सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

कहानी: बेदखल

सौरभ बाबू को उनकी सौतेली माँ ने पैंतीस साल पहले अपने उस घर से बेदखल कर दिया जो उन्होंने खुद बनाया था। उनकी गलती सिर्फ इतनी थी कि जब प्लॉट खरीदा तो उन्होंने अपने पिताजी को आगे रखा। भू स्वामी को पैसों का भुगतान उन्होंने किया तथा पिताजी के नाम रजिस्ट्री कराने के विचार से उन्होंने पिताजी को रजिस्ट्रार के पास भेज दिया। उस दिन उन्हें ऑफिस में बहुत काम था। पिताजी ने उसकी रजिस्ट्री उनकी सौतेली माँ माया के नाम करा दी। घर पूरा बन जाने पर उसी माँ ने उन्हें घर से बेदखल कर दिया था। इसके बाद वे पैंतीस साल तक सरकारी आवास में किराये से रहे थे। रिटायरमेन्ट के बाद वे अपना घर बनवा सके थे। आज उन्होंने अपने नए घर में गृह प्रवेश किया था आज वे बड़े खुश थे।
बात सैंतालीस साल पुरानी है जब उनकी उम्र मात्र पंद्रह साल की थी। उनकी माँ सरिता का निधन जब वे छः वर्ष के थे तभी हो गया था। उनके पिताजी करनसिंह ने दूसरी शादी माया से कर ली थी। सौरभ तो यह सोच कर ख़ुश हुए थे कि उनकी खोई हुई माँ उन्हें मिल गई। मगर उस माँ ने उन पर वो-वो अत्याचार किए कि सुननेवाले का कलेजा काँप जाए। सौतेली माँ के दो बेटे हुए बड़े का नाम रितेश और छोटे का नाम दिनेश था। पिताजी भी सौरभ के सौतेले भाईयों पर अपना सारा लाड़ प्यार बिखेरने लगे। सौरभ जी का ऐसा कोई दिन नहीं जाता था जिसमें उनकी सौतैली माँ और पिताजी के हाथों पिटाई न होती हो। उनके दोनों सौतैले भाई भी झूठी चुगली लगाकर उनकी पिटाई कराते थे और फिर मजे लेकर उन्हें पिटता हुआ देखते थे। उनकी कोई दलील नहीं सुनी जाती थी। वे शोभाखेड़ी गाँव के सरकारी स्कूल में पढ़ते थे। आठवीं पास करने के बाद पिताजी ने उन्हें आगे गाँव से बाहर पढ़ाने से मना कर दिया तथा उनकी पढ़ाई बंद करा दी और कहा कि कल से पटेल रामसिंह के पशु चराने जंगल में जाना। इसके एवज में वे साठ रुपया महीना देने की बात कर रहे थे। मैंने साल भर का रुपया पहले ही ले लिया है। सौरभ जी क्या करते बेबस थे। पटेल के यहाँ पशु चराते हुए उन्हें तीन महीने हो गए थे। तभी स्कूल के प्रधानाध्यापक सतीश पाराशर जी ने उन्हें स्कूल में बुलवाया और कहा कि टी सी लेने नहीं आए। तब सौरभ जी ने बताया कि पिताजी ने पढ़ाई छुड़वा दी और अब पटेल के पशु चरा रहा हूँ। यह सुनकर सभी शिक्षकों को बहुत दुख हुआ। वे विद्यालय के बहुत होनहार छात्र थे। कक्षा आठ में उन्होंने बहत्तर प्रतिशत अंक प्राप्त किए थे। पाराशर जी ने तय कर लिया था कि वे सौरभ की पढ़ाई को हर हाल में जारी रखवाएँगे। उन्होंने सौरभ के पिताजी को बुलवाया तो वे आनाकानी करने लगे साथ ही उन्होंने साफ शब्दों में कह दिया कि वो उसकी पढाई का खर्च नहीं उठा सकते। अगर ये घर छोड़कर जाएगा तो मेरा इससे कोई वास्ता नहीं रहेगा। पाराशर जी बोले ठीक है और दूसरे दिन पाराशर जी सौरभ जी को लेकर शहर आ गए। उनका एडमीशन नवीं कक्षा में कराया तथा उनके रहने की व्यवस्था की। जिनके यहाँ सौरभ जी को रखा उनकी फोटोकॉपी एवं टाइपिंग की दुकान थी, सामने ही कलेक्टरी थी। सौरभ जी पढ़ाई के अलावा उनकी दुकान में काम करते थे इसकी बदले उनका मकान मालिक सुरेश उनसे किराया नहीं लेता था। जब सौरभ जी ने हायर सेकेण्डरी परीक्षा पास की तब तक वे हिन्दी अंग्रेजी की टाइपिंग अच्छी तरह से सीख गए थे और अर्जी लिखना तथा कलेक्टरी के बहुत सारे लिखा पढ़ी के काम सीख गए थे। टाईपिंग परीक्षा भी उन्होंने पास कर ली थी। आम चुनाव के समय ऑफिस में तदर्थ पद पर नियुक्ति होना थी। उसमें सौरभ जी को भी नौकरी करने का अवसर मिल गया। यह नौकरी तीन महीने के लिए थी पर इन तीन महीनों में सौरभ जी ने अपने काम से अपनी अहमियत का अहसास करा दिया था। तीन महीने बाद बाकी सबको तो निकाल दिया पर कलेक्टर साहब के कहने से उनकी नौकरी चलती रही। दो साल बाद जब कलेक्टर साहब का तबादला हुआ तो वे सौरभ की नौकरी पक्की कर के चले गए। उस समय उनकी आवासीय भूखण्ड बेच रहे ओम प्रकाश से बात हुई। सस्ता जमाना था उन्होंने ओमप्रकाश जी से छत्तीस सौ वर्ग फुट का प्लॉट सात हजार रुपये में खरीदने का सौदा किया। उनकी यही इच्छा थी कि इसमें उनके दोनों भाईयों तथा माता पिता के लिए अलग पोरशन में मकान बन जाएँ और उनका भी मकान बन जाए। रजिस्ट्री उन्होंने अपने पिताजी के नाम कराने का विचार किया तथा पिताजी को बुलवा लिया। रजिस्ट्री कराने वाले दिन सौरभ जी को जरा भी फुरसत नहीं मिली उन्हें पिताजी पर पूरा विश्वास था। पिताजी तो गाँव चले गए और सौरभ जी ने भूखण्ड के एक हिस्से में दो कमरे हाल किचन और लेट बाथ बनवा लिए थे। उनकी शादी सुप्रिया से हो गई थी। वे उसके साथ मकान में रहने लगे थे। तब तक सौरभ जी को यह पता नहीं था कि पिताजी ने उनकी कुटिल सौतैली माँ के कहने में आकर भूखण्ड की रजिस्ट्री उनकी सौतैली माँ के नाम कराई है। एक दिन उनकी सौतैली माँ पिताजी तथा दोनों भाइयों ने उनके घर पर कब्जा जमा लिया। वे यही समझे कि दोनों भाइयों को आगे पढ़ाने के लिए वे इस मकान में रहने आए हैं लेकिन ऐसा नहीं था। उन्हें तो तब सदमा लगा जब सौतैली माँ ने उनसे कहा मेरे मकान को खाली कर दो। पता चला की मकान की मालकिन पिताजी नहीं उनकी सौतैली माँ है। वे डी एम साहब के पेशकार थे इसलिए उन्हें जल्दी सरकारी आवास मिल गया और वे उसमें शिफ्ट हो गए थे। इसके बाद उनके पिताजी ने उनसे अपना नाता हमेशा के लिए खत्म कर दिया था। पैंतीस साल पहले उन्होंने भूखण्ड सहित जो मकान अठारह हजार रुपये में बनवाया था आज उनके बारह सौ वर्गफुट के भूखण्ड पर बने मकान की लागत पचपन लाख रुपये आई थी। पर उन्हें इसी बात की खुशी थी कि बुढ़ापे में ही सही उनका अपने घर का सपना तो पूरा हो ही गया।


*****
रचनाकार
प्रदीप कश्यप

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

व्यंग्य : जीते जी रोटी को तरसाया मरने के बाद श्राद्ध

आज कल सोलह श्राद्ध का समय चल रहा है कई जगह पर श्राद्ध के आयोजन हो रहे हैं बहुत सारे लोगों को भोजन कराया जा रहा है अपने पितरों के श्राद्ध में लोग हज़ारों रुपये भी खर्च कर रहे हैं उनमें कुछ तो ऐसे हैं जिन्होंने जीते जी अपने बूढ़े माँ बाप की खबर तक नहीं ली और अब उनके मरने पर उनके श्राद्ध पर बड़ा आयोजन कर रहे हैं उनकी तस्वोर पर माला चढ़ा रहे हैं। ऐसे लोगों में शहर के रविकांत जी भी हैं उन्होंने अपने स्वर्गीय माता पिता की तिथि पर भव्य आयोजन किया था खूब पकवान खिलाए गए थे खूब दान किया गया था पर उन्होंने अपने माता पिता को जीते जी बहुत दुख दिए थे। उनके पिताजी सत्तासी वर्ष के थे माँ पिच्यासी वर्ष की दोनों अपने पुराने घर में रहते थे उनका बेटा रविकांत उनकी कभी खोज खबर नहीं लेता था बेटी विदेश में दामाद के साथ रह रही थी। वे दोनों ही एक दूसरे का ख्याल रख रहे थे एक दिन रविकांत जी के पिताजी का दुखद निधन हो गया तब रविकाँत घर?आया पिताजी की उत्तर क्रिया करने के बाद चला गया रविकाँत की माँ अकेली रह गई थीं वे सीधी सरल थी जबकि बेटा बहू चपल चालाक बेटे बहू ने बातों में लेकर उनकी सारे सोने चाँदी के जे...

व्यंग्य: चापलूसी से मिली उपलब्धियाँ।

चापलूसी से मिली उपल्बिधियों का जब लोग बड़े गर्व से बखान कर के फूले नहीं समाते । तब खुद्दार टाइप के लोग उन पर अधिक ध्यान नहीं देते पर कुछ चापलूस टाइप के लोग उन्हें बड़ी हसरत से देखते हैं वे उनके जैसा बनकर वे सब उलब्धियाँ हासिल करने के ख्वाब देखने लगते हैं। ऐसे ही एक सेवानिवृत कर्मी अपनी उपलब्धियों का बखान कर रहे थे कुछ गौर से सुन रहे थे कुछ ऊब रहे थे वहीं सुरेश जी उनकी बात सुनकर मन ही मन मुस्का रहे थे क्योंकि उन्हें उनकी असलियत पता थी। किसी ने उन से पूछ लिया आप भी सतीश जी के विभाग में कार्यरत थे आपकी और इनकी नौकरी की शुरूआत एक ही पद से हुई थी फिर ये इतनी तरक्की क्यों कर गए जरा इस विषय में कुछ बताएँगे वे बोले अगर हम बताएँगे तो ये नाराज हो जाएँगे लोगों ने कहा कुछ भी हो आप तो बताइए वे बोले तो सुनो। नौकरी से पहले हम मित्र थे तब हमें मालूम नहीं था कि ये खुदगर्ज टाइप के चापलूस इंसान हैं। हम दोनों की पोस्टिंग फील्ड में हुई थी। हम किसी की चापलूसी नहीं करते थे और अपने काम से मतलब रखते थे। जबकि इन्होंने मुख्य कार्यालय में अपनी चापलूसी से घुसफैठ कर ली थी कहीं जातिवाद कहीं क्षेत्रवाद कही भाषाव...

व्यंग्य: समझदारी या मूर्खता

सामान्य ध्यमवर्गीय परिवार में नौकरी को प्राथमिकता दी जाती है । उस परिवार में अगर कोई युवक पढ़ लिखकर सरकारी नौकरी हासिल करने में सफल हो जाए तो उसे उसकी बहुत बड़ी उपलब्धि माना जाता है उसके पिता का सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है । विवाह योग्य कन्याओं के पिताओं का आना उनके यहाँ शुरू हो जाता है लाखों रुपये दहेज के ऑफर मिलते हैं। धूमधाम से शादी होती है लडके के हर नाज नखरे ससुराल वालों द्वारा उठाए जाते हैं ऐसे में अगर लड़के को रिश्वत की कमाई हो रही हो तो उसे अच्छा मान लिया जाता है उसका रुतबा ऐसे लोगों के बीच बढ़ जाता है। इस तरह के परिवारों में अगर कोई लड़का मेधावी हो अच्छे अंकों से उच्च शिक्षित हो और वो नौकरी नहीं करना चाहे तो उसके परिजनों को यह नागवार लगता है।  रोहित ने हमेशा कक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त किया था। उसने बि ई में यूनिवर्सिटी में टॉप किया था। नौकरी करने की उसकी इच्छा नहीं थी इससे उसके पिता दुखी रहा करते थे। एक बार एक सरकारी विभाग में क्लर्क की नौकरी निकली तो उसके पिता ने जोर देकर उसका आवेदन जमा करा दिया चयन मैरिट बेस पर होना था। उसका स्कोर अच्छा था । इसलिए उसका चयन ह...