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कहानी: कर्ज का दलदल

रोशन लाल कर्ज के दलदल में इतने धँस चुके थे कि अब उनका उससे उबर पाना संभव नहीं लग रहा था तीनों मकान बिक चुके थे पत्नी के सारे जेवर बिक गए थे । अब वे किराये के मकान में रह रहे थे वेतन आने के पहले घर में लेनदारों के चक्कर लगना शुरू सो जाते थे। कुछ लोग यह सोचकर ज्यादा जोर नहीं देते कि कहीं ये परेशान होकर आत्म हत्या न कर लें। आज उनके घर में फाकाकशी की नौबत आ गई थी जबकि वेतन मिले अभी तीन दिन भी नहीं हुए थे। वो तो रोशनलाल जी की पत्नी कंचन के भाई कैलाश ने दो हजार रुपये भाई दूज के टीके के शगुन के अपनी बहन को दिए थे कंचन उन पूरे रुपयों का गेहूँ ले आई थी तथा उनको चक्की में पिसवा भी लिया था जिससे महीने भर के लिए रोटी की व्यवस्था तो हो ही गई थी।
रोशन लाल जी को उनकी पत्नी कभी भी पैसे नहीं देती थी न उनसे कोई सामान मँगवाती थी क्योंकि लेनदार उनकी जेब से रुपये निकाल लेते थे। 
आज से बीस संल पहले रोशनलाल जी की स्थिति ऐसी नहीं थी। वे बहुत संपन्न परिवार से थे उनकी जब शादी हुई थी तो उसमें खूब दहेज मिला था जब वे घर से अलग हुए तब उनके नाम के शहर में तीन मकान थे । पिताजी ने तेइस लाख रुपये नगद दिए थे लाखों रुपयों की ज्वेलरी उनके पास थी । पर उनकी फिजूल खर्ची की आदत ने उन्हें मिटा दिया था वे शिक्षा विभाग में बड़े बाबू के पद पर कार्यरत थे। शुरू में उन्होंने बहुत सारा रुपया शेयर !बाजार में लगा दिया था जो पूरा ही डूब गया था बाकी रुपया उन्होंने अनाप शनाप खर्च कर के उड़ा दिया था। जब रुपया खत्म हो गया तो उन्होंने जेवर बेचना शुरू कर दिए जब सारे जेवर बिक गए तो फिर मकान बेचना शुरू कर दिया । इसके बाद बैंक से लोन तो ले लिया पर उसे चुकता नही किया इसलिए बैंक ने उन्हें डिफाल्टर घोषित कर दिया और बैंको ने उन्हें कर्ज देने से इंकार कर दिया तब उन्होंने साहूकारों से छत्तीस परसेन्ट की दर से करज लेना शुरू किया इतनी ऊँची ब्याज दर ने उन्हें मिटाक रख दिया था। और आज उनका जीवन नर्क जैसा हो गया था जबकि उनके बडे भाई संतोष को भी अलग होते समय उतना ही मिला था। जितना पिताजी ने इन्हें दिया था। आज संतोष के पास करोडो रुपयो की पार्पटी और नगदी थी । तथा वो बडे मकान में रह रहे थे।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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