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कहानी: दत्तक पुत्र

बलरामपुर के फुड इंस्पेक्टर रविकिशन ने जिस श्याम बेकरी का निरीक्षण कर नमूने लिए थे उसकी जाँच रिपोर्ट आने के बाद उन्होंने वो बेकरी सील करवाकर उसका फूड लाइसेन्स रद्द कराया था तथा बेकरी के मालिक सतीश राय के खिलाफ प्रकरण ऐसा बनाया था जिसके कारण अदालत ने उसे तीन साल के कारावास की सजा सुनाई थी। उन्होंने अपना काम ईमानदारी से किया था। पूरे पाँच लाख की रिश्वत का ऑफर भी ठुकरा दिया था। दरअसल ये बेकरी उसकी थी जिसकी पत्नी कमला ने उनको आसरा होम से गोद लिया था और बाद में जब उनका खुद का बेटा हो गया तब महज ग्यारह साल की उम्र में उन्हें घर से निकाल दिया था।
बात बत्तीस वर्ष पुरानी है जब कमला अपने पहले पति रामकिशन के साथ रहती थी। दोनों की शादी को तीन साल हो गए थे। उनको कोई संतान नहीं हुई थी। रामकिशन की किराने की दुकान थी। जब उन्होंने अस्पताल में इसकी जाँच कराई तो पता चला कि रामकिशन कभी पिता नहीं बन सकेंगे। ऐसी स्थिति में उन्होंने किसी अनाथ बच्चे को गोद लेने का निर्णय लिया। वे इसी तलाश में थे कि उन्हें पता चला कि आसरा होम में एक तीन महीने का बालक है जो लावारिस अवस्था में रेल्वे स्टेशन के प्लेटफाॅर्म पर मिला था। जिसका अस्पताल में इलाज चला था। ठीक होने पर पुलिस ने उसको आसरा होम को सौंप दिया था। रामकिशन और कमला उस बालक को देखने गए तो उसे देखते ही उन्होंने उस बालक को गोद लेने का विचार किया। आसरा होम के संचालक कैलाश चंद्र जी ने कई शर्तों के साथ बालक को उन्हें गोद दे दिया, इसकी पूरी लिखापढ़ी भी हुई। रामकिशन उस बालक को घर ले आए। उसका नाम उन्होंने रविकिशन रखा। रविकिशन ने उनके सूने जीवन में रौनक ला दी थी। उनको खुशी से भर दिया था। लेकिन जब रविकिशन पाँच वर्ष के थे तब सड़क दुर्घटना में रामकिशन का दुखद निधन हो गया। इसके बाद कमला ने फेक्ट्री में काम कर अपना गुजारा किया, तीन साल ऐसे ही गुजर गए। रविकिशन स्कूल जाने लगे थे। वे पढ़ने में बहुत तेज थे। फेक्ट्री में काम करने के दौरान ही कमला की सतीश राय से नजदीकियाँ बढ़ने लगीं। उनके बीच प्रेम पनप गया था। सतीश की पत्नी का बीमारी के चलते निधन हो गया था। उनकी भी कोई संतान नहीं थी। दोनों ने शादी करने का निर्णय ले लिया। तब उन्होंने यह तय किया था कि वे रविकिशन की ही परवरिश करेंगे। अपनी कोई संतान पैदा नहीं करेंगे। लेकिन शादी के दो वर्ष बाद उनका इरादा बदल गया और आखिर कमला गर्भवती हो गई। जब कमला ने पुत्र राघव को जन्म दिया तब रविकिशन की उम्र दस वर्ष की थी और उसने चौथी कक्षा पास कर पाँचवी में प्रवेश लिया था। राघव के जन्म के बाद से ही रविकिशन की उपेक्षा शुरू हो गई थी। रविकिशन के साथ मारपीट होने लगी थी, उसे प्रताड़ित किया जाता था। नन्हा बालक रविकिशन इस से मन ही मन बहुत दुखी रहता था। यह सिलसिला पूरे एक वर्ष तक चलता रहा। रविकिशन ने पाँचवी कक्षा अच्छे अंकों से पास कर ली थी। वो क्लास में टॉप आया था पर उसकी इस उपलब्धि पर खुशी जताने वाला कोई नहीं था। उसके बाद रविकिशन ने अपने आपको लावारिस मानना शुरू कर दिया था। और यह सच तब साबित हो गया जब बिना किसी कारण से कमला और सतीश ने उसे घर से निकाल दिया। वो उदास मन से अपने क्लास फॅलो मोहन के घर आ गया। वहाँ वो पूरे दिन रहा जब शाम ज्यादा हो गई तब मोहन की मम्मी ने उससे कहा बेटा आज तुझे घर नहीं जाना क्या, तब उसने सारी बात मोहन की मम्मी को बताई। उन्होंने यह बात मोहन के पापा सुरेश को बताई। इस पर सुरेश ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा कोई बात नहीं बेटा तुम हमारे साथ रहकर अपनी पढ़ाई जारी रखो। और इस तरह रविकिशन मोहन के घर में रहने लगा । यह बात जब कमला और सतीश को पता चली तो उन्होंने सुरेश से कहा कि रविकिशन को धक्के मारकर घर से बाहर निकाल दो। यह कोई हमारी औलाद नहीं है न जाने किसका गंदा खून है। मगर सुरेश ने उनकी बात नहीं मानी। रविकिशन स्वाभिमानी था, सुरेश का पैकेजिंग का काम था यह काम वे अपने घर में करते थे। उनके साथ चार और मजदूर भी काम करते थे। उनके यहाँ से एक मजदूर काम छोड़कर चला गया तो उसका काम रविकिशन ने सँभाल लिया था। सुरेश और मोहन की मम्मी ने ऊपरी मन से मना किया और बाद में अपनी सहमति दे दी। रविकिशन ने काम करते हुए भी अपनी पढ़ाई जारी रखी और बी एस सी करने के बाद नौकरी के लिए खूब प्रयास किए। तैयारी भी की उसकी मेहनत रंग लाई और वो फूड इंसपेक्टर के पद पर चयनित हो गए। फूड इंस्पेक्टर बनने के बाद रविकिशन अपना काम ईमानदारी से करने लगे थे। उनकी शादी अंजू से हो गई थी। वो नगर पालिका में क्लर्क के पद पर कार्यरत थी। खाद्य सुरक्षा सप्ताह के अन्तर्गत चलाई गई मुहिम के दौरान उन्होंने श्याम बेकरी पर कार्रवाई की थी। बेकरी में अनेक अनियमितताएँ मिलीं थी जिस के कारण सतीश राय को सजा हुई थी।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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