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कहानी: कंजूसी का लेबल

नगर की वृंदावन कॉलोनी में दिनेश और राकेश नाम को दो सगे भाई परिवार सहित एक ही मकान में अलग भूतल और प्रथम तल के हिस्से में रहते थे उनमें राकेश के ऊपर कंजूसी का लेबल लगा हुआ था जबकि वो फिजूल खर्ची नहीं करता था दूसरी तरफ दिनेश जो कि बड़ा भाई था वो और उसकी पत्नी दीपिका खुल कर खर्च करते एक तरह से वे फिजूल खर्च थे जिसका परिणाम यह हुआ कि दिनेश के पास आज भी अपने पेतृक मकान का भूतल वाला हिस्सा था जबकि राकेश जिसका मासिक वेतन दिनेश से कम था उसके पास करोड़ों की संपत्ति थी चार मकान थे जिनमें चौबीस किरायेदार थे । सड़क के फ्रंट का सोलह सौ वर्ग फुट का शाँपिंग कॉंप्लेक्स था जिसमें तीनों तल पर बारह दुकाने थीं इन सबका किराया ही हर माह उसके मासिक वेतन से पाँच गुना ज्यादा आता था इसके बावजूद वो अब भी फिजूलखर्ची नहीं करता था जबकि दिनेश के ऊपर दस लाख का कर्ज होने के बाद भी उनकी फिजूल खर्ची पर रोक नहीं लगी थी।
दिनेश सरकारी स्कूल में शिक्षक था और राकेश कृषि उपज मंडी में बाबू के पद पर कार्यरत था दिनेश की नौकरी राकेश से चार साल पहले लगी थी दिनेश की शादी भी राकेश की शादी के तीन साल पहले हुई थी। तब उनकी माँ सरला जीवित थीं पिताजी दौलतराम का निधन पहले ही हो गया था। माँ के निधन के बाद जब दोनों देवरानी जिठानी की आपस में नहीं बनी तब दोनों भाई अलग हो गए थे। अलग होने के बाद दिनेश की पत्नी ने काम वाली बाई रख ली। वेतन मिलते ही वो बाजार जाती थी और खूब खरीदारी करती रोज उसके पास बहुत सा खाना बचता था जिसे वह पशुओं को खिला देती थी। जबकि राकेश की पत्नी छाया के यहाँ कभी बासा खाना नहीं बचता था। वो हर माह वेतन में से रूपया बचा लेता था यह बचत तब काम आई जब घर के बगल का बारह सौ वर्गफुट का प्लॉट चालीस हजार रुपये में बिक रहा था ये बीस साल पुरानी बात है तब दिनेश के पास उसे खरीदने के लिए रुपये ही नहीं थे। राकेश के पास पैसे थे तो उसने वो भूखण्ड खरीद लिया उस पर दो मंजिला मकान बनाकर उसने चार किरायेदार रख दिए। फिर दो साल बाद तीन लाख रुपये में स्टेशन रोड के फ्रंट का प्लॉट खरीद लिया। उस पर बैंक से लोन लेकर शॉपिंग कॉम्पेलक्स बनवा लिया था। उससे उनको हर माह किराये के रूप में इतनी रकम मिल जाती थी जिससे वे बैंक की किश्त चुका देते थे इसके बाद भी उनके पास बहुत सारा पैसा बच जाता था। उन पैसों को वह इन्वेस्ट कर देता था। खूब रुपया आने के कारण लोग उसका सम्मान करने लगे थे । दिनेश यह देखकर झेंप जाता था। दिनेश और उसका परिवार फिजूलखर्ची का परिणाम भुगत रहे थे और राकेश अपनी बचत के सकारात्मक नतीजे देख रहा था।।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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