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कहानी: माँ की सेवा

रमानाथ जीने अपने परिवार को छोड़कर पूरे बीस साल तक अपनी माँ कौशल्या की सेवा की आज जब माँ का निधन हुआ तब उनकी उम्र निन्यानवे साल की थी जबकि रमानाथ जी ही पूरे सत्तर वर्ष के हो गए थे। माँ की अंत्येष्टि के बाद वे माँ की उत्तर क्रिया की व्यवस्था के संबंध में विचार कर रहे थे। रह रह कर उन्हें माँ की याद भी आ रही थी।
रमानाथ जी के पिताजी दीनानाथ जी का निधन पच्चीस साल पहले हो गया था तब माँ की उम्र!चौहत्तर साल की थी रमानाथ जी तब उद्योग केन्द्र मैं नौकरी करते थे उनकी मत्नी जानकी महिला बाल विकास विभाग में नौकरी कर रही थी तब रमानाथ जी की उम्र पैंतालीस वर्ष की थी। उनके बड़े भाई पुरुषोत्तम की उम्र पचपन साल की थी वे उनसे दस साल बड़े थे उनके पाँच लड़के थे पाँचों कम पढ़े लिखे गुंडा टाईप के थे जबकि रमानाथ जी के दो लड़के थे रवि और सोम दोनों पढ़ने में तेज थे पिता के निधन के समय रमानाथ जी इन्दौर में रह रहे थे। उनकी अंत्येष्ट के बाद उन्होंने माँ से कहा कि चलो माँ मेरे साथ रहना तो माँ ने साफ इंकार दिया बोली बेटा मैं तो यहीं रहकर अपनी मौत का इंतजार करूँगी । दीनानाथ जी की होटल थी । उस समय उन्होंने दस एकड़ जमीन खरीदी थी जो माँ के नाम थी जो मकान था वो भी माँ के नाम था जिस में नीचे दो दुकाने थी । माँ के पास जेवरात भी थे पिताजी बहुत सा पैसा छोड़ गए थे। माँ के इंकार कर लेने पर रमानाथ जी इन्दौर आ गए फिर उनका पाँच साल तक माँ से मिलना नहीं हुआ रमानाथ की पत्नी अपनी सास से बहुत नफरत करती थी। वे अपनी माँ का नाम भी अगर लें दो उनकी पत्नी पुरानी बातें उखाड़कर उन से लड़ने लगती थी। अचानक एक दिन एक चिठ्ठी रमानाथ जी के पास आई उस समय मोबाइल फोन नहीं चलते थे। चिठ्ठी में लिखा था कि फौरन माँ से मिलने आ जाओ । रमानाथ जी चिठ्ठी पढ़ते ही माँ से मिलने आए तो माँ की दशा देख उनकी आँखों में आँसू आ गए माँ को उनके भाई एवं उनके परिवार ने घर से बाहर निकाल दिया था और वे उनके मित्र बद्री प्रसाद जी के यहाँ रह रही थी उनकी उम्र अस्सी साल की होने वाली थी। माँ ने बताया कि लड़के पुरुषोत्तम ने उन्हें घर से इसलिए निकाल दिया क्योंकि वो एक छोटे से घर में किराये से रह रहा है यह सुनकर रमानाथ चौंक गए माँ कैसी बातें कर रही हो? मकान जमीन जायदाद दुकान होटल का क्या सुआ माँ बोली बेटा सब कुछ तेरे बड़े भाई ने बेच दिया उसके तीन लड़के जेल में हैं और दो लड़के कोई काम नहीं करते हैं। ऐसे मैं मुझे वे कैसे रखते मेरे सारे जेवर भी इन्होंने बेच दिए। रमानाथ जी क्या कहते। वे बोले माँ अब आप मेरे साथ रहेंगी। वो माँ के ले जाने से पहले इन्दौर आए और यह बात अपनी पत्नी से कही तो वो झगड़ा करने लगी बोली करोड़ों की जमीन जायदाद सब बड़े बेटे को दे दिया और अब कुछ नहीं बचा तो हमारे पास आना चाहती है । कान खोलकर सुन लो उसे यहाँ मत ले आना मैं उसे बिलूकुल बर्दाश्त नहीं करूँगी बच्चे भी माँ का साथ दे रहे थे वे अकेले पड़ गए थे । पत्नी ने कड़वे लहजे में कहा कि तुम्हें अगर इतनी ही माँ की सेवा करनी है तो रहो उसी के साथ में। यह सुनकर रमानाथ जी अकेले माँ के पास आ गए किराये का मकान लिया और! माँ के साथ थ रहने लगे नौकरी से उन्होंने उनिवार्य सेवा निवृति ले ली थी। और अब वे पेंशनर हो गए थे उस पेंशन में ही दोनों माँ बेटों की गुजर बसर हो रही थी। ये क्रम पूरे बीस साल तच चला रमानाथ जी ने अपनी माँ की खूब सेवा की थी। इस बीच उनकी पत्नी भी रिटायर!हो गई थी दोनों बेटे इंजीनियर!थे उनकी पत्नी डॉक्टर थीं रमानाथ जी की पत्नी बेटे बहू के साथ ही रह रही थी इन्दौर!में उन्होंने बड़ा मकान बना लिया था। उनसे बड़े लड़के ने कहा चलो पिताजी अब हमारे साथ रहना पर उन्सोंने साफ मना कर दिया और अकेले रहने का निर्मय ले लिया था।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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