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कहानी: दूसरी बार की शादी

शशिकाँ और किरण की शादी के आज पच्चीस वर्ष पूरहो गए थे इस अवसर पर उनके तेईस वर्ष के बेटे रोहन तथा उसकी पत्नी रीना एवं इक्कीस वर्ष की बेटी रिया तथा उसके पति रोशन ने एक भव्य समारोह का आयोजन किया था जिसमें सभी ने उन्हें सफल दांपत्य जीवन पर हार्दिक बधाई देकर शुभकामनाएँ व्यक्त की थी जबकि शशिकाँत ने किरण से दूसरी शादी की थी किरण की भी यह दूसरी शादी थी। शादी के बाद वो सफल दांपत्य जीवन जी रहे थे।
बात उस समय की है जब शशिकाँत की अरेंज मैरिज रूपा के साथ हुई थी । शशिकाँत रूपा को बहुत चाहता था उसकी हर इच्छा पूरी करने की कोशिश करता था। रूपा ने अबकि दीपावली पर उससे सोने का हार दिलाने की माँग की थी । शशिकाँत के पास इतने रुपये थे नहीं इसलिए वो रुपये कमाने के लिए परदेश चला गया था। वहाँ वो फेब्रीकेशन का कार्य करने लगा था। रूपा मायके में आकर रहने लगी थी। शशिकाँत जी तोड़ मेहनत कर रहा था ।काम की कोई कमी नहीं थी काम करने वालों की कभी थी शशिकाँत के पास छः महीने का समय था। वो पत्नी को सोने का हार खरीद कर देना चाहता था। चार महोने तक तो उसकी पत्नी से फोन पर बात होती रही इसके बाद रूपा ने फोन करना बंद कर दिया उस समय एस टी डी का दौर था। आज की तरह मोबाइल फोन नहीं थे। शशिकाँत के पास ऐसा कोई नंबर नहीं था जिससे वो रूपा से बात कर सके। हार लिये बिना वो रूपा के पास जाना नहीं चाहता था दीपावली के बारह दिन पहले उसने सोने का हार खरीद लिया था इसके साथ ही उसने रूपा के लिए बढ़िया मँहगी साड़ी भी खरीदी थी और भी बहुत सा सामान खरीदकर वह करवा चौथ के दिन अपनी ससुराल आया उसे यह जानकारी थी की रूपा मायके में रह रही है लेकिन रूपा वहाँ नहीं थी रूपा की मम्मी ने बताया कि रूपा ने दिनेश से शादी कर ली है दिनेश की फर्नीचर की दुकान है ।और वो इसी शहर में रह रहा है। यह सुनकर शशिकाँत के होश उड़ गए थे। वो सिर पकड़कर बैठ गया था। उसने रूपा का फोन नंबर लेकर उससे बात करने की खूब कोशिश की मगर रूपा ने उससे कोई बात नहीं की शशिकाँत दिनेश से मिला तो दिनेश ने यही कहा कि अब वो मेरी पत्नी है और वो तुभ से बात नहीं करना चाहती तो तुम उस से बात करने की कोशिश मत करो अन्यथा इसका परिणाम ठीक नहीं होगा। शशिकाँत ने कोई विवाद नहीं किया और वापस उसी शहर में आ गया जहाँ वो काम करता था। उसने तय कर लिया था कि अब वो जीवन में कभी दूसरी शादी नहीं करेगा लेकिन विधि को कुछ और ही मंजूर था किरण एक बेकरी में पैकेजिंग का काम करती थी। शशिकाँत की उससे बेकरी की दुकान पर पहली मुलाकात हुई थी उस दिन किरण काउंटर पर बैठी हुई थी कुछ दिनबाद किरण अपने माता पिता के साथ उसके पड़ोस में ही किराये के घर में रहने आ गई थी अब उनकी रोज ही बातचीत होती रहती थी। किरण उन्नीस साल की उम्र में ही विधवा हो गई थी उसकी शादी के छः महोने बाद उसके पति कैलाश का सड़क दुर्घटना में दुखद निधन हो गया था। धीरे धीरे दोनों में नजदीकियाँ बढ़ती गई किरण के माता पिता भी यही चाहते थे कि उन दोनों की शादी हो जाए जबकि शशिकाँत ने किरण को कहा था कि जब से उसकी पत्नी रूपा ने उसे छोड़कर दूसरी शादी कर ली है तभी से उसने तय कर लिया है कि अब वो कभी दूसरी शादी नहीं करेगा एक दिन किरण ने शशिकाँत से कहा कि मैं यही सोचती रसती हूँ कि आपके जैसे अच्छे इंसान को छोड़कर रूपा ने दूसरी शादी कैसे कर ली किरण की इस बात ने शशिकाँत को रात भर सोने नहीं दिया। फिर किरण ने कहा आपको शादी न करने का अपना विचार त्याग देना चाहिए अभी आपकी उम्र ही क्या है इस पर शशिकाँत ने किरण से कहा तुम शादी क्यों नहीं कर लेती अभी तुम्हारी भी उम्र नहीं बीती है सुनकर किरण कुछ नहीं बोली पर उनके बीच में प्रेम का अःकुर फूट गया था। दोनों एक दूसरे का ख्याल रखने लगे थे। किरण के माता पिता ने शशिकाँत से किरण की शादी का प्रस्ताव रखा था।जो शशिकाँत ने स्वीकार कर लिया था जल्दी ही उनकी शादी हो गई थी । फिर बरसात का मौसम आ गया था बरसात खत्म होने के बाद दशहरा आया था । फिर सब दीपावली की तैयारियों में जुट गए थे करवा चौथ आने वाली थी शशिकाँत ने कहा करवा चौथ पर मुझ से कुछ उपहार नहीं चाहोगी इस पर किरण ने कसा मेरे लिए आपकी छुशी से बढ़कर कुछ नहीं है तब शशिकाँत ने किरण को वो सोने का हार तथा साढ़ी दी जो वो पिछली करवा चौथ पर रूपा के लिए लाया था ।किरण खुश हो गई थी बोली ये मेरे हिस्से का था तो मुझे मिल गया आप भी मेरे थे तो मुझे मिल गए। इस तरह उन्होंने सुखपूर्वक पच्चीस साल गुजार दिए थे। आज उनकी बच्चों ने पच्चीसवीं शादी की सालगिरह मनाई थी। जिसमें किरण ने वही साड़ी पहनी थी जो शशिकाँत ने उसे पहली करवा चौथ पर दी थी साथ ही गले में वही सोने का हार भी पहना था।

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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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