर पाने में असमर्थ था।


*****
रचनाकार
प्रदीप कश्यप

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

व्यंग्य : जीते जी रोटी को तरसाया मरने के बाद श्राद्ध

आज कल सोलह श्राद्ध का समय चल रहा है कई जगह पर श्राद्ध के आयोजन हो रहे हैं बहुत सारे लोगों को भोजन कराया जा रहा है अपने पितरों के श्राद्ध में लोग हज़ारों रुपये भी खर्च कर रहे हैं उनमें कुछ तो ऐसे हैं जिन्होंने जीते जी अपने बूढ़े माँ बाप की खबर तक नहीं ली और अब उनके मरने पर उनके श्राद्ध पर बड़ा आयोजन कर रहे हैं उनकी तस्वोर पर माला चढ़ा रहे हैं। ऐसे लोगों में शहर के रविकांत जी भी हैं उन्होंने अपने स्वर्गीय माता पिता की तिथि पर भव्य आयोजन किया था खूब पकवान खिलाए गए थे खूब दान किया गया था पर उन्होंने अपने माता पिता को जीते जी बहुत दुख दिए थे। उनके पिताजी सत्तासी वर्ष के थे माँ पिच्यासी वर्ष की दोनों अपने पुराने घर में रहते थे उनका बेटा रविकांत उनकी कभी खोज खबर नहीं लेता था बेटी विदेश में दामाद के साथ रह रही थी। वे दोनों ही एक दूसरे का ख्याल रख रहे थे एक दिन रविकांत जी के पिताजी का दुखद निधन हो गया तब रविकाँत घर?आया पिताजी की उत्तर क्रिया करने के बाद चला गया रविकाँत की माँ अकेली रह गई थीं वे सीधी सरल थी जबकि बेटा बहू चपल चालाक बेटे बहू ने बातों में लेकर उनकी सारे सोने चाँदी के जे...

दुर्भावना रखकर निंदा करने वाले लोग (व्यंग्य)

कबीर जी ने निंदक को इसलिए हितकारी कहा है क्योंकि वो हमारी बुराइयों को उजागर करते हैं और हम उन्हें दूर करते चले जाते हैं। इस तरह हमारा स्वभाव निर्मल हो जाता है। लेकिन आज के दौर में दुर्भावना रखकर निंदा करने वालों की संख्या ज्यादा हो गई है। ऐसे लोग हमारी बुराईयों को उजागर नहीं करते बल्कि हमारी खूबियों को छिपाकर मन में दुर्भावना रखते हुए हमारी निंदा करते हैं। इन लोगों से दूर रहने में ही भलाई है। अगर इनको साथ रखा तो ये हमारा मनोबल तोड़कर रख देंगे। हमें नकारा साबित करने की कोशिश करेंगे हमारे आत्मविश्वास को डगमगा देंगे। ये दुर्भावना रखकर निंदा करने वाले लोग अपने विरोधियों को निपटाने में कोई कसर नहीं छोड़ते। उसके सारे अवसर या तो खत्म कर देते हैं या छीन लेते हैं। ये लोग हद दर्जे के मतलबी इंसान होते हैं। जिस से मतलब निकालना हो उसकी झूठी तारीफों के पुल बाँधते हैं। उसकी खूब चापलूसी करते हैं उसे महान सिद्ध कर देते हैं और समाज में एक भ्रम की स्थिति पैदा कर देते हैं। ये ग्रुप बनाने में माहिर होते हैं। जो इनके गुट में शामिल हो जाता है ये उसके हर ऐब ढँक लेते हैं। उसे स्थापित करने के हर स...

कहानी: बकरी

वनक्षेत्र के समीप स्थित गाँव खुशामदा के बकरी पालक रमणलाल ने इस बार के पशु मेले में पाँच लाख रुपये के बकरे बेचे थे। दो महीने पहले वो तीन लाख रुपये की बकरियाँ बेच चुका था इसके अलावा हर महीने वो चालीस हज़ार रुपये का बकरी का दूध भी बेच देता था। उसने गाँव में पक्का मकान बनवा लिया था और अच्छे से अपना जीवन यापन कर रहा था। जबकि दूसरी और उसका पड़ोसी किसान ओम प्रकाश दस एकड़ का भूमि स्वामी होने के बाद भी गले-गले तक कर्ज में डूबा हुआ था। दो लाख रुपये कर्ज तो रमणलाल ने भी उसे दे रखा था। रमणलाल के पास आठ साल पहले कुछ नहीं था। वो अत्यंत गरीब खेतिहर मजदूर था। महीने में कभी बीस दिन तो कभी दस दिन ही उसे काम मिलता था। जिसमें उसका मुश्किल से गुजर बसर होता था। रमणलाल ने तब गाँव के किसान हेमराज के यहाँ कुआँ की खुदाई के कार्य में मजदूरी की थी उसके एक हज़ार रुपये बकाए थे। वो अपने रुपये का तकाजा करने हेमराज के पास गया था। हेमराज को उदास देखकर उसने कारण पूछा तो हेमराज ने दौखक होकर कहा कि बच्चे को बकरी का दूध पिलाने का परामर्श वैद्य जी ने दिया था। उसके लिए मैं बाजार से बकरी लाया था जो दो चार दिन में जनने वाली थी...