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कहानी: दुकान

रायल हेयर कटिंग दुकान के मालिक घीसी लाल जी आजकल दुकान पर बहुत कम समय के लिए आते थे। उनकी उम्र सत्तर साल हो गई थी। दुकान उनका बड़ा लड़का राकेश चला रहा था। छोटे लड़के किशन लाल की इलेक्ट्रानिक्स की दुकान थी। घीसी लाल जी के पास दो मकान थे। एक मकान में उनके दोनों बेटे अपने बीवी बच्चों के साथ रहते थे और दूसरे मकान जो पहले मकान के पास ही था उसमें घीसीलाल जी अपनी पत्नी सुखिया के साथ रहते थे। उस मकान में चार किरायेदार रहते थे जिनका चालीस हजार रुपये हर महीने किराया आता था। जिनमें उनकी गुजर बसर आराम से हो जाती थी। कभी उन्हें बेटों के सामने हाथ पसारने की नौबत नहीं आती थी। उनकी एक बेटी भी थी जिसका नाम राधा था। उसकी शादी उन्होंने कर दी थी। वो भी जब मायके आती तो पिता के घर में सुखपूर्वक रहती थी। माँ उसका बहुत ख्याल रखती थी तथा उसकी जरूरत पूरी भी कर दिया करती थी।
चालीस साल पहले जब घीसीलाल जी श्रीवास इस शहर में आए थे तब उनके दोनों बेटे छोटे थे। राधा चार महीने की थी। उनके पास हेयर कटिंग करने के सामान की पेटी थी और मात्र दो सौ रुपये नगद थे। शहर में आना उनकी विवशता थी क्योंकि वे जिस गाँव पीपलिया में रहते थे उस गाँव से उनके चाचा सुखलाल ने उन्हें पलायन के लिए मजबूर कर दिया था। पीपलिया एक छोटा सा गाँव था उसमें उनके पिताजी हरिलाल और चाचाजी सुखलाल खवास का काम करते थे। इसके बदले में उन्हें हर घर से अनाज मिलता था। पलाश के पत्तों से वे दोना पातल बनाकर अतिरिक्त कमाई भी कर लेते थे। गाँव वालों की दाढ़ी कटिंग का काम भी उनके जिम्मे था। घीसीलाल जी की माँ बुधिया का निधन तब हो गया था जब घीसीलाल जी चार वर्ष के थे। पिताजी ने ही उन्हें पाल पोसकर बड़ा किया था तथा पूरा काम सिखाया था। वे अपने पिता के अकेले लड़के थे। जबकि उनके चाचा के चार लड़के थे। घीसीलाल जी जब अठ्ठाईस वर्ष के थे तब उनके पिताजी हरिलाल जी का टी बी की बीमारी से निधन हो गया। उनके निधन के बाद घीसीलाल जी के चाचा का व्यवहार पूरी तरह बदल गया था। वे उन्हें खवास का काम नहीं करने दे रहे थे। जंगल से पलाश के पत्ते भी नहीं तोड़ने दे रहे थे। एक दिन इसी बात पर उनका चचेरे भाइयों से विवाद हो गया। विवाद इतना बढ़ा कि चारों भाइयों ने उनकी मिलकर पिटाई कर दी और चाचा कुछ नहीं बोले न उन्होंने बीच बचाव किया। यह देखकर घीसीलाल जी चाचाजी से बोले पिताजी के भरने के बाद आपने मेरे कंधे पर हाथ रखकर कहा था कि पिताजी चले गए तो क्या अभी मैं जिन्दा हूँ। तबसे मैं आप को पिता तुल्य मानता था लेकिन आज मेरा विश्वास टूट गया। अब मैं यहाँ नहीं रहूँगा यह गाँव आप सम्भालो इसकी खवासी का पूरा काम आप ही करो। जब घीसीलाल जी गाँव छोड़कर जाने लगे तब उनके चाचा ने न तो उन्हें रोका न उनसे ये पूछा कहाँ जा रहे हो कैसे रहोगे। घीसीलाल जी ने शहर में आकर सरकारी जमीन पर झुग्गी बनाई और उसमें रहने लगे। फुटपाथ पर उन्होंने अपनी हेयर कटिंग की छोटी सी दुकान लगा ली जिसमें एक कुर्सी थी तथा एक काँच था। उस दुकान से उनकी इतनी कमाई हो जाती थी कि उनका खर्च चल रहा था। फिर वे दोना पत्तल भी बनाकर बेच देते थे तथा हिसाब से खर्च करते थे। पाई पाई जोड़कर उनके पास कुछ रुपये इकठ्ठे हो गए थे। उसी दौर में सरकार ने झुग्गी वासियों को जमीन का मालिकाना हक दे दिया था। जिससे उन्हें पट्टा मिल गया था। सस्ता जमाना था। उनकी दुकान से चार सै मीटर दूर कमला मार्केट था उसमें कमलेश की हेयर कटिंग की दुकान थी। दुकान पंद्रह बाइ बीस फुट की थी। वो यह दुकान नये फर्नीचर के तीस हजार रुपये में बेच रहा था। उस जमाने में यह एक बड़ी रकम थी। घीसीलाल जी ने दुकान खरीदने के लिए गाँव का मकान बेच दिया। पत्नी के जेवर बेच दिए अपनी सारी बचत मिला दी फिर भी वे बीस हजार रुपये से ज्यादा इकठ्ठा नहों कर पाए थे। फिर दस हजार रुपये का उन्होंने बैंक से लोन लिया था। तीस हजार रुपये घीसी लाल ने कमलेश को देकर वो दुकान खरीद ली। उस दुकान ने उनके परिवार का काया कल्प कर दिया था। दुकान अच्छी चल रही थी। जब उनके दोनों बेटे बड़े हो गए तो उनको भी घिसीलाल जी ने अलग अलग दुकाने खुलवा दी थीं। अब वे आराम से रहकर अपने बुढ़ापे के दिन काट रहे थे।

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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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