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कहानी: जमीन का सौदा

किशनलाल जी छजूरिया गाँव में रहते थे उनके पास पाँच एकड़ जमीन थी जिसमें वे खेती कर के सुख पूर्वक अपना जीवन यापन कर रहे थे आज वही जमीन उनके इकलौते लड़के सुरेश ने सत्तर लाख रुपये में बिकवा दी थी जमीन बेचते समय उन्हें ऐसा लग रहा था जैसे वो अपनी माँ को बेच रहे हों। बहुत देर तक वे जमीन बेचने पूर्व उस धरती की मिट्टी को माथे से लगाकर फूट फूट कर रोते रहे थे। जमीन बेचने के बाद भी उनके आँसू थम नहीं रहे थे जबकि उनका बेटा सुरेश ख़ुशी से फूला नहीं समा रहा था।
किशन लाल ने अपने बेटे सुरेश को बड़े लाड़ प्यार से पाला था उसकी हर जिद पूरी की थी । इसी पाँच एकड़ जमीन की फसल से उन्होंने सुरेश की पढ़ाई का खर्च भी उठाया था गाँव के स्कूल से आठवी पास करने के बाद किशनलाल ने अपने बेटे का एडमीशन श्याम नगर के हायर सेकेण्ड्री स्कूल में करा दिया था । वहाँ से हायर सेकेण्ड्री परीक्षा पास करने के बाद सुरेश ने कॉलेज की पढ़ाई भोपाल में रहकर करने की इच्छा पिताजी से जाहिर की तो किशनलाल जी ने उसका एडमीशन भोपाल के कॉलेज मैं करा दिया उसकी पढ़ाई का सारा खर्च उन्होंने उठाया सुरेश ने एम बी ए करने के बाद भोपाल में ही नौकरी कर ली उसकी तनख्वाह बाइस हजार रुपये प्रतिमाह थी नौकरी करने के बाद उसे कॉल सेंटर में काम करने वाली लडकी अंशिका से प्रेम हो गया सुरेश ने किशन लाल जी से कह दिया कि वो शादी करेगा तो अंशिका से ही करेगा जबकि किशन लाल उसकी शादी गाँव की पढ़ी लिखी लड़की से कराना चाहते थे पर लड़के की जिद के आगे उनकी एक न चली हारकर उन्होंने अपनी मंजूरी दे दी शादी के बाद दोनों भोपाल मे किराये के फ्लेट में रहने लगे जिसका किराया दस हज़ार रुपये प्रतिमाह था सात हजार रुपये का वेतन अंशिका का था किराया देने के बाद उनके पास बीस हजार रुपये बचते थे जिसमें वे अपना खर्च ठीक से नहीं चला पा रहे थे जबकि साल भर का गेहूँ दाले बेसन थनिया मिर्च किशनलाल जी अपने खेत की उपज से उन्हें दे देते थे अंशिका ने सुरेश से कहा कि भोपाल में मकानों की कीमत आसमान छू रही है बीस हजार रुपये महीने की आय में हम सात जन्म में भी अपना मकान नहीं खरीद सकते अब हम गाँव में तो कभी रहेंगे नहीं पिताजी बूढ़े हो गए हैं अगर वे खेत बेचने को तैयार हो जाएँ तो हमारे अपने मकान का सपना पूरा हो सकता है। यह बात सुरेश को जम गई और उसने पिताजी पर खेत बेचने का दबाव बनाना शुरू कर दिया। सुरेश ने माँ को भी अपने पक्ष में कर लिया हारकर वे जमीन बेचने को तैयार हो गए। इधर सुरेश ने भोपाल में सत्तर लाख रुपये का फोर बी एच के डुप्लेक्स बुक करा लिया था डूप्लेक्श का सौदा उसने अपनी पत्नी अंशिका के नाम से किया था। किशनलाल ने अपने बेटे की हर जिद पूरी की थी तो यह जिद भी पूरी कर दी थी। वे गहरे सदमे में थे। सुरेश ने जब यह कहा कि गाँव का मकान भी बेच दो और हमारे साथ रहो तो इससे किशनलाल जी ने साफ इंकार कर दिया क्योंकि वो जानते थे उन जैसे देहाती को सुरेश की शहरी परिवेश में पली बढ़ी पत्नीअंशिका ज्यादा दिन तक नहीं रहने देगी तब इस बुढ़ापे में कहाँ जाएँगे। उनके इंकार करने पर अंशिका बहुत खुश हुई वैसे भी वो सास ससुर को अपने पास रखने के झंझट में नहीं पड़ना चाहती थी। किशन लाल जी की पत्नी ने कहा भी कि आपने इंकार क्यों कर दिया अपनी जमीन तो बिक गई अब हम गाँव में रहकर अपनी गुजर बसर कैसे करेंगे इस पर किशनलाल जी ने आसमान की तरफ देखकर कहा वो जो ऊपर वाला है न वो इसकी भी व्यवस्था करेगा। वैसे भी मैं जो जड़ी बूटी से लोगों का इलाज करता हूँ उसकी कमाई से रोज इतना तो हमें मिल सी जाएगा जिससे हमारी गुजर बसर चल सके आज तक कभी किसी के सामने हाथ फैलाकर भीख नहीं माँगी तो अब क्यों माँगूँगा अभी तक इन हाथों से दिया ही दिया है । यह हाथ!कभी भीख के लिए नहीं फैल सकते चाहे भूखे रहकर मरने की नौबत ही क्यों न आ जाए।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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