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कहानी: फुटपाथ का दुकानदार

सरकारी बैंक के असिस्टेण्ट मैनेजर सोमेश शर्मा पच्चीस साल बाद अपने मित्र रमेश सोनी से मिले तो उसकी हालत देखकर चकित हो गए। रमेश सोनी पचास वर्ष की उम्र में ही बूढ़ा लग रहा था। शर्मा जी ने उससे बेतकल्लुफ होने की खूब कोशिश की मगर वो शर्मा जी से झेंप रहा था। शर्मा जी ने पूछा क्या कर रहे हो आजकल? तब उसने बताया एक प्राइवेट बैंक में चपरासी हूँ। पन्द्रह हजार रुपये वेतन मिलता है उसी में चार बच्चियों का लालन पालन कर रहा हूँ। बड़ी बेटी रचना की दो महीने बाद शादी होने वाली है और रुपयों का इंतजाम हो नहीं रहा है।
रमेश की बात सुनकर शर्मा जी गंभीर हो गए। बोले ये सब हुआ कैसे? तुम्हारी दुकान का क्या हुआ? और जो ज्वेलरी बनाने के लिए मशीन लगाई थी उसका क्या हुआ? रमेश बोला सब कुछ चौपट हो गया। शर्मा जी के साथ रमेश सोनी आठवीं तक पढ़ा था। इसके बाद उसने पढ़ाई छोड़ दी थी। पिताजी दशरथ सोनी सोने चाँदी के जेवर बनाते थे। उनकी छोटी सी दुकान थी। रमेश भी पिताजी के काम में हाथ बँटाने लगा था। शर्मा जी ने अपनी पढ़ाई जारी रखी थी। पढ़ाई छोड़ने के बाद भी रमेश की दोस्ती शर्मा जी से अभी भी बहुत गहरी थी। जब शर्मा जी ग्रेज्यूशन करने के बाद नौकरी ढूँढ रहे थे तब रमेश सोनी की शादी कुसुम से हो गई थी। रमेश ने सौतैली माँ से परेशान होकर अलग रहना शुरू कर दिया था। अब रमेश फुटपाथ पर गिलट के जेवरों की दौकान लगाने लगा था। उस दुकान से उसकी ठीक ठाक आय हो जाती थी। उसके अलावा वो आसपास के गाँव कस्बों के साप्ताहिक हाट बाजारों में भी अपनी दुकान लगाता था। रात को नौ बजे के बाद शर्मा जी और रमेश के दोनों मित्र रोज मिलते थे और बातें करते थे। बाजार में बंद दुकानों के बाहर की ओर लगे पटियों पर उनकी बैठक जमा करती थी। जब भी वे चाय मँगवाते तो उसका भुगतान रमेश ही करता था। बाकी सब बेरोजगार थे। पैसा रमेश की जेब में ही रहता था। हमेशा उसकी जेब नोटों से भरी रहती थी। कभी होटल में वे कुछ खाते तो उसके बिल का पेमेण्ट भी रमेश ही करता था। वही रमेश आज पैसे पैसे के लिए मोहताज था। रमेश ने शर्मा जी से कहा कि जब तुम्हारी बैंक में नौकरी लग गई और तुम बाहर चले गए थे फिर हमारी भी बैठक बंद हो गई। फिर मुझ से एक गलती हो गई। सारी जमा पूँजी लगाने तथा कर्ज लेने के बाद जो जेवर बनाने वाली मशीन ली थी उससे इतना अच्छि रिटर्न नहीं मिला। दो साल बाद वो मशीन बहुत कम दामों में बेचना पड़ी। कर्ज अदा करने में हमारा रकम जेवर सब बिक गए, एक प्लॉट भी बिक गया। फिर फुटपाथ पर दुकान लगाने की कोशिश भी नाकाम हो गई। हमारी जगह पर कोई दूसरा दुकान लगाने लगा था। वो हटने को तैयार नहीं हुआ तब मजबूरन मुझे ये प्राइवेट बैंक की चपरासी की नौकरी करना पड़ी। पिताजी का निधन हो गया है। वो अपनी सारी संपत्ति सौतैले भाई को दे गए थे। अपनी दुकान खोलने के पैसे ही नहीं थे। तबसे यही नौकरी कर रहा हूँ। शर्मा जी ने रमेश को खूब तसल्ली दी जिससे उसका थोड़ा जी हल्का हो गया था।

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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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