सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

कहानी: तलाक

प्रमिला का जिन परेश से पच्चीस वर्ष पहले तलाक हुआ था उन्हें वृद्धाश्रम में देखकर वो चकित हो गई थी। वो तो बहुत संपन्न परिवार से थे और बुढ़ापा वृद्धाश्रम में काट रहे हैं, यह प्रमिला के लिए हैरत की बात थी। प्रमिला अपने पोते अंकुर की पहली वर्षगाँठ के उपलक्ष्य में वृद्धाश्रम को एक समय भोजन कराने की राशि जमा करने आई थी। तभी प्रमिला की नजर बरामदे में कुर्सी डाल कर बैठे हुए परेश पर पड़ी थी परेश भी उसे पहचान गए थे। प्रमिला साठ वर्ष की और परेश बासठ वर्ष के थे पर बहुत कमजोर तथा अशक्त लग रहे थे। पूरे वृद्धाश्रम में वे सबसे कम उम्र के थे फिर भी सबसे कमजोर नजर आ रहे थे।
वे प्रमिला को पहचान तो गए थे, बोले कैसी हो। प्रमिला ने कहा ठीक हूँ सुखी हूँ पति विवेक का बिजनेस अच्छा चल रहा है बेटे उपेन्द्र की शादी हमने इक्कीस वर्ष की उम्र में ही कर दी थी। बाइस वर्ष की उम्र में उसके यहाँ बेटे अंकुर का जन्म हुआ। उसकी पहली वर्षगाँठ पर हम वृद्धाश्रम में एक समय के भोजन के अंशदान की राशि जमा करने आए थे। एक बेटी है करुणा वो बी टेक कर रही है। सब कुछ ठीक चल रहा है। आप अपनी कहिए आप का यह हाल कैसे हुआ। परेश ने कहा तुमसे तलाक के बाद मैंने जिस सुमन से शादी की उसने मुझे बर्बाद कर दिया। मेरी कंपनी के मैनेजर से उसने शादी कर ली। दोनों ने मिलकर इसके पूर्व मेरी कंपनी चौपट कर दी थी। मुझे अपने आपको दीवालिया घोषित करना पड़ा। इसके बाद मैंने इधर उधर कई छोटे मोटे काम कर गुजर बसर किया जब साठ वर्ष का हुआ तो यहाँ आ गया यहाँ रहते हुए मुझे दो वर्ष हो गए हैं। वैसे तो यहाँ सब ठीक ही है पर मैं तो अपनी करनी का फल भोग रहा हूँ। तुम्हें इसलिए तलाक दिया था कि शादी के दस साल बाद भी कोई संतान नहीं हुई थी। अगर एक बच्ची भी हो जाती तो तुम्हें तलाक देने की इस जीवन की सबसे बड़ी भूल मैं कभी नहीं करता। बस यही मेरी कहानी है, जो दूसरी शादी की उससे मेरी कोई संतान नहीं हुई। हम पाँच वर्ष साथ रहे फिर उसने मुझे धोखा देकर मेरे ही मैनेजर से शादी कर ली। उसके भी दो बच्चे हैं तुम्हारे भी दो बच्चे अभागा तो मैं हूँ जो कहीं का न रहा न घर का न घाट का। इतनी कम उम्र में ही कई बीमारियों ने घेर लिया शायद ज्यादा दिनों तक न जी पाऊँ, जीने की इच्छा ही खत्म हो गई। प्रमिला ऐसा मत कहो खूब जियो, करने के लिए बहुत से काम हैं उनमें अपना मन लगाओ। इसके बाद प्रमिला ने अपनी बात बताते हुए कहा कि आपसे तलाक के बाद मैं पूरी तरह टूट चुकी थी।
महिला होस्टल में रह रही थी। विवेक की फर्म में मुझे जॉब मिल गयी थी उन्हीं के पास काम कर रही थी। उन्होंने मुझसे विवाह का प्रस्ताव रखा था जो मैंने अस्वीकार कर दिया था। पर उन्होंने हार नहीं मानी और आखिर उन्होंने मुझे सहमत करा ही लिया। विवेक जी बहुत अच्छे इंसान के साथ ही अच्छे पति भी साबित हुए थे। बिजनेसमेन तो वे थे ही मुझ से शादी के बाद उनका कारोबार कई गुना बढ़ गया था। इसे वे मेरे भाग्य से जोड़ते हैं अच्छी बात है यह उनकी सोच है। पर इस सोच ने हमें सुखी बना दिया है। फिर वो बोली मैं चलती हूँ आप अपना ख्याल रखना और अपने विचारों में खोई हुई वहाँ से घर के लिए रवाना हो गई।


*****
प्रदीप कश्यप

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

व्यंग्य : जीते जी रोटी को तरसाया मरने के बाद श्राद्ध

आज कल सोलह श्राद्ध का समय चल रहा है कई जगह पर श्राद्ध के आयोजन हो रहे हैं बहुत सारे लोगों को भोजन कराया जा रहा है अपने पितरों के श्राद्ध में लोग हज़ारों रुपये भी खर्च कर रहे हैं उनमें कुछ तो ऐसे हैं जिन्होंने जीते जी अपने बूढ़े माँ बाप की खबर तक नहीं ली और अब उनके मरने पर उनके श्राद्ध पर बड़ा आयोजन कर रहे हैं उनकी तस्वोर पर माला चढ़ा रहे हैं। ऐसे लोगों में शहर के रविकांत जी भी हैं उन्होंने अपने स्वर्गीय माता पिता की तिथि पर भव्य आयोजन किया था खूब पकवान खिलाए गए थे खूब दान किया गया था पर उन्होंने अपने माता पिता को जीते जी बहुत दुख दिए थे। उनके पिताजी सत्तासी वर्ष के थे माँ पिच्यासी वर्ष की दोनों अपने पुराने घर में रहते थे उनका बेटा रविकांत उनकी कभी खोज खबर नहीं लेता था बेटी विदेश में दामाद के साथ रह रही थी। वे दोनों ही एक दूसरे का ख्याल रख रहे थे एक दिन रविकांत जी के पिताजी का दुखद निधन हो गया तब रविकाँत घर?आया पिताजी की उत्तर क्रिया करने के बाद चला गया रविकाँत की माँ अकेली रह गई थीं वे सीधी सरल थी जबकि बेटा बहू चपल चालाक बेटे बहू ने बातों में लेकर उनकी सारे सोने चाँदी के जे...

दुर्भावना रखकर निंदा करने वाले लोग (व्यंग्य)

कबीर जी ने निंदक को इसलिए हितकारी कहा है क्योंकि वो हमारी बुराइयों को उजागर करते हैं और हम उन्हें दूर करते चले जाते हैं। इस तरह हमारा स्वभाव निर्मल हो जाता है। लेकिन आज के दौर में दुर्भावना रखकर निंदा करने वालों की संख्या ज्यादा हो गई है। ऐसे लोग हमारी बुराईयों को उजागर नहीं करते बल्कि हमारी खूबियों को छिपाकर मन में दुर्भावना रखते हुए हमारी निंदा करते हैं। इन लोगों से दूर रहने में ही भलाई है। अगर इनको साथ रखा तो ये हमारा मनोबल तोड़कर रख देंगे। हमें नकारा साबित करने की कोशिश करेंगे हमारे आत्मविश्वास को डगमगा देंगे। ये दुर्भावना रखकर निंदा करने वाले लोग अपने विरोधियों को निपटाने में कोई कसर नहीं छोड़ते। उसके सारे अवसर या तो खत्म कर देते हैं या छीन लेते हैं। ये लोग हद दर्जे के मतलबी इंसान होते हैं। जिस से मतलब निकालना हो उसकी झूठी तारीफों के पुल बाँधते हैं। उसकी खूब चापलूसी करते हैं उसे महान सिद्ध कर देते हैं और समाज में एक भ्रम की स्थिति पैदा कर देते हैं। ये ग्रुप बनाने में माहिर होते हैं। जो इनके गुट में शामिल हो जाता है ये उसके हर ऐब ढँक लेते हैं। उसे स्थापित करने के हर स...

कहानी: बकरी

वनक्षेत्र के समीप स्थित गाँव खुशामदा के बकरी पालक रमणलाल ने इस बार के पशु मेले में पाँच लाख रुपये के बकरे बेचे थे। दो महीने पहले वो तीन लाख रुपये की बकरियाँ बेच चुका था इसके अलावा हर महीने वो चालीस हज़ार रुपये का बकरी का दूध भी बेच देता था। उसने गाँव में पक्का मकान बनवा लिया था और अच्छे से अपना जीवन यापन कर रहा था। जबकि दूसरी और उसका पड़ोसी किसान ओम प्रकाश दस एकड़ का भूमि स्वामी होने के बाद भी गले-गले तक कर्ज में डूबा हुआ था। दो लाख रुपये कर्ज तो रमणलाल ने भी उसे दे रखा था। रमणलाल के पास आठ साल पहले कुछ नहीं था। वो अत्यंत गरीब खेतिहर मजदूर था। महीने में कभी बीस दिन तो कभी दस दिन ही उसे काम मिलता था। जिसमें उसका मुश्किल से गुजर बसर होता था। रमणलाल ने तब गाँव के किसान हेमराज के यहाँ कुआँ की खुदाई के कार्य में मजदूरी की थी उसके एक हज़ार रुपये बकाए थे। वो अपने रुपये का तकाजा करने हेमराज के पास गया था। हेमराज को उदास देखकर उसने कारण पूछा तो हेमराज ने दौखक होकर कहा कि बच्चे को बकरी का दूध पिलाने का परामर्श वैद्य जी ने दिया था। उसके लिए मैं बाजार से बकरी लाया था जो दो चार दिन में जनने वाली थी...