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कहानी: अटा सटा

मालवाक्षेत्र में अटा सटा से भी शादी प्रचलित है जिसमें दोनों परिवार वालों लड़की के बदले लड़की और लड़के के बदले एच दूसरे के परिवार में शादी करना होती है हर खेड़ी दिनेश की और मनीषा तथा आलमपुर के दीपक तथा बबीता की ऐसी ही शादी हुई थी जिससे दोनों ही परिवारों में कई प्रकार की समस्याएँ आए दिन उत्पन्न होती रहीं थीं उनकी शादी को पूरे पच्चीस साल हो गए थे जिसमें बीस साल तो उनके बीच लड़ाई और मनमुटाव में ही निकल गए उनके बच्चे नाना नानी के घर रह कर पढ़े थे अब जब बच्चे बड़े हो गख़ तब उनके बीच के ये आए दिन के झगड़े खत्म हुए थे।
पच्चीस वर्ष पूर्व जब दिनेश और दीपक की कहीं शादी नहीं हो रही थी कोई उन्हें लड़की देने को तैयार नहीं था दीपक के पिता सुरेश और दिनेश के पिता सतीश की भेंट मोलूखेड़ी में एक तेरहवीं के कार्यक्रम में हुई तब दोनों ने अपने अपने लड़के लिए लड़की देखने की बात कही थी बातों के दौरान पता चला कि वे दोनों ही भूमिहीन हैं और मजदूरी करते हैं दोनों के बेटे बस ड्राईवर थे तब सतीश ने कहा आपके यहाँ कोई लड़की कुँवारी है तो उन्होंने कहा मेरी बेटी कुँवारी है। सुरेश से जब यही सवाल किया तो उसका जवाब भी यही था तब उन्होंने कहा क्यों न हम अटा पटा से अपने बेटों की शादी कर लें इस पर दोनों सहमत हो गए थे दिनेश की पत्नी दीपक की सगी बहन थी और और दीपक की पत्नी दिनेश की बहन समय गुजरा दोनों के यहाँ बच्चों के जन्म भी हो गए थे बच्चों के दो रिश्ते हो गए थे मायके पक्ष में भुआ और ससुराल पक्ष में मामी एक दिनेश और मनीषा में आपस में खूब लड़ाई हो गई तो वो मायके आ गई इस पर दीपक की पत्नी बबीता भी मायके आ गई फिर छः महीने बाद जब फागुन में माता मंदिर पर आयोजित मेले में दोनों के पिता मिले तब फिर उनमें सुलह हुई और दोनों बेटी अपनी अपनी ससुराल आईं कुछ दिनों तक तो ठीक चला इसके बाद फिर उनके बीच झगड़ा हो गया और वे अपने अपने मायके आ गईं।
यह क्रम कई बार यूँ ही चलता रहा इस पर विराम तब लगा जब दोनों के ही लड़ के बढ़े हो गए अब वे खुशहाल जीवन जी रहे थे । 


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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