मिलनसार स्वभाव के सेवानिशृत प्रशासनिक अधिकारी वीरेन्द्र जी की जान अपने इस स्वभाव के कारण बची थी सुब्ह जब वे पार्क में नहीं दिखे तो उनके साथी उनके घर आए उन्हें बेसुध देखकर तुरंत अस्पताल ले गए इससे उनका समय पर इलाज हो गया और उनकी जान बच गई थी डॉक्टरों ने कहा था यदि थोड़ी देर हो जाती तो इन्हें बचाना मुश्किल हो जाता आज उन्हें अस्पताल से छुट्टी मिल गई थी वहाँ उनसे मिलने वालों का ताँता लगा रहता था ।उनकी पत्नी विमला उनको ह्रदय से धन्यवाद दे रही थी जिन्होंने उन्हें समय पर अस्पताल पहुँचाया था।
वीरेन्द्र जी की उम्र अड़साठ साल की थी वे एक उच्च पद के अधिकारी से रिटायर हुए थे। जब तक वे पद पर रहे तब तक उनका लोगों से अधिक मेलजोल नहीं था क्योंकि उन्हें तटस्थ रहना पड़ता था ताकि कोई उन पर पक्षपात करने आरोप न लगा सके लेकिन जब वे रिटायर हो गए तो फिर उन पर यह बंधन नहीं रहा । उन्होंने तय कर लिया था कि वे सब से घुल मिल चर रहेंगे छोटे बड़े का भेद नहीं रखेंगे एक दूसरे की दुख मुसीबत में काम आएँगे वे हर सार्वजनिक कार्यक्रम में शामिल होंगे इसका कारण यह था कि उनसे पूर्व एक वरिष्ठ अधिकारी योगेन्द्र जी सेवानिवृत हुए थे। उनका किसी से कोई मेलजोल नहीं था वे किसी से कोई संपर्क ही नहीं रखते थे मोहल्ले पड़ोस के लोगों से ही उनकी बातचीत नहीं होती थी । कोई उनसे मिलने जुलने भी नहीं आता था जब पद पर थे तो उनका रुतबा था काफी पूछ परख थी पद से हटने के बाद वे किसी के काम के नहीं रह गए थे इसलिए लोगों ने उनसे अपना वास्ता खत्म कर लिया था सेवानिवृत होने के बाद भी उनका अभिमान कम नहीं हुआ था। उनका बहुत बड़ा मकान था जिसमें वे अकेले ही रहते थे एच दिन की बात है उनका नौकर उस दिन नहीं आया था वो पाँच दिन की छुट्टी लेकर गया था। उन्हें रात को बेचैनी हुई घबराहट होती रही वे समझे गैस की तकलीफ होगी इसकी गोली भी खाई पर कोई लाभ नहीं हुआ वे अचेत हो गए थे उन्हें दिल में बहुत पीड़ा हो रही थी। हार्ट अटेक आया था। उसी में उनके प्राण पखेरू उड़ गए पाँच दिन बाद जब उनका नौकर आया तब तक उनका शव बुरी तरह खराब हो गया था। बड़ी मुश्किल से उनका अंतिम संस्कार हुआ था। कोठी बंग्ला धन दौलत कोई काम नहीं आया था। इस सत्य को जानकार ही वीरेन्द्र जी मिलन सार हो गए थे। जिस दिन वे बीमार हुए उस दिन उनकी पत्नी विमला अपने बेटे बहं के यहाँ कान पुर गई थीं वे कहीं डिनर कर के आए थे रात में अचानक उनकी तबियत खराब हो गई पहले उन्हें उल्टी हुई फिर डायरिया हो गया। ठिसने उनकी हालत गंभीर कर दी डी हाइड़ेशन से वे अचेत हो गए थे। जिसके कारण वे सुब्ह की सैर पर नहीं जा सके थे सैर के बाद सभी लोग पार्क में इकठ्ठे होते थे फिर सब खूब हँसी मजाक करते थे और तरोताजा होकर घर आते थे। वीरेन्द्र जी सभी को खूब हँसाते थे। जब वे पार्क में दिखाई नहीं दिए तब सभी को चिंता हुई और कुछ उनका हाल जानने के लिए उनके घर आए थे उन्हें अचेत अवस्था में देखकर ही लोग उन्हें अस्पताल ले गए थे। और उनकी जान बच गई थी। इंसान ही इंसान के काम आया था।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप
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