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कहानी: फीकी दिवाली

लखनलाल की दिवाली इस बार भी फीकी मनने वाली पाँच एकड़ जमीन में मात्र पंद्रह क्विंटल सोयाबीन की फसल हुई थी सोयाबीन के भाव भी अच्छे नहीं थे मगर बेचना मजबूरी थी सारे खर्चे काटने एवं उधारी चुकता करने के बाद मात्र चार हजारर रुपये बचे थे बस इन्हीं रुपयों से उसे दिवाली मनानी थी चार हज़ार रुपये जो वो भैंस का दूध बेचता था उससे प्राप्त हुए थे वे मिलाकर कुल आठ हजार रुपये थे उसमें तीनों बच्चों को कपड़े दिलाना था पूजन सामग्री लाना था मिठाई खरीदना था पत्नी को भी साड़ी दिलाना था वो बहुत परेशान था खेत में गेहूँ की फ़सल की बुआई करना थी उसकी उसे अलग चिंता थी।
विगत गर्मी में उसे ग्रामीण आवास योजना के तहत शासन से रुपये मिले थे उसमें उसने दो कमरे किचन और बरामदा बनवा लिए थे मगर पलस्तर और फर्स का काम बाकी था सोचा था तीन लाख रुपये की सोयाबीन बेच देगा और मकान के बाकी काम कराकर दिवाली नए मकान में मनाएगा मगर फसल का उत्पादन ही इतना कम हुआ था कि सारे मनसूबे चकनाचूर हो गए थे सोयाबीन का उत्पादन कम होने से उसके परिवार के सभी लोग उदास थे छोटी बेटी रिंकी जो नए स्कूल बेग मिलने की उम्मीद कर रही थी अब अपने पुराने स्कूल बेग की मरम्मत कराकर उपयोग करने लायक बनाने की सोच रही थी जबकि बेटा दीपक जिसे लखन ने दिवाली पर नई सायकिल दिलाने का वादा किया था वो वादा भी खटाई में पड़ गया था। कुछ दिनों पहले तक वो अपने दोस्तों में बड़ी डींगे हाँकता था कहता था देखना अबकि दिवाली पर मेरे पास नई सायकिल आएगी अब वही दोस्तों से मुँह छिपाता फिर रहा था सबके सपने चकनाचूर हो गए थे।
  यह दशा सिर्फ उसकी ही नहीं थी गाँव के लगभग सभी किसानों की यही हालत थी। पर वे और कर भी क्या सकते थे खेती वे पीढ़ीयो से कर रहे थे इसके अलावा और कुछ कर भी नहीं सकते थे लखनलाल को तीन दिन पहले की वो घटना याद आ गई जब उसने अपने खेत पड़ोसी दिवाकर को फाँसी लगाने से बचाया था उसके हाथ में दराँता था लखनलाल देर शाम को खेत से घर की ओर लौट रहा था अचानक उसकी नजर नीम के पेड़ पर पड़ी तो देखा कि दिवाकर ने फाँसी का फंदा गले में डाल लिया है और लटकने ही वाला है । उसने जोर से आवाज लगाई दिवाकर ऐसा मत करो मगर दिवाकर के इरादे कुछ ओर थे लखनलाल ने एक पल गँवाए बिना उसकी ओर तेजी से दौड़ लगाई उधर दिवाकर लटका ही था कि लखन ने दराँते के एक ही वार से रस्सी काट दी दिवाकर नीचे गिर गया लखन लाल ने दिवाकर को उठाया फंदा गरदन कस नहीं पाया था सबसे पहले उसने दिवाकर के गले से फंदा निकाला फिर उसे पानी पिलाया आस पास के खेतों से और भी किसान आ गए थे और सब दिवाकर को समझा रहे थे दिवाकर की पत्नी रमा लखनलाल से कह रही थी आज आपने मुझे विधवा होने से बचा लिया वरना मैं कहीं की नहीं रहती अब लखनलाल डिप्रेशन में था और अपने आपको सम्हालने की कोशिश कर रहा था। फिर उसने सोचा सबकी हालत ही तो एक जैसी है फिर भी सब दिवाली मनाने की तैयारी कर रहे हैं तो वो भी क्यों अधिक सोच विचार करे जो पास में थोड़े रुपये हैं उससे भी दिवाली मनाई जा सकती है । उसके इस इरादे ने उसे डिप्रेशन में जाने से बचा लिया था और वो दिवाली की तैयारियों में जुट गया था।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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