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कहानी: आज़ादी

रूपा को पूरे पन्द्रह साल बाद नर्क जैसी ज़िंदगी से मुक्ति मिली थी आज उसका पति मनीष उसके बारह साल के लड़के आलोक को भी उसके पास छोड़ गया था रूपा एक प्राईवेट स्कूल में पढ़ा रही थी उसे बारह हज़ार रुपये महीना वेतन मिलता था तथा बारह हजार रुपये ही वह टयूशन सः कमा लेती थी चार हज़ार रुपया भहीना मकान कैराया देने के बाद बीस हज़ार में उसका गुजारा आराम से चल रहा था । उसकी बेटी रूपाली चौथी कक्षा में पढ़ रही थी तथा बेटे आलोक का एडमीशन उसने सातवीं कुक्षा में करा दिया था। स्कूल स्टॉफ में होने के कारण उसे बच्चों की फीस नहीं देनी पड़ती थी पिछले एक वर्ष से वो अपने पति से अलग रह रही थी। मगर आज वो पूरी तरह आजाद हो गई थी आज उसका बेटा भी उसके पास आ गया था।
बात एक वर्ष पहले की है जब रूपा के पिताजी रूपचंद जो सरकारी स्कूल में पढ़ाते थे वे एक शादी समारोह में सागौनी गाँव में आए थे तो उन्होंने सोचा की अपनी बेटी रूपा की ससुराल भी चला जाऊँ बहुत दिनों से बेटी से नहीं मिला उसे भी देख लूँगा कैसी है जब रूपचंद बेटी की ससुराल आए तो सीधे बेटी के कमरे में आ गए और वहाँ का हाल देख कर गुस्से और दुख से भर गए दोनों बच्चे डरे सहमे हुए कोने में दुबके हुए थे और रूपा रो रही थी थोड़ी देर पहले उसकी बेरहमी से पिटाई हुई थी उसके पति मनीष जेठ राज मल और देवर दीपक तीनों ने मिलकर उसे बुरी तरह मारा था वे इसे सहन नहीं कर पाए और तैश में आ गए उनकी दामाद और उसके भाइयों से कहासुनी हो गई मनीष शराब पिए हुए था उसने तथा उसके भाईयों ने रूपचंद के साथ भी मारपीट कर दी पिता को पिटते देख रूपा रणचंडी बन गई और जो खुद की पिटाई पर कुछ नहीं बोली थी वो अब सबसे लड़ने को तैयार हो गई थी रूपचंद जी ने पुलिस में रिपोर्ट लिखा दी पुलिस आई और पुलिस की मौजूदगी में रूपचंद अपनी बेटी रूपा को घर लिवा लाए दोनों बच्चे मनीष ने अपने पास ही रख लिए रूपा रूपचंद जी के साथ मायके आ गई यहाँ वो पन्द्रह दिन रही पर अपनी दोनों भाभी संगीता और निशा के व्यवहार से आहत होकर मायके के पास ही एक मकान किराये से लेकर उसमें रहने लगी एक दिन मनीष उसके पास आया तो रूपा मायके में आ गई वो रूपचंद जी से माफी माँगने लगा वो पूरी तरह शराब के नशे में चूर था और रूपा को ले जाने की जिद कर रहा था लेकिन इस बार रूपा ने उसके साथ न जाने का फैसला कर लिया था। इसके पूर्व वो कई बार उसके मनाने पर उसके साथ जा चुकी थी पर उसके रवैये भें कभी बदलाव नहीं आया था रोज शराब पीकर रूपा के साथ मारपीट करना उसकी आदत में शामिल हो गया था जब रूपचंद जी ने रूपा को भेजने से सख्ती से इंकार कर दिया तो वो मारपीट पर उतारू हो गया लेकिन वो यह भूल गया कि वो अपनी ससुराल में है उसके दोनों सालों ने मिलकर उसकी वो पिटाई की की ऐसी मार उसे जीवन में कभी न पड़ी होगी । वो पिट कुटकर घर चला गया फिर एक दिन चुपके से आया और रूपा के स्कूल में आकर रूपा से बोला अपनी बेटी सँभाल मेरे खुद के लिए पेटभर भोजन नहीं मिल रहा तो इसका पेट कैसे भरूँगा रूपा बोली आलोक को भी पोड़ जाओ तो मनीष बोला उसे मैं अपने साथ रखूँगा पर वो अपने बेटे का खर्च भी बर्दाश्त नहीं कर पाया तथा आखिर आज उसे रूपा के पास छोड़कर घर आ गया था रूपा आज बहुत खुश'थी उसके दोनों बच्चे उसके पास थे बच्चे भी बहुत खुश दिखाई दे रहे थे।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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