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कहानी: ढलान

कभी अपनी रंगदारी से पूरे गाँव में आतंक मचाने वाले रज्जू दादा को आज जब मैंने उज्जैन के एक फुट पाथ पर लाचार दुखी बेबस होकर भीख माँगते रेखा तो मुझे बहुत ताज्जुब हुआ क्योंकि रज्जू दादा जामुन खेड़ा में आतंक का पर्याय था लोग उस के नाम से थर थर काँपते थे आज वही रज्जू दादा बुरे हाल में था पाँवों में छाजन हो रही थी जिससे खून रिस रहा था। दोनों घुटनोंनों में दर्द था लगड़ा कर चल रहा था। माने हुए रंगदार को उम्र की इस ढलान पर देखकर दुख भी हो रहा था।
अपने घर आकर मैं उसी के विषय में सोच रहा था। ये बात उन दिनों की है जब मैं जामुन खेड़ा में रहकर वहाँ के सरकारी स्कूल में चौथी में पढ़ रहा था । पिताजी उत्तम चंद उसी स्कूल में शिक्षक के रूप में पदस्थ थे।उस समय रज्जू नवयुवक था उसके हाथ में हमेशा फर्सा रहता था कभी भी बिना हथियार लिए वो घर से नहीं निकलता था । गाँव के चार छः बिगड़े युवक लठ लेकर उसके साथ रहते थे। आए दिन वो किसी न किसी को पीटता दिखाई देता था वो कभी किसी का सम्मान नहीं करता था किसी भी उम्र तथा हैसियत के व्यक्ति को भी अपमानित करने में उसे जरा भी संकोच नहीं होता था किसानों की फसल पककर तैयारी हो जाती तब वो हर खेत पर जाता तथा अनाज की उगाही कर के लाता था कभी खेती न करने वाला रज्जू दादा किसानों से ज्यादा गेहूँ मंडी में बैचता था मैं उस गाँव में चार साल रहा फिर आठवीं पास करने के बाद में देवास आ गया पिताजी ने भी अपना तबादला देवास के सरकारी स्कूल में करा लिया था। यहाँ रहकर मैंने बी एस सी तक पढ़ाई की फिर मेरी सरकारी नौकरी पटवारी की लग गई थी इसके पंद्रह साल बाद जब मैं जामुन खेड़ा गाँव में सर्वे करने गया तो रज्जं दादा को गरीबी में घिरा देखा उसकी उम्र चालीस साल से ऊपर हो गई थी। और अब वो एक झोपडी बनाकर रह रहा था। रंगदारी खत्म हो गई थी अब उसके हाथ में फरसा नहीं रहता था न पहले जैसी ऐंठ अकड बची थी। गाँव में नए नए दादा बन गए थे उन्होने दो चार बार रज्जू दादा की सब के सामने बेरहमी से पिटाई कर दी थी तथा उसका फरसा छीन कर ले गए थे। । दो चार बार की पिटाई ने उसकी सारी दादागिरी खत्म कर दी थी जीवन यापन के लिए उसने मजदूरी करना शुरू कर दिया था इसके बीस साल बाद जब मैं नायब तहसीलदार बनकर उज्जैन आया आज मैंने रज्जू दादा को इस हाल में देखा था रज्जू दादा की उम्र साठ साल से ऊपर हो गई थी। उसकी देखरेख करने वाला कोई नहीं था। न कोई उसकी बीमारी का इलाज करा रहा था। मैंने ही उसे सरकार के भिक्षावृत्ति उन्मूलन अभियान के तहत पुन्रवास केन्द्र में भिजवा दिया था। 

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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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