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कहानी: सपेरे का बेटा

रूपेश नाथ हीरा नाथ का बेटा था। कीरत गाँव की सपेरा बस्ती का वो एकमात्र ऐसा युवक था जो सकारी नौकरी कर रहा था। वो नायब तहसीलदार के पद पर अनूप नगर टप्पे में पदस्थ था। अनूप नगर कीरत गाँव से बारह किलोमीटर दूर था। आज रूपेश नाम दबंग ओम प्रकाश के कब्जे से अपने पिता हीरा नाथ की पाँच एकड़ जमीन मुक्त कराई थी और पिताजी से कहा था वे अब भीख नहीं माँगेगें इस जमीन पर खेती करके अपना गुजारा करेंगे। हीरा नाथ जी ने भी अपने बेटे की बात मान ली थी।
कीरत गाँव में रूपेश के खानदान के सभी लोग काम नहीं करते थे। पूरे खानदान में एक सौ पचास लोग थे जो एक बस्ती बनाकर पंद्रह कच्चे घरों में रहते थे। रूपेश जब पाँच साल के थे तब उनकी बस्ती में सरकारी स्कूल के शिक्षक जगदीश सर सर्वे करने आए थे। तब वे रूपेश का नाम स्कूल की कक्षा एक में दर्ज कर गए थे बस्ती के चार बच्चों के नाम भी उन्होंने कक्षा एक में दर्ज किए थे। जगदीश सर अच्छी तरह से जानते थे कि इनमें से कोई भी स्कूल नहीं आएगा ये सब भीख माँगेंगे। मगर उनका नाम लिखना जरूरी था किसी भी बालक बालिका को अप्रवेशी नहीं रखा जा सकता था। ये बच्चे कभी स्कूल नहीं जाते थे फिर भी उनका नाम नहीं काटा जाता था। वे ऐसे ही आठवीं पास कर जाते थे पर जगदीश सर ने जब रूपेश को कक्षा एक में बैठे देखा तो उन्हें सुखद आश्चर्य हुआ। उन्होंने उन्हें प्रोत्साहित किया रूपेश का स्कूल जाना उनके माता पिता को पसंद नहीं था। वे यही चाहते थे कि रूपेश भी बस्ती के बच्चों की तरह भीख माँगे पर रूपेश ने पढ़ाई से अपना नाता जोड़ लिया था। उसने पढ़ाई नहीं छोड़ी। बीस साल की उम्र में उन्होंने प्रथम श्रेणी में स्नातक की उपाधि प्राप्त कर ली थी और तेइस साल की उम्र में उनका चयन नायब तहसीलदार के पद पर हो गया था। यह पूरी बस्ती के लिए गर्व की बात थी। इसकी खबर दूर-दूर तक फैल गई थी। नायब तहसीलदार बने रूपेश को पाँच साल हो गए थे। उनका रहन सहन तथा रुतबा देकर बस्ती के और लोगों ने भी अपने बच्चों को पढ़ाना शुरू कर दिया था। रूपेश का हम उम्र पीरू नाथ साधु का वेश धारण कर भीख माँग रहा था तथा दुखी जीवन जी रहा था। समय बदल चुका था मगर पीरू अनपढ़ होकर भीख माँग रहा था। सरकार ने साँप पकड़ने पर रोक लगा दी थी फिर भी कुछ लोगों ने साँप पकड़कर पिटारी में बंद  कर रखे थे जिनको लेकर वे भीख माँगते थे। बस्ती के कुछ लोग चोरी डकैती एवं लूट की वारदातें भी कर लेते थे। रूपेश उनको जागरूक करने की हर संभव कोशिश कर रहे थे लेकिन लोगों पर उनकी बात का बहुत कम असर हो रहा था ।

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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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