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कहानी: ढाई हज़ार की जमीन

गोपाल दास के पिताजी रामदास जी ने दो एकड़ जमीन आज से पचास साल पहले जो ढाई हज़ार रुपये में खरीदी थी उस जमीन पर मैरिज गार्डन बनाकर गोपाल दास जी चालीस से पचास लाख रुपये प्रतिमाह कमा रहे थे। उस जमीन ने उन्हें संपन्न बना दिया था।
पचास साल पहले जब गोपालदास जी आठ वर्ष के थे तब पिताजी के पास कोई कृषि भूमि नहीं थी। उनके पिताजी और माँ सिया बाई मजदूरी कर के अपना गुजारा चलाते थे। उनका जीवन सादगी से भरा था वो किसी का भी नशा नहीं करते थे पैसा बड़ी किफायत से खर्च करते थे। उसी गाँव में शिवलाल जी बढ़ई का काम करते थे उनके लड़के हरिओम ने शहर में फर्नीचर की दुकान खोल ली थी। वो शहर मैं मकान बनाना चाहता था इसके लिए उसे पैसों की जरूरत थी। इसके लिए शिवलालजी अपनी दो एकड़ जमीन बेचना चाहते थे। उस समय ढाई हजार रुपये की रकम बड़ी रकम मानी जाती थी। उस जमीन को बहुत से लोग लेना चाहते थे पर किसी के पास इतना रुपया नहीं था। ऐसे में रामदास जी ने जो पाई पाई जोड़ी थी वो काम आ गई। उन्होंने ढाई हजार रुपये देकर वो जमीन खरीद ली थी। पूरी जमीन सिंचित थी कुएँ में भरपूर पानी था। उस जमीन ने पिताजी को मजदूर से किसान बना दिया था। उनका गाँव रतनपुर महानगर से पंद्रह किलोमीटर दूर था। लेकिन जब तेजी से शहर का विकास हुआ तो उनका गाँव भी शहरी क्षेत्र में शामिल हो गया। जब हाई वे सिक्स लेन बना तो उनकी जमीन हाई वे किनारे पर आ गई। रामदास जी का निधन हो गया था। वो जमीन अब गोपालदास जी के पास आ गई थी। एक बार की बात है शहर के एक व्यवसायी घनश्यामदास उनके पास आए और बोले मेरे बेटे की शादी है उसके लिए मुझे खुली जगह चाहिए वो अगर आप मुझे दो दिन के लिए दे दें तो कैसा रहे मैं आपको उसका किराया दूँगा। तो गोपालदास जी ने टालने के उद्देश्य से चालीस हज़ार रुपया किराया माँग लिया। हैरत तो उन्हें तब हुई जब घनश्याम दास मान गए तथा बीस हजार रुपये उन्होंने एडवांस दे दिए। इस के बाद तो उनकी जमीन इसी काम में आने लगी जिसके किराये से उन्हें अच्छी आय होने लगी। उस आय से उन्होंने बड़े मैरिज हाल बनवाए कुछ कमरे बनवाए, कवर्ड खुला कैंपस बनवाया, फर्नीचर खरीदा, जनरेटर खरीदा, डेकोरेशन का सामान खरीदा। वर्तमान में उनके मैरिज गार्डन का एक दिन का किराया साढ़े तीन लाख रुपये था। इन पैसों ने उन्हें संपन्न बना दिया था। उन्होंने इन पैसों से और भी कई जगह संपत्ति खरीद ली थी। बीस एकड़ कृषि भूमि भी उन्होंने इसी पैसे से खरीदी थी। जिस पर उनके दोनों बेटे नीरज तथा धीरज खेती कर रहे थे। पिताजी की दूरदर्शिता ने गोपालदास जी को संपन्न बना दिया था।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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