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कहानी: भलमनसाहत

रतनपुर गाँव के अस्सी वर्षीय हरलाल जी गाँव के सबसे भले इंसान माने जाते थे। हर परिस्थिति में उन्होंने अपनी भल मनसाहत नहीं छोड़ी थी। जबकि उन्होंने कई बार धोखे खाए थे। लोगों ने उनकी शराफत का अनुचित लाभ उठाया था फिर भी वे भलाई पर कायम रहे थे। बीस एकड़ जमीन एवं बड़ा मकान बेटे बहू को देने के बाद वे एक छोटे से झोपड़ी नुमा घर में अपनी पत्नी रेशम बाई के साथ रह रहे थे। मंदिर के सामने फूल बेचकर अपना गुजारा कर रहे थे। किसी के सामने हाथ पसारकर भीख माँगना उनके स्वभाव के विपरीत था।
हरलाल जी बचपन से ही भले थे। उनका छोटे भाई बाबूलाल चालाक था तथा माँ बाप का चहेता था। यही कारण था कि जब उनके माता पिता ने उनकी शराफ़त से तंग होकर उन्हें घर से अलग किया तो सबसे बेकार जमीन उन्हें दी। पुश्तैनी मकान में हिस्सा न देते हुए गाँव के कोने पर बना एक बाड़ा उन्हें दे दिया जहाँ जानवर बाँधे जाते थे। हरलाल फिर भी खुश थे संतुष्ट थे आनंदित थे। उन्हें किसी के प्रति कोई मलाल नहीं था। हरलाल जी ने कड़ी मेहनत से उस खराब जमीन को भी उपजाऊ बना लिया था। खुद कुआँ खोदकर सिंचाई का साधन कर लिया था। दो साल में उस बाड़े में उन्होंने अच्छा बड़ा मकान बना लिया था। वहीं पंचायत भवन स्कूल तथा अस्पताल खुल जाने के कारण वो जगह गाँव की सबसे अच्छी जगह बन गई थी। यह उनकी भलमनसाहत का ईनाम था। उनकी पत्नी रेशम बाई शुरू में उनकी भलमनसाहत से परेशान थी इसका विरोध करती थी। बाद में वो भी उनका साथ देने लगी थी। उनके यहाँ मेहमानों का आना जाना लगा रहता था। वे सबका यथोचित सत्कार करते दान धर्म में भी सबसे आगे रहते थे। उनका एक ही लड़का था सूरज। वो आठवीं से आगे पढाई नहीं कर सका था। नवमीं में लगातार तीन साल फेल होने के कारण जब उसे सकूल से निकाल दिया गया तो वो खेती करने लगा था। जब उसने खेती बाड़ी अच्छे से सम्हाल ली तो हरलाल जी ने अपना सारा ध्यान भलाई के काम करने में लगा दिया। सूरज जब विवाह योग्य हुआ तो हरलाल जी ने उसकी शादी गरीब घर की लड़की कुसुम से कर दी। दहेज के नाम से एक रुपया भी उन्होंने नहीं लिया। दोनों तरफ का शादी का खर्च उन्होंने ही उठाया। कुसुम को उन्होंने बेटी की तरह रखा पर कुसुम वैसे तो ठीक थी पर हरलाल जी एवं रेशम बाई की तरह भली नहीं थी। उसे रोज रोज के मेहमानों का आना पसंद नहीं था। जो वे खुलकर दान करते थे वो भी उसे बुरा लगता था। पर वो चाहकर भी इसका विरोध नहीं कर पाती थी। पर इसका भी उसने उपाय सोच लिया था। घर से अलग होकर भी रह नहीं सकती थी क्योंकि जमीन और मकान हरलाल जी के नाम था। उसने इसका भी हल निकाल लिया था। उसने अपने पति सूरज को इसके लिए तैयार किया। कुसुम ने सूरज को हरलाल जी का विरोधी बना दिया था। इसके बाद उसने हरलाल जी की भलमनसाहत का लाभ उठाया। चिकनी चिपुड़ी बातें कर जमीन जायदाद सूरज के नाम करवा दी। हरलाल जी भले इंसान थे वे बहू बेटे की शातिर चालों को समझ नहीं पाए। जमीन जायदाद के नामांतरण के बाद बहू बेटे के तेवर बदल गए थे। सूरज उन्हें पैसे नहीं देता था। मेहमानों का आना बंद करा दिया गया था। इसके बाद भी कुसुम का मन नहीं भरा तो उसने बुढ़ापे में हरलाल जी और रेशम बाई को घर से निकाल दिया। हरलाल जी फिर भी खुश थे। उन्हें बेटे बहू से कोई शिकायत नहीं थी। रेशम बाई ने हर हाल में अपने पति का साथ निभाया था। उसका मानना था जहाँ उसके पति वहाँ उसके लिए हर खुशी है। हरलाल जी पत्नी को लेकर गाँव के बाहर जो उनकी आधा एकड़ जमीन थी उसमें आ गए थे। वहाँ उन्होंने झोपड़ी बना ली थी। उस थोड़ी सी जमीन में उन्होंने फूल एवं सब्जी उगाना शुरू कर दिया था। उन्हें बेचकर अपना गुजारा कर रहे थे और अपने जीवन से खुश थे। रेशम बाई भी खुश थी पास में ही मंदिर था जहाँ वे अपनी फूल फल सब्जी की छोटी सी दुकान लगाते थे। थोड़ी सी आय में भी सुखपूर्वक रह रहे थे। हरलाल अस्सी साल की उम्र में भी पूरी तरह स्वस्थ थे। सारे गाँव के लोग उन्हें सबसे भला इंसान कहते थे। आज भी वे एक राही को अपने घर लाए थे। उसकी बस छूट गई थी अगली बस सुबह नौ बजे की थी। वो चार किलोमीटर पैदल चलकर आया था। लौटकर अपने गाँव जा नहीं सकता था। चारों तरफ घना जंगल था। उसकी परेशानी को समझकर हरलाल उसे अपने घर ले आए थे। रेशम बाई ने उसके लिए भी खाना बनाया था। भोजन कराकर उसके विश्राम की भी उन्होंने व्यवस्था कर दी थी। उसे आराम से सोते देख हरलाल जी को अद्भुत आनंद की प्राप्ति हो रही थी।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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