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कहानी: मज़दूर का बेटा

सी एम राइज  के स्कूल की बिल्डिं के निर्माण में मिस्त्री का काम करने आए हीरालालजी ठेकेदार अर्जुन लाल का बदला हुआ रुख देखकर चकित थे कल तक जो ठेकेदार यह कह रहा था कि चालीस करोड़ की इस बिल्डिंग  को बीस करोड में बनाना है बाकी का पैसा सभी मिल बाँट कर खाएँगे। वही ठेकेदार अब पूरी ईमानदारी से भवन निर्माण करने की बात कह रहा था उसका कारण यह था कि जिले के कलेक्टर बदला गए जो नए कलेक्टर आए थे उनका नाम अनूप कुमार था वे सत्ताइस साल के युवा थे उनमें ईमानदारी कूट कूट कर भरी थी यह बात ठेकेदार को पता चल गई थी । इसिलिए  वो ईमानदारी से भवन के निर्माण करने की बात कह रहा था । हीरालाल को यह सुनकर बड़ी खुशी हुई वो मन  ही मन मुस्कुराए पर इसकी भनक उन्होंने ठेकेदार को नहीं लगने दी।
दर असल सच बात यह थी की नवागत कलेक्टर अनूप कुमार जी हीरालाल जी के बेटे थे । अनूप जी ने खूब कहा था कि अब आपको मज़दूरी करने की जरूरत नहीं है आपने बहुत काम कर लिया अब आप आराम करो आप मेरे साथ रहो बहुत बड़ा सरकारी बंग्ला है हम सब आराम से रहेंगे लेकिन हीरालाल जी ने साफ मना कर दिया था वे बोले थे कि अभी मेरी उम्र मात्र पचास साल!की ही तो है काम करने में  सक्षम हूँ इतना बूढ़ा नहीं हुआ हूँ कि काम छोड़कर आराम करूँ 
फिर हीरालाल जी  ने अनूप जी  से साफ मना कर दिया था कि वे किसी को  भी न कहें कि मैं तुम्हारा पिता हूँ अगर यह बात उजागर हो गई तो कोई मुझे काम पर नहीं रखेगा। अनूप कुमार जी ने पिता की यह बात मान ली थी ईमानदारी से अपना काम मन से करने के संस्कार उन्होंने ही तो अनूप जी को दिए थे हीरालाल जी बंग्ले के सुख से दूर रहकर अपने छोटे से मकान में ही बहुत खुश थे अनूप जी का जब जन्म हुआ था तब हीराला जी की उम्र मात्र तेइस वर्ष की थी  वे अनूप जी को लेकर शहर आ गए थे जहाँ वे मजदूरी कर अपना जीवन यापन कर रहे थे वे अनूप जी को पढ़ा लिखाकर बढ़ा आदमी बनाना चाहते थे हीरालाल जी ईमानदार और निर्व्यसनी इंसान थे जहाँ उनके साथी नशे में ऊपनी कमाई के अधिकाँश पैसे उड़ा देते थे वहीं हीरालाल जी किफायत से पैसा खर्च करते थे । यही कारण था कि अनूप जब स्कूल जाने लायक हुए तब तक उन्होंने अपना छोटा सा घर बना लिया था उन्होंने राज मिस्त्री का काम सीख लिया था अब वे मजदूर से मिस्त्री बन गए थे। अनूप जी को उन्होंने सरकारी स्कूल में भरती कराया था अनूप जी प्रखर बुद्धि के विद्यार्थी थे। वे सभी विधाओं मैं हमेशा टॉप रहते थे इक्कीस साल की उम्र में उन्होने  बी एस सी में यूनिवर्सीटी में टॉप किया था और फिर वे यु पी एस सी की तैयारियों में जुट गए थे पहले अटेम्पट में ही उन्होंने अच्छी रैंक से यू पी एस सी क्लीयर की थी तथा उन्का चयन आइ ए एस के लिए हुआ  था कलेक्टर बनने के बाद यह उनका पहला जिला था उसके पूर्व वे मुख्य मंत्री के स्टॉफ में शामिल थे उन्होंने ही अनूप जी को अपने गृह नगर का जिला कलेक्टर बनाकर भेजा था वे अनूप जी की कार्यशैली और ईमानदारी से बहुत प्रभावित थे उन्हें ऊनूपजी से बड़ी अपेक्षाएँ थीं वे चाहते थे कि उनके गृह जिले का समुचित विकास हो इसके लिए  उन्हें अनूप जी जैसे ईमानदार प्रखर अधिकारी की जरूरत थी। अनूप जी यही सब सोचकर कलेक्टर बनकर यहाँ आए थे कल ही उन्होंने ज्वाइन किया था और आज से ही बेईमानों भ्रष्टाचारियों में उनके नाम की दहशत बैठ गई थी वे अच्छी तरह से समझ गए थे कि अब ईमानदारी  से ही काम करने में  भलाई है  नहीं तो हमें कलेक्टर साब कर्रवाई कर जेल भिडवाने में जरा भी देर नहीं करेंगे।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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