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कहानी: मिर्च का भाव

महानगर के न्यू मार्केद के एक हिस्से पर गाँव से आए कुछ किसानों की एक दर्जन सब्जी फल फूल की दुकाने थीं उनमें जो सबसे बड़ी दुकान थी वो किशनलाल पटेल की थी सभी किसान बमूलिया गाँ के थे जो महानगर से पच्चीस किलोमीटर दूर था पिछले पाँच सालों से वे ये दुकान लगा रहे थे और सभी खूब संपन्न थे वे सब अपने खुद के खेत में उपजी सब्जी फल फूल बेचते थे । इसमें बिचौलियों की कोई भूमिका नहीं थी सब्जी सीधे उत्पादक द्वारा ग्राहकों तक प हुँचती उचित भाव से ताजी सब्जी लेकर ग्राहक भी बहुत खुश होते थे यही कारण था कि सुब्ह शाम न्यू मार्केट के उस सब्जी फल वाले कार्नर पर ग्राहकों की भीड़ उमड़ पड़ती थी रात के आठ बजे तक पूरी सब्जी बिक जाती थी आज भी किशनलाल सब्जी बेचकर बमूलिया आए थे रात के नौ बजने वाले थे सब्जी उत्पादक के साथ ही फुटकर विक्रेता बनने से आज वे करोड़पति किसान बन गए थे उनका घर गाँव में सबसे आलीशान था।
किशन लाल आज जो बिक्री हुई थी उसका हिसा जोड़ रहे थे पूरे डेढ लाख रुपये की सब्जी बिकी थी उन्होने हिसाब लगाया यदि यही सब्जी वे दलालों को देकर आते तो इस के मुश्किल से तीस हज़ार रुपये ही मिलते जिसमें प हजार रुपये तो ट्रांस पोर्ट का चार्ज ही लग जाता लागत भी नहीं मिलती अब तो किशनलाल जी के पास खुद की पिक अप थी जिसमें सब्जी भरकर वे रोज सुब्ह सात बजे अपनी दुकान पर पहुँच जाते थे। और फिर ग्राहकों के आने का सिलसिला शुरू हो जाता था किशनलाल के मन में यह विचार पाँच वर्ष पूर्व आया था तब वे दो बोरा हरी मिर्च से भरा लेकर सब्जी मंडी में आए थे वहाँ दलालों के मार्फत उनकी सब्जी नीलामी में रखी गई थी जिसमें एक साठ किलो की बोरी बारह से रुपये की बिकी थी दलाली कमीशन मंडी टेक्स हम्माली तुलाई सबका भुगतान करने के उनके हिस्से में दो हजार रुपये आए थे बोरे को यहाँ तक लाने में उनके दो सो रुपये खर्च हो गए थे । मिर्च तुड़ाई में चार सौ रुपये लेबर ने ले लिए थे अब उनके पास सोलह सौ रुपये बचे थे चाय नाश्ते तथा किराये में सौ रुपये खर्च करने के बाद जो पन्द्रह सौ रुपये बचे थे उसमें से बारह सौ रुपये की उन्होंने कीट नाशक दवा खरी द ली थी अब उनके पास तीन सौ रुपये थे उसमें दो सौ रुपये का उन्होंने घरेलू उपयोग का साभान ले लिया था जब वे घर आए तब उनकी जेब में सौ रुपये थे जिसे देखकर उनकी पत्नी सौरम को बड़ा गुस्सा आया बोली कल ही रिंकू की स्कूल की फीस जमा करना है छः सौ रुपये कहाँ से लाएँगे और रुपये किशनलाल भी चिंतित हो गए बोले कीटनाशक दवा लाना भी तो जरूरी था नहीं तो कीड़े ही पूरी फसल चौपट कर जाते। सौरम कुछ'नहीं बोली बस बेबसी से उन्हें देखती रही किशनलाल जी ने पूखा कल कौनसी सब्जी ले जाना वो बोली चार बोरे लौकी है लौकी का वैसे भी कोई भाव नहीं रहता रिंकू की फीस कैसे भरेंगे। एकाएक किशन बैले कल दोपहर बाद भरेंगे पत्नी बोली रुपये कहाँ से आएँगे वे बोले लौकी से पत्नी बोली पचास रुपये में एक बोरी बिकेगी सौ रुपये में कैसे फीस भरोगे बच्चे की किशनलाल बोले ये तो कल ही पता चलेगा दर असल जब वे आज सुब्ह मंडी मिर्च बेचकर निकल रहे थे तो एक फुटकर सब्जी विक्रेता से उन्होंने हरी मिर्च का भाव पूछ लिया तो उसने कोई ज्यादा मँहगी नहीं है भात्र पाँच रुपये की पचास ग्राम लौकी का भाव पूछा तो उसने तीस रुपया बताया इस भाव ने किशन लाल को झकझोर कर रख दिया उनकी बीस रुपये किलो की मिर्च सौ रुपये किलो में बिक रही थी। दूसरे दिन किशनलाल ने लौकी के दोनों बोरे मोटर सायकिल पर जमाए। और इस बार वे सब्जी मंडी नहीं गए सी धे न्यूमार्केट आ गए वहाँ उन्होने एक कोने में लौकी की दुकान खोल ली। बीस रुपये नग से उनकी दोनो बोरों की लौकी हाथों हाथ बिक गई किशन लाल जी को चौबीस सौ रुपये का लाभ हुआ साढ़े ग्यारह बजे तो वे घर आ गए और पत्नी को चौबीस सौ रुपये देकर बोले अब तो हो जाएगी रिंकु की फीस जमा पत्नी बोली लॉटरी खुल गई किशन लाल लॉटरी नहीं अक्ल से काम लिया था और उन्हों ने पत्नी को सारी बात बता दी पत्नी बोली आपने पहली बार कोई अच्छा काम किया है जिससे मुझे खुशी हुई है। तभी से किशन लाल ने अपनी सब्जी सीधे फुटकर में बेचना शुरू कर दिया और आज वे गाँव के सबसे संपन्न किसान बन गए थे।


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रचनाकार
प्रदीप कशयप

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