हाइवे किनारे एक कस्बा था वीरपुर, वहाँ मनसुख लाल की मनचली कचौड़ी दूर दूर तक प्रसिद्ध थी। जो भी उधर से गुजरता था वो कचौड़ी तो खाता ही था। साथ में बीस-बीस कचौड़ी पैक करा कर भी ले जाता था। मनसुख लाल के अलावा और भी कई दुकानें थी जो मनचली कचौड़ी के नाम से कचौड़ी बेचती थीं पर उनकी दुकान पर ग्राहकों की वैसी भीड़ नहीं रहती थी जैसी मनसुख भाई की दुकान पर हर समय रहती थी। आज मनसुख भाई पूरे तेरह घंटे बाद काउंटर से उठे थे। उनके बड़े लड़के रवीन्द्र ने कउण्टर सम्हाल लिया था। हालत यह थी की उनकी दुकान चौबीसों घंटे खुली रहती थी। मनसुखलाल जी की उम्र बहत्तर साल की हो गई थी। बावन साल से वे कचौड़ी बेच रहे थे। इसकी शुरूआत उन्होंने अपने घर से ही की थी। तब वे बीस साल के थे। उन्हें कुकिंग का शौक था। वे कचौड़ी बहुत अच्छी बनाते थे। वीरपुर में उन दिनों हायर सेकेण्डरी स्कूल था। उसका होस्टल था जिसमें सौ बच्चे रहते थे चार रसोईये काम करते थे उसमें से एक रसोईया सोहन एक महीने की छुट्टी लेना चाहता था। वार्डन ने कहा अपनी जगह किसी ओर की व्यवस्था कर के जाओ तब सोहन ने मनसुख जी से कहा कि वो उनकी ऐवज में काम कर ले। मनसुख भाई तैयार हो गए थे। मनसुख जी के हाथों में कमाल था। होस्टल के सब बच्चे उनके खाने की तारीफ करते थे। एक महीना पूरा होने वाला था। मनसुख भाई एक दिन घर से कचौड़ियाँ बनाकर लाए थे वो उन्होंने वार्डन तथा स्कूल स्टॉफ को खिलाई सभी ने उसके स्वाद की बड़ी तारीफ की। होस्टल के वार्डन रमेश शुक्ला सर ने शाम को सौ कचौड़ी तैयार कर देने का ऑडर दे दिया था। इधर सोहनलाल ने अपनी ड्यूटी सँभाल ली थी। मनसुख भाई को कमाने का जरिया मिल गया था। मनसुख भाई कचौड़ी बनाते तथा उन्हें सायकिल पर रखकर बेचते थे। उस समय कचौड़ी का भाव मात्र पच्चीस पैसे था। जबकि आज उनकी कचौड़ी बीस रुपये में बिक रही थी। सायकिल पर जो कचौड़ी से भरा बॉक्स रखते थे उस पर उन्होंने "मनचली कचौड़ी वाला" यह लिख रखा था। धीरे-धीरे वे मनसुख मनचली कचौड़ी वाले के नाम से प्रसिद्ध हो गए थे। सायकिल से बेचते-बेचते एक दिन मौके की जगह पर उन्होंने दुकान ही खरीद ली थी। तभी से वे इस दुकान पर बैठ कर कचौड़ी बेच रहे थे।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप
भोपाल, मध्यप्रदेश
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